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रास्ते याद रखने की आदत रख सकती है दिमाग को सक्रिय? Spatial Reasoning और Brain Health का कनेक्शन

किसी नए शहर में रास्ता याद रखना, बिना मोबाइल के किसी जगह तक पहुंचना, किसी बाजार या मोहल्ले की गलियों को दिमाग में व्यवस्थित करना या यह समझना कि एक जगह दूसरी जगह के मुकाबले किस दिशा और कितनी दूरी पर है-ये रोजमर्रा के सामान्य काम लग सकते हैं। लेकिन मस्तिष्क विज्ञान की रिसर्च बताती है कि ऐसे काम दिमाग के उन हिस्सों और तंत्रिका नेटवर्क को सक्रिय करते हैं, जो स्मृति, सीखने, ध्यान, निर्णय लेने और स्थानिक समझ से जुड़े होते हैं। खास तौर पर हिप्पोकैम्पस नामक मस्तिष्क क्षेत्र हमारे आसपास की जगहों का मानसिक नक्शा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Vindhya Dubey12 अग. 2026, 07:38 PM IST
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रास्ते याद रखने की आदत रख सकती है दिमाग को सक्रिय? Spatial Reasoning और Brain Health का कनेक्शन

भारत जैसे तेजी से उम्रदराज होते देश में इस रिसर्च का महत्व और बढ़ जाता है। बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त, ध्यान और रास्ते पहचानने जैसी क्षमताओं में बदलाव आ सकते हैं। वहीं कुछ लोगों में स्थानिक दिशा पहचानने और परिचित जगहों पर रास्ता खोजने में लगातार परेशानी संज्ञानात्मक गिरावट के शुरुआती संकेतों में शामिल हो सकती है। इसलिए मस्तिष्क स्वास्थ्य को केवल याददाश्त के नजरिए से नहीं, बल्कि रास्ते पहचानने और स्थानिक तर्क जैसी क्षमताओं के नजरिए से भी देखना महत्वपूर्ण हो रहा है।

दिमाग रास्तों का मानसिक नक्शा कैसे बनाता है?

जब कोई व्यक्ति किसी नए इलाके में जाता है तो उसका दिमाग केवल सड़क का नाम या अगला मोड़ याद नहीं करता। वह आसपास की इमारतों, दुकानों, पेड़ों, चौराहों, दिशाओं, दूरी और अलग-अलग स्थानों के आपसी संबंधों को जोड़ता है। इन सभी जानकारियों को मिलाकर मस्तिष्क उस जगह की एक आंतरिक तस्वीर तैयार करता है, जिसे मानसिक नक्शा कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में हिप्पोकैम्पस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह मस्तिष्क क्षेत्र स्मृति बनाने और स्थानों के बीच संबंध समझने से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी रास्ते को याद करना सिर्फ दिशा याद करना नहीं, बल्कि स्मृति और स्थानिक समझ दोनों का इस्तेमाल करना है।

लंदन के टैक्सी चालकों ने दिखाई मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता

मानसिक नक्शे और मस्तिष्क के संबंध पर सबसे चर्चित शोध लंदन के टैक्सी चालकों पर हुआ। वहां टैक्सी चालकों को शहर की हजारों सड़कों, रास्तों और प्रमुख स्थानों को याद करना पड़ता था। शोधकर्ताओं ने उनके मस्तिष्क की तस्वीरों का अध्ययन किया और पाया कि टैक्सी चालकों के हिप्पोकैम्पस के कुछ हिस्सों में दूसरे लोगों की तुलना में अंतर दिखाई देता था। बाद में टैक्सी चालकों की तुलना बस चालकों से की गई। दोनों ही पेशेवर चालक थे, लेकिन टैक्सी चालकों को जटिल सड़क नेटवर्क में स्वतंत्र रूप से रास्ता खोजना पड़ता था, जबकि बस चालक आमतौर पर निर्धारित मार्गों पर चलते थे। इस अंतर ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि लगातार जटिल स्थानिक जानकारी का इस्तेमाल मस्तिष्क में अनुभव के अनुसार बदलाव यानी न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़ा हो सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि रास्ते याद करने से निश्चित रूप से हिप्पोकैम्पस का आकार बढ़ जाता है। शुरुआती शोध मुख्य रूप से अवलोकन आधारित थे और उनसे सीधे कारण और परिणाम साबित नहीं किया जा सकता।

भारत में इस शोध का महत्व क्यों बढ़ रहा है?

भारत में बुजुर्ग आबादी लगातार बढ़ रही है। उम्र बढ़ने के साथ संज्ञानात्मक स्वास्थ्य यानी याददाश्त, ध्यान, निर्णय लेने और स्थानिक समझ को बनाए रखना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण विषय बनता जा रहा है। भारत में लाखों बुजुर्ग किसी न किसी स्तर की संज्ञानात्मक समस्या या डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सामान्य उम्र बढ़ने और बीमारी से जुड़े संज्ञानात्मक बदलावों के बीच अंतर कैसे किया जाए। यहीं स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।

बार-बार रास्ता भूलना हमेशा सामान्य नहीं

उम्र बढ़ने पर कभी-कभार रास्ता भूल जाना सामान्य हो सकता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार उन जगहों पर रास्ता भूलने लगे जहां वह वर्षों से जाता रहा है, परिचित रास्तों को समझने में अचानक कठिनाई होने लगे या आसपास के प्रमुख स्थानों को पहचानने के बावजूद दिशा तय न कर पाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। शोध में स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता में गिरावट और संज्ञानात्मक कमजोरी के बीच संबंध देखा गया है। कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि डिमेंशिया के शुरुआती चरणों में व्यक्ति की स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि रास्ता भूलना अपने आप में अल्जाइमर रोग का प्रमाण है। लेकिन लगातार और असामान्य बदलाव संज्ञानात्मक स्वास्थ्य की जांच की जरूरत का संकेत हो सकते हैं।

अल्जाइमर में रास्ता पहचानने की क्षमता क्यों प्रभावित हो सकती है?

अल्जाइमर रोग में मस्तिष्क के उन हिस्सों पर असर पड़ सकता है जो स्मृति और स्थानिक समझ से जुड़े होते हैं। हिप्पोकैम्पस इसी नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी वजह से कुछ लोगों में रास्ता पहचानने, स्थानों को आपस में जोड़ने या परिचित वातावरण में दिशा समझने की समस्या दिखाई दे सकती है। कई बार व्यक्ति सामान्य बातचीत कर सकता है और रोजमर्रा की कुछ गतिविधियां भी ठीक से कर सकता है, लेकिन किसी परिचित इलाके में अचानक रास्ता भूलने लगता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता को अल्जाइमर और अन्य संज्ञानात्मक विकारों के अध्ययन में महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

भारत में जांच के लिए अलग दृष्टिकोण की जरूरत

भारत की आबादी बेहद विविध है। शिक्षा, साक्षरता, भाषा, ग्रामीण और शहरी जीवनशैली तथा तकनीक के इस्तेमाल में काफी अंतर है। इसलिए विदेशों में विकसित किसी स्थानिक दिशा पहचान परीक्षण को सीधे भारतीय आबादी पर लागू करना उचित नहीं होगा। भारत में ऐसे परीक्षणों को अलग-अलग भाषाओं, उम्र समूहों, शिक्षा स्तरों और ग्रामीण-शहरी परिस्थितियों में वैज्ञानिक रूप से जांचना जरूरी होगा। मुंबई की भीड़भाड़ वाली गलियां, दिल्ली की बड़ी सड़कें, किसी छोटे शहर का बाजार और गांव की पगडंडियां—इन सभी वातावरणों में व्यक्ति की स्थानिक समझ अलग तरीके से विकसित हो सकती है।

मोबाइल और नक्शे ने बदल दी रास्ता याद करने की आदत

आज मोबाइल फोन और जीपीएस ने रास्ता ढूंढना बेहद आसान बना दिया है। पहले लोग सड़क, दुकान, मंदिर, स्कूल, चौराहे और अन्य पहचान चिन्हों को याद करके रास्ता खोजते थे। अब मोबाइल हर मोड़ पर निर्देश दे देता है। कुछ शोधों ने लगातार जीपीएस पर निर्भर रहने और कमजोर स्थानिक स्मृति के बीच संबंध की संभावना दिखाई है। इसका संभावित कारण यह हो सकता है कि जब व्यक्ति खुद रास्ता समझता है तो उसे दिशाओं, दूरी और पहचान चिन्हों के बीच संबंध बनाना पड़ता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मोबाइल नक्शे या जीपीएस का इस्तेमाल डिमेंशिया का कारण है। ऐसा दावा करने के लिए अभी पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। सुरक्षित परिस्थितियों में कभी-कभी रास्ते को खुद समझने और याद रखने की कोशिश करना मस्तिष्क के लिए एक उपयोगी मानसिक गतिविधि हो सकती है।

रोजमर्रा के कौन से काम दिमाग को स्थानिक रूप से सक्रिय रख सकते हैं?

किसी नए बाजार का रास्ता याद करना, किसी नए इलाके में प्रमुख पहचान चिन्हों को पहचानना, बिना मोबाइल के परिचित रास्ते का विकल्प सोचना, नक्शा समझना, यात्रा के दौरान दिशाओं पर ध्यान देना और किसी स्थान की दूरी का अनुमान लगाना जैसी गतिविधियां स्थानिक समझ को सक्रिय कर सकती हैं। बुजुर्गों के लिए सुरक्षित परिस्थितियों में अलग-अलग पैदल मार्गों का इस्तेमाल करना, आसपास की जगहों को पहचानना और रास्तों को स्वयं याद रखने की कोशिश करना मानसिक सक्रियता का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इन गतिविधियों को डिमेंशिया का इलाज या बीमारी से बचाव की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

आभासी वास्तविकता से हो रही नई रिसर्च

वैज्ञानिक अब आभासी वास्तविकता तकनीक का इस्तेमाल करके भी स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता का अध्ययन कर रहे हैं। इसमें व्यक्ति को एक कृत्रिम वातावरण में रास्ता खोजने, पहचान चिन्ह याद रखने और अलग-अलग स्थानों के बीच संबंध समझने के लिए कहा जाता है। भविष्य में ऐसे परीक्षण संज्ञानात्मक कमजोरी की शुरुआती पहचान में उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए अभी बड़े और लंबे समय तक चलने वाले अध्ययनों की जरूरत है।

क्या मानसिक नक्शे डिमेंशिया से बचाते हैं?

यह इस पूरी रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि जटिल स्थानिक दिशा पहचानने की प्रक्रिया हिप्पोकैम्पस और मस्तिष्क के कई अन्य तंत्रिका नेटवर्क को सक्रिय करती है। लंबे समय तक जटिल रास्तों और स्थानों को याद करने वाली गतिविधियों को मस्तिष्क की अनुकूलन क्षमता से जोड़ा गया है। दूसरी ओर, स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता में गिरावट उम्र बढ़ने और कुछ मामलों में संज्ञानात्मक कमजोरी तथा अल्जाइमर रोग से जुड़ी पाई गई है। लेकिन अभी यह वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुआ है कि केवल मानसिक नक्शे बनाना या स्थानिक तर्क का अभ्यास करने से डिमेंशिया या अल्जाइमर रोग को निश्चित रूप से रोका जा सकता है। इसलिए इसे “मस्तिष्क की सुरक्षा” के बजाय मस्तिष्क को सक्रिय रखने और उसकी संज्ञानात्मक क्षमता को चुनौती देने वाली गतिविधि के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।

भारतीय परिवारों के लिए क्या है संदेश?

भारत में बढ़ती बुजुर्ग आबादी को देखते हुए परिवारों को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि बुजुर्ग चीजें भूल रहे हैं या नहीं। यह भी ध्यान देना चाहिए कि क्या वे परिचित जगहों को पहचान पा रहे हैं, रास्ते समझ पा रहे हैं और सामान्य रूप से दिशा निर्धारित कर पा रहे हैं। अगर किसी व्यक्ति में लंबे समय से परिचित रास्तों को लेकर अचानक और लगातार परेशानी शुरू हो जाए, बार-बार परिचित जगहों पर भटकने लगे या रास्ते और पहचान चिन्हों के बीच संबंध समझने में असामान्य कठिनाई होने लगे, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित हो सकता है। वहीं स्वस्थ लोगों के लिए संदेश सरल है-मस्तिष्क को भी शरीर की तरह सक्रिय रखना जरूरी है। नई चीजें सीखना, समस्याएं हल करना, याददाश्त का इस्तेमाल करना और आसपास के वातावरण को ध्यान से समझना मानसिक सक्रियता के अच्छे तरीके हो सकते हैं।


रास्ता याद रखना केवल दिशा पहचानने की क्षमता नहीं है। जब हम किसी इलाके का मानसिक नक्शा बनाते हैं, तो स्मृति, ध्यान, निर्णय क्षमता और स्थानिक तर्क से जुड़े मस्तिष्क नेटवर्क एक साथ काम करते हैं। भारत में बढ़ती बुजुर्ग आबादी और डिमेंशिया के बढ़ते बोझ के बीच स्थानिक दिशा पहचानने की क्षमता पर होने वाली रिसर्च आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए अगली बार किसी रास्ते को मोबाइल के बिना याद रखने की कोशिश करें तो इसे सिर्फ रास्ता याद करना न समझें। यह मस्तिष्क के लिए एक छोटी मानसिक कसरत हो सकती है। लेकिन इसे अल्जाइमर या डिमेंशिया से बचाव का निश्चित उपाय मानना अभी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।