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बादल फटने से भूस्खलन तक… हिमाचल की बढ़ती आपदाओं पर केंद्र की बड़ी पहल

हिमाचल प्रदेश में बढ़ते क्लाउडबर्स्ट, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश की घटनाओं के बीच केंद्र सरकार ने बहु-क्षेत्रीय केंद्रीय टीम का गठन किया है। NDMA, CBRI, IITM, IIT इंदौर समेत विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ हिमाचल में चरम मौसम की बढ़ती घटनाओं के कारणों और संवेदनशील इलाकों का अध्ययन करेंगे। सरकार ने जलवायु परिवर्तन, बर्फ पिघलने, मोरेन अस्थिरता और मानवजनित गतिविधियों को बढ़ते जोखिम से जोड़ते हुए दीर्घकालिक समाधान सुझाने की बात कही है।

Anshuman Mishra12 अग. 2026, 12:40 AM IST
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बादल फटने से भूस्खलन तक… हिमाचल की बढ़ती आपदाओं पर केंद्र की बड़ी पहल
हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश में बादल फटने, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश की बढ़ती घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। इन प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए एक मल्टी-सेक्टोरल सेंट्रल टीम यानी बहु-क्षेत्रीय केंद्रीय टीम का गठन किया गया है। यह टीम हिमाचल के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों का अध्ययन कर आपदा के कारणों और भविष्य में इसके प्रभाव को कम करने के उपाय सुझाएगी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, इस टीम में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI) रुड़की, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) पुणे, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर और अन्य संबंधित एजेंसियों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इसके अलावा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), केंद्रीय जल आयोग (CWC) और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) से मिले आंकड़ों और इनपुट को भी अध्ययन में शामिल किया जाएगा।

क्या पता लगाएगी केंद्रीय टीम?
केंद्रीय टीम का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि हिमाचल प्रदेश में चरम मौसम की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं और किन इलाकों में इनका खतरा सबसे अधिक है। इसके लिए टीम प्रभावित क्षेत्रों की भौगोलिक और जमीनी परिस्थितियों का अध्ययन करेगी, अलग-अलग सरकारी और वैज्ञानिक एजेंसियों से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करेगी और आपदाओं के पीछे काम कर रहे प्राकृतिक तथा मानवजनित कारकों की जांच करेगी। इसके बाद टीम लंबे समय के लिए ऐसे उपाय सुझाएगी, जिनसे बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा चरम बारिश का खतरा
सरकार के अनुसार मौसम विशेषज्ञों, वैज्ञानिक संस्थानों और राज्य सरकार के आकलन से संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है।

इसका मतलब यह है कि बारिश केवल अधिक होने की समस्या नहीं है, बल्कि कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने की घटनाएं भी जोखिम बढ़ा रही हैं। हिमालय जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में इसका असर और गंभीर हो सकता है, क्योंकि अचानक भारी बारिश से नदियों और नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और कमजोर ढलानों पर भूस्खलन का खतरा पैदा हो सकता है।

बर्फ पिघलने और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता से भी बढ़ रहा जोखिम
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में समय से पहले या तेज बर्फ पिघलने और मोरेन यानी ग्लेशियरों से जुड़े मलबे की अस्थिरता भी जोखिम बढ़ा रही है। इससे ऑफ-सीजन में ढलानों के टूटने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों से तेजी से पानी नीचे आने की स्थिति बन सकती है।

यानी हिमाचल में आपदा का खतरा केवल बारिश तक सीमित नहीं है। बारिश, बर्फ पिघलने, अस्थिर पहाड़ी ढलानों, नदी-नालों और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव अचानक बड़ी आपदा का रूप ले सकता है।

मानवीय गतिविधियां भी बढ़ा रही हैं खतरा
सरकार ने अपने जवाब में एक महत्वपूर्ण बात कही है—हिमाचल प्रदेश में बढ़ते जोखिम में मानवजनित कारकों की भी भूमिका है। यानी प्राकृतिक घटनाओं के साथ-साथ इंसानी गतिविधियां भी संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं।

यही वजह है कि केंद्रीय टीम केवल मौसम के आंकड़ों का अध्ययन नहीं करेगी, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों की जमीन, भौगोलिक स्थिति और वहां मौजूद परिस्थितियों का भी आकलन करेगी।

IMD की चेतावनियां भी बढ़ते जोखिम की ओर इशारा करती हैं
भारत मौसम विज्ञान विभाग की हिमाचल प्रदेश चेतावनी प्रणाली में जुलाई 2026 के अंत में कई दिनों तक भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी दर्ज की गई थी। इससे स्पष्ट है कि हिमालयी राज्यों में मानसून के दौरान अत्यधिक बारिश और उससे जुड़ी आपदाओं के लिए लगातार निगरानी की जरूरत है।

2026 में प्रकाशित IMD के एक वैज्ञानिक अध्ययन में भी हिमाचल प्रदेश में फ्लैश फ्लड के पूर्वानुमान की चुनौती पर जोर दिया गया है। अध्ययन के मुताबिक पहाड़ी इलाकों में फ्लैश फ्लड तेजी से शुरू हो सकती है और इसके लिए उपलब्ध चेतावनी समय सीमित हो सकता है। अध्ययन ने यह भी बताया कि कम अवधि में होने वाली अत्यधिक बारिश में बढ़ोतरी जलवायु परिवर्तन के साथ इस चुनौती को और गंभीर बना रही है।

क्यों महत्वपूर्ण है केंद्र का यह कदम?
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में एक ही घटना कई स्तरों पर नुकसान पहुंचा सकती है। अचानक भारी बारिश से फ्लैश फ्लड आ सकती है, वहीं कमजोर ढलानों पर भूस्खलन हो सकता है। इससे सड़कें, पुल, बिजली और संचार व्यवस्था प्रभावित होने के साथ-साथ दूरदराज के इलाकों का संपर्क भी टूट सकता है।

ऐसे में केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि उन क्षेत्रों की पहले से पहचान की जाए जहां क्लाउडबर्स्ट, फ्लैश फ्लड या भूस्खलन का खतरा ज्यादा है। केंद्रीय टीम का अध्ययन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में यह जानकारी दी। मंत्रालय के मुताबिक केंद्रीय टीम का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश में बढ़ती चरम मौसम घटनाओं के वैज्ञानिक कारणों का अध्ययन करने के साथ-साथ लंबे समय के लिए आपदा जोखिम कम करने के उपाय सुझाना है।

हिमाचल प्रदेश में बढ़ते क्लाउडबर्स्ट, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन अब केवल अलग-अलग प्राकृतिक घटनाएं नहीं रह गई हैं। जलवायु परिवर्तन, तेज बर्फ पिघलना, पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता और मानवजनित दबाव मिलकर जोखिम को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में केंद्र की बहु-क्षेत्रीय टीम का अध्ययन भविष्य में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने की रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभा सकता है।