general
उद्घाटन के 5 महीने बाद नोएडा एयरपोर्ट में जलभराव, ₹11,200 करोड़ की परियोजना पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश के जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 11 अगस्त 2026 को भारी बारिश के बाद टर्मिनल और पार्किंग क्षेत्र के बीच कुछ हिस्सों में जलभराव सामने आया। करीब ₹11,200 करोड़ की लागत वाले पहले चरण के इस एयरपोर्ट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च 2026 को किया था। एयरपोर्ट प्रशासन के मुताबिक पानी करीब 30 मिनट में निकाल दिया गया और उड़ानों का संचालन सामान्य रहा। हालांकि, नए एयरपोर्ट के यात्री क्षेत्र में पानी जमा होने की तस्वीरों ने इसकी ड्रेनेज व्यवस्था, प्री-मानसून तैयारी और सरकारी निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर इसे ‘एयरपोर्ट-कम-सीपोर्ट’ जैसे तंज के साथ वायरल किया गया, लेकिन असली मुद्दा यह है कि भविष्य में 7 करोड़ यात्रियों तक विस्तार की योजना वाले इस बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जलनिकासी व्यवस्था अत्यधिक बारिश के दबाव को कितना संभाल सकती है।

उत्तर प्रदेश के जेवर में बना नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट एक सामान्य एयरपोर्ट परियोजना नहीं है। इसे दिल्ली-NCR के विमानन नेटवर्क को विस्तार देने, उत्तर प्रदेश में निवेश और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने तथा भविष्य में देश के बड़े मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना के साथ तैयार किया गया है। इसके पहले चरण को लगभग ₹11,200 करोड़ के निवेश से विकसित किया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च 2026 को इसका उद्घाटन किया। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार पहले चरण में एयरपोर्ट की प्रारंभिक यात्री क्षमता 1.2 करोड़ यात्री प्रति वर्ष रखी गई है, जिसे भविष्य के विस्तार के बाद 7 करोड़ यात्री प्रति वर्ष तक बढ़ाने की योजना है।
लेकिन उद्घाटन के कुछ ही महीनों बाद 11 अगस्त 2026 को भारी बारिश के दौरान एयरपोर्ट के टर्मिनल और पार्किंग क्षेत्र के बीच पानी जमा होने के वीडियो सामने आए। वायरल तस्वीरों और वीडियो में यात्रियों की आवाजाही वाले हिस्से में पानी दिखाई दिया। कुछ रिपोर्टों में निकास क्षेत्र के पास अंडरपास में भी जलभराव का उल्लेख किया गया। एयरपोर्ट प्रशासन के अनुसार पानी को लगभग 30 मिनट में हटा दिया गया और उड़ान संचालन प्रभावित नहीं हुआ। यहीं से इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। सवाल यह नहीं है कि एयरपोर्ट पर पानी जमा होते ही वह “सीपोर्ट” बन गया या नहीं। सवाल यह है कि लगभग ₹11,200 करोड़ के निवेश से तैयार किए गए नए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की जलनिकासी व्यवस्था ने भारी बारिश के दौरान ऐसा क्यों होने दिया कि यात्री क्षेत्र में पानी जमा हो गया।
जिस एयरपोर्ट को विकास का प्रतीक बताया गया, वहीं जलभराव ने खड़े किए सवाल
28 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण का उद्घाटन किया था। उद्घाटन के दौरान इसे विकसित उत्तर प्रदेश और विकसित भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया। प्रधानमंत्री ने एयरपोर्ट को क्षेत्रीय विकास, कनेक्टिविटी और निवेश के लिए महत्वपूर्ण बताया। सरकारी जानकारी के मुताबिक एयरपोर्ट का लाभ आगरा, मथुरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, मेरठ, एटावा, बुलंदशहर और फरीदाबाद जैसे बड़े क्षेत्रों को मिलने की उम्मीद है। सरकार ने एयरपोर्ट को सिर्फ विमान उड़ाने और उतारने की सुविधा के रूप में नहीं देखा है। इसे सड़क, रेल, मेट्रो और क्षेत्रीय परिवहन प्रणालियों से जोड़कर एक मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब के रूप में विकसित करने की योजना है। एयरपोर्ट में मल्टी-मॉडल कार्गो हब भी प्रस्तावित है, जिसकी शुरुआती क्षमता 2.5 लाख मीट्रिक टन से अधिक सालाना बताई गई है और भविष्य में इसे करीब 18 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ाने की योजना है। ऐसे में मानसून के दौरान सामने आया जलभराव केवल एक स्थानीय पानी जमा होने की घटना नहीं रह जाता। यह इस सवाल को जन्म देता है कि जिस परियोजना को भविष्य की अत्याधुनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बताया जा रहा है, उसकी बुनियादी जलनिकासी व्यवस्था कितनी resilient है।
₹11,200 करोड़ की लागत के बाद जवाबदेही किसकी?
इस घटना को सीधे “सरकार की निर्माण विफलता” कहना अभी जल्दबाजी होगी। एयरपोर्ट का विकास और संचालन एक जटिल संस्थागत व्यवस्था के तहत होता है और किसी एक जलभराव की घटना से पूरे प्रोजेक्ट की निर्माण गुणवत्ता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन सरकारी जवाबदेही का सवाल पूरी तरह जायज है। क्योंकि यह परियोजना सार्वजनिक महत्व की विशाल बुनियादी संरचना है और इसके निर्माण, नियामकीय मंजूरियों, सुरक्षा मानकों, डिजाइन स्वीकृति तथा संचालन की निगरानी में सरकारी संस्थाओं की भूमिका रहती है। इसलिए अब यह जानना जरूरी है कि एयरपोर्ट की ड्रेनेज डिजाइन किस स्तर की बारिश को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी और क्या मानसून शुरू होने से पहले इसकी वास्तविक परिस्थितियों में जांच की गई थी। यदि सिस्टम को एक निश्चित वर्षा तीव्रता के लिए डिजाइन किया गया था, तो 11 अगस्त की बारिश उस क्षमता के मुकाबले कितनी थी, इसका आंकड़ा सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इसी तरह जिस जगह पानी जमा हुआ, वहां जलनिकासी की क्षमता कितनी थी और पानी जमा होने का कारण drainage capacity, surface runoff, drainage blockage, pumping requirement या किसी दूसरे तकनीकी कारण से जुड़ा था, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
‘30 मिनट में पानी निकल गया’—क्या यही पर्याप्त जवाब है?
एयरपोर्ट प्रशासन के अनुसार जलभराव को लगभग 30 मिनट में दूर कर दिया गया और उड़ान संचालन सामान्य रहा। यह निश्चित रूप से तत्काल आपदा-प्रबंधन क्षमता के पक्ष में जाता है। लेकिन किसी एयरपोर्ट की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि पानी जमा होने के बाद कितनी जल्दी उसे हटाया गया। असली सवाल यह भी है कि पानी जमा ही क्यों हुआ। अगर किसी नए एयरपोर्ट में भारी बारिश के बाद पानी जमा होता है और फिर पंप या अन्य व्यवस्था से उसे हटाया जाता है, तो यह जानना जरूरी है कि क्या यह व्यवस्था मूल डिजाइन का हिस्सा थी या आपातकालीन प्रतिक्रिया के तौर पर इस्तेमाल की गई। यदि यह डिजाइन का हिस्सा है तो उसकी क्षमता क्या है और यदि यह अतिरिक्त व्यवस्था है तो क्या इसे स्थायी समाधान माना जा सकता है।
मानसून से पहले क्या हुआ था प्री-ड्रेनेज ऑडिट?
सरकार और एयरपोर्ट प्रबंधन से सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि मानसून 2026 से पहले पूरे एयरपोर्ट परिसर का pre-monsoon drainage audit किया गया था या नहीं। एक बड़े एयरपोर्ट में केवल रनवे और टर्मिनल की सुरक्षा महत्वपूर्ण नहीं होती। यात्रियों के लिए बने approach roads, forecourt, parking areas, pedestrian passages, underpasses, service roads और अन्य low-lying points पर बारिश के पानी की निकासी भी महत्वपूर्ण होती है। अगर इन क्षेत्रों में कहीं पानी जमा होने की संभावना थी, तो क्या मानसून से पहले corrective measures किए गए थे?
क्या drains और storm-water channels की सफाई की गई थी?
क्या pumping systems का load test किया गया था?
क्या अत्यधिक बारिश की स्थिति के लिए backup व्यवस्था उपलब्ध थी?
क्या drainage outlets की capacity वास्तविक rainfall projections के अनुरूप है?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ एक निजी इमारत नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्व की परिवहन परियोजना है।
उद्घाटन के समय जिस एयरपोर्ट को ‘भविष्य की कनेक्टिविटी’ बताया गया, वहां climate resilience कितनी है?
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा उसकी भविष्य की क्षमता है। पहले चरण में 12 मिलियन यात्रियों की सालाना क्षमता और भविष्य में 70 मिलियन यात्रियों तक विस्तार की योजना है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में एयरपोर्ट पर यात्री और वाहन दबाव आज की तुलना में कई गुना बढ़ सकता है। यही कारण है कि अभी हुई जलभराव की घटना को केवल सोशल मीडिया के मजाक के रूप में खारिज करना उचित नहीं होगा। आज अगर सीमित यात्री क्षमता के दौर में किसी हिस्से में पानी जमा हुआ है, तो भविष्य में अधिक यात्री, अधिक वाहन, अधिक टर्मिनल गतिविधि और अत्यधिक बारिश की स्थिति में यही सिस्टम कितना प्रभावी रहेगा, यह एक वास्तविक infrastructure question है।
‘एयरपोर्ट-कम-सीपोर्ट’ का मजाक असली मुद्दे को छिपा सकता है
जलभराव के वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर “Airport-cum-Seaport”, “Airfloat” और नाव चलाने जैसे मजाक वायरल हुए। राजनीतिक स्तर पर भी इस घटना को लेकर सरकार पर निशाना साधा गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी जलभराव को लेकर सरकार पर कटाक्ष किया। लेकिन सोशल मीडिया का मजाक इस मामले के तकनीकी पक्ष को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या ₹11,200 करोड़ की पहली चरण वाली परियोजना के लिए तैयार की गई storm-water management व्यवस्था भविष्य की extreme rainfall परिस्थितियों के लिए पर्याप्त है।
सरकार को अब क्या करना चाहिए?
इस घटना के बाद सबसे बेहतर कदम होगा कि संबंधित सरकारी और एयरपोर्ट प्राधिकरण सार्वजनिक रूप से घटना की तकनीकी समीक्षा कराएं। इसमें उस दिन की कुल और अधिकतम वर्षा, प्रभावित क्षेत्र, पानी की गहराई, जलभराव की अवधि, drainage capacity, pumping capacity और पानी निकासी के वास्तविक कारणों की जानकारी शामिल होनी चाहिए। यदि जांच में drainage design या execution से जुड़ी कमी सामने आती है, तो उसे तत्काल ठीक किया जाना चाहिए। यदि किसी ठेकेदार, इंजीनियरिंग एजेंसी, maintenance agency या supervisory mechanism की लापरवाही पाई जाती है, तो जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा। इसके अलावा भविष्य में एयरपोर्ट की क्षमता बढ़ाने से पहले climate-resilience audit कराया जाना चाहिए। क्योंकि 12 मिलियन यात्रियों से 70 मिलियन यात्रियों की ओर बढ़ने वाला एयरपोर्ट केवल रनवे और टर्मिनल विस्तार से बड़ा नहीं बनेगा; उसे बारिश, बाढ़, गर्मी, जलनिकासी और अन्य extreme-weather परिस्थितियों के लिए भी ज्यादा मजबूत बनना होगा।
सवाल एयरपोर्ट की क्षमता का नहीं, सरकारी जवाबदेही की परीक्षा का है
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 11 अगस्त को हुआ जलभराव इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरा एयरपोर्ट खराब बना है या परियोजना विफल हो गई है। उड़ानों का संचालन प्रभावित नहीं हुआ और एयरपोर्ट प्रशासन के अनुसार पानी लगभग 30 मिनट में हटा दिया गया। लेकिन ₹11,200 करोड़ के निवेश, 28 मार्च 2026 के प्रधानमंत्री द्वारा किए गए उद्घाटन और भविष्य में 7 करोड़ यात्रियों तक क्षमता बढ़ाने की योजना के संदर्भ में यह घटना एक गंभीर infrastructure audit का आधार जरूर बनती है। सरकार के लिए असली चुनौती सोशल मीडिया के “एयरपोर्ट या सीपोर्ट” वाले तंज का जवाब देना नहीं है। असली चुनौती यह साबित करना है कि देश के इस बड़े नए एयरपोर्ट की डिजाइन, ड्रेनेज और मानसूनी preparedness भविष्य की भारी बारिश को भी संभाल सकती है। क्योंकि करोड़ों रुपये की परियोजना में पानी 30 मिनट में निकल जाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बेहतर स्थिति वह होगी जिसमें यात्रियों के रास्ते में पानी जमा ही न हो।
