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इलेक्ट्रिक वाहनों से 2050 तक बच सकती हैं 17 लाख जानें, सड़क परिवहन प्रदूषण पर नई रिपोर्ट का बड़ा खुलासा
भारत में सड़क परिवहन से होने वाला प्रदूषण लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। ICCT के आकलन के मुताबिक, अगर देश 2050 तक सड़क परिवहन को पूरी तरह Zero-Emission बना लेता है, तो करीब 17 लाख समयपूर्व मौतों को रोका जा सकता है। रिपोर्ट में भारी वाहनों को प्रदूषण का बड़ा स्रोत बताया गया है और इलेक्ट्रिक कारों के साथ बसों व ट्रकों के विद्युतीकरण पर जोर दिया गया है। यह बदलाव न केवल प्रदूषण कम कर सकता है, बल्कि भारत के लिए बड़ा स्वास्थ्य लाभ भी ला सकता है।
Anshuman Mishra12 अग. 2026, 07:33 PM IST

भारत में बढ़ता वाहन प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि लोगों की सेहत के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) के नए आकलन के मुताबिक, अगर भारत 2050 तक सड़क परिवहन को पूरी तरह शून्य-उत्सर्जन यानी Zero-Emission Transport में बदल देता है, तो करीब 17 लाख समयपूर्व मौतों को रोका जा सकता है।
हर छह मिनट में एक समयपूर्व मौत से जुड़ा सड़क परिवहन प्रदूषण
ICCT के अध्ययन के अनुसार, भारत में सड़क परिवहन से होने वाला प्रदूषण स्वास्थ्य पर बड़ा असर डाल रहा है। वर्ष 2024 में सड़क परिवहन से होने वाला प्रदूषण देश में लगभग हर छह मिनट में एक समयपूर्व मौत और हर 34 मिनट में बच्चों में अस्थमा का एक नया मामला सामने आने से जुड़ा था। अध्ययन के मुताबिक, सड़क परिवहन से होने वाली वैश्विक समयपूर्व मौतों में भारत की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक, वाहनों से निकलने वाले प्रदूषकों में नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और PM2.5 जैसे कण प्रमुख स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से श्वसन और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
दिल्ली-NCR पर प्रदूषण का ज्यादा असर
सड़क परिवहन प्रदूषण का असर देश के सभी हिस्सों में समान नहीं है। ICCT के आकलन के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में देश की आबादी का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा रहता है, लेकिन सड़क परिवहन से जुड़े बच्चों के अस्थमा के मामलों में NCR की हिस्सेदारी लगभग एक चौथाई है। वर्ष 2024 में दिल्ली में सड़क परिवहन प्रदूषण से करीब 2,800 समयपूर्व मौतें और बच्चों में अस्थमा के लगभग 1,500 नए मामले जुड़े होने का अनुमान लगाया गया। अध्ययन में यह भी कहा गया कि NCR के अत्यधिक प्रदूषित हिस्सों में सड़क परिवहन अकेले ही WHO की वार्षिक NO₂ गाइडलाइन से अधिक प्रदूषण पैदा कर सकता है।
ट्रक और बसें प्रदूषण की बड़ी वजह
अध्ययन में भारी वाहनों को खास तौर पर चिंता का विषय बताया गया है। 2024 में भारत के सड़क परिवहन से होने वाले tailpipe NOx उत्सर्जन में भारी वाहनों की हिस्सेदारी 79 प्रतिशत और tailpipe PM2.5 उत्सर्जन में 64 प्रतिशत थी। इसी वजह से ICCT ने इलेक्ट्रिक ट्रकों और बसों की ओर तेज बदलाव की सिफारिश की है। साथ ही पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को चरणबद्ध तरीके से सड़क से हटाने के लिए नियामकीय कदम उठाने पर जोर दिया गया है।
सिर्फ EV खरीदना नहीं, पूरी परिवहन व्यवस्था बदलना जरूरी
रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि केवल कुछ इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। सड़क परिवहन को वास्तविक रूप से शून्य-उत्सर्जन बनाने के लिए कारों के साथ-साथ बसों, ट्रकों और अन्य वाणिज्यिक वाहनों का भी विद्युतीकरण जरूरी होगा। इलेक्ट्रिक वाहनों में tailpipe emissions नहीं होते, इसलिए पेट्रोल और डीजल वाहनों से सीधे निकलने वाले प्रदूषकों को खत्म करने में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है। हालांकि, EV से होने वाले कुल पर्यावरणीय लाभ इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि उन्हें चार्ज करने के लिए बिजली किस स्रोत से आती है।
2050 तक बड़ा स्वास्थ्य लाभ संभव
ICCT के आकलन के मुताबिक, अगर भारत 2050 तक पूरी तरह zero-emission road transport की दिशा में आगे बढ़ता है, तो सड़क परिवहन प्रदूषण से जुड़ी करीब 17 लाख समयपूर्व मौतों को रोका जा सकता है। यह सिर्फ जलवायु नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा सवाल भी है। भारत में वाहनों की संख्या और शहरीकरण लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के साथ सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, पुराने प्रदूषणकारी वाहनों को हटाना और स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाना भी जरूरी होगा। तभी सड़क परिवहन के बढ़ते प्रदूषण को स्वास्थ्य संकट में बदलने से रोका जा सकेगा।
