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अब सिर्फ आयरन की गोली नहीं, एनीमिया पर 7X7X7 रणनीति से होगा पूरा इलाज
देश में एनीमिया की समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान को नए 7X7X7 फ्रेमवर्क के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी की है। सरकार ने 29 जून 2026 को 16वीं केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद की बैठक के दौरान अभियान की नई Operational Guidelines जारी की थीं। 11 अगस्त को जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, नई रणनीति पुराने 6X6X6 मॉडल से आगे बढ़कर एनीमिया की जांच, उपचार, कारणों की पहचान, खान-पान में सुधार, जनभागीदारी और डिजिटल ट्रैकिंग को एक साथ जोड़ती है।

सरकार ने यह नई गाइडलाइन 29 जून 2026 को 16वीं केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद की बैठक के दौरान जारी की थी। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 11 अगस्त 2026 को इसकी जानकारी सार्वजनिक की। नई रणनीति में एनीमिया की केवल जांच और इलाज पर ही नहीं, बल्कि इसके कारणों की पहचान, खान-पान में सुधार, उपचार के बाद निगरानी और जनभागीदारी पर भी जोर दिया गया है।
पुराने 6X6X6 मॉडल से आगे बढ़ा अभियान
एनीमिया मुक्त भारत अभियान अब 7X7X7 रणनीति के तहत संचालित किया जाएगा। इस रणनीति में सात लाभार्थी समूह, सात प्रमुख हस्तक्षेप और सात संस्थागत तंत्र शामिल किए गए हैं। नई रणनीति का उद्देश्य एनीमिया की रोकथाम और उपचार को स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ पोषण, शिक्षा, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और सामुदायिक भागीदारी से जोड़ना है।
ये सात समूह होंगे अभियान के केंद्र में
नई रणनीति में सात प्रमुख लाभार्थी समूहों को शामिल किया गया है।
- पहला समूह 6 से 59 महीने तक के बच्चों का है।
- दूसरे समूह में 5 से 9 वर्ष तक के बच्चे शामिल हैं।
- तीसरे समूह में 10 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियां हैं।
- चौथे समूह में गर्भवती महिलाएं शामिल हैं।
- पांचवें समूह में स्तनपान कराने वाली माताओं को रखा गया है।
- छठे समूह में 20 से 49 वर्ष की प्रजनन आयु वाली महिलाएं शामिल हैं।
- सातवें समूह में 0 से 6 महीने तक के कम वजन वाले नवजात शिशु शामिल किए गए हैं।
कम वजन वाले नवजातों को शामिल करना नई रणनीति का महत्वपूर्ण विस्तार है, क्योंकि सरकार अब जीवन के शुरुआती चरण से ही एनीमिया के जोखिम को कम करने पर जोर दे रही है।
एनीमिया से निपटने के लिए सात प्रमुख कदम
नई गाइडलाइन में सात प्रमुख हस्तक्षेप निर्धारित किए गए हैं।
- रोकथाम के लिए आयरन और फोलिक एसिड की खुराक देना।
- लाभार्थियों की हीमोग्लोबिन जांच को व्यापक बनाना। इसके लिए डिजिटल आक्रामक हीमोग्लोबिन मीटर के माध्यम से जांच की व्यवस्था को मजबूत करने की योजना है।
- एनीमिया पाए जाने पर उसकी गंभीरता के अनुसार उपचार देना। एनीमिया को हल्का, मध्यम और गंभीर श्रेणी में बांटकर निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार प्रबंधन किया जाएगा।
- कृमिनाशक दवा देना और प्रसव के दौरान विलंबित नाल काटने को बढ़ावा देना है।
- जनभागीदारी और जागरूकता अभियान है। इसका उद्देश्य एनीमिया को सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज करने की सोच को बदलना और आयरन-फोलिक एसिड की खुराक के नियमित सेवन को बढ़ावा देना है।
- एनीमिया के गैर-पोषण संबंधी कारणों की पहचान और उनका उचित प्रबंधन है।
- सही खान-पान को बढ़ावा देना है। इसके तहत स्थानीय रूप से उपलब्ध आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थों को रोजाना के भोजन में शामिल करने और आहार में विविधता लाने पर जोर दिया जाएगा।
अब T3 नहीं, T4 मॉडल से चलेगा अभियान
नई रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव T3 से T4 मॉडल की ओर बढ़ना है। पहले अभियान का जोर T3 यानी जांच, उपचार और बातचीत पर था। अब इसमें चौथा चरण ट्रैकिंग जोड़ा गया है। T4 का मतलब है: जांच, इलाज, जागरूकता, निगरानी यानी किसी व्यक्ति में एनीमिया पाए जाने के बाद केवल उपचार देना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसके उपचार, रेफरल और आगे के फॉलो-अप की भी निगरानी की जाएगी।
डिजिटल सिस्टम से होगी लाभार्थियों की ट्रैकिंग
नई रणनीति में डिजिटल व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य एनीमिया से जुड़ी सेवाओं का रिकॉर्ड तैयार करना और लाभार्थियों की स्थिति पर लगातार नजर रखना है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं का डेटा जननी पोर्टल से जोड़ा जाएगा। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए आरबीएसके पोर्टल का इस्तेमाल किया जाएगा। टीकाकरण के लिए पंजीकृत बच्चों से संबंधित जानकारी यू-विन पोर्टल से प्राप्त की जाएगी। इन डिजिटल प्रणालियों से मिलने वाली जानकारी को एनीमिया मुक्त भारत अभियान पोर्टल से जोड़कर जांच, उपचार, रेफरल और फॉलो-अप की निगरानी को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा।
एनीमिया की गंभीरता के आधार पर होगा इलाज
नई व्यवस्था में एनीमिया की पहचान के बाद उसकी गंभीरता निर्धारित करने पर जोर है। लाभार्थियों को हल्का, मध्यम और गंभीर एनीमिया की श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा। इसके बाद निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार उपचार और प्रबंधन किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर मामलों को केवल सामान्य आयरन की खुराक देकर छोड़ न दिया जाए और जरूरत पड़ने पर आगे की जांच या उच्च स्वास्थ्य केंद्र पर रेफरल किया जा सके। गाइडलाइन में पोषण संबंधी और गैर-पोषण संबंधी एनीमिया को अलग-अलग पहचानने पर जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि एनीमिया के हर मामले को केवल आयरन की कमी मानकर उपचार नहीं किया जाएगा। जिन मामलों में दूसरे कारणों की संभावना होगी, वहां उसके अनुसार जांच और प्रबंधन की दिशा तय की जाएगी।
रोज के खाने में आयरन बढ़ाने पर जोर
सरकार ने एनीमिया की रोकथाम में खान-पान की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बनाया है। ‘ईट राइट’ दृष्टिकोण के तहत लोगों को स्थानीय रूप से उपलब्ध आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थों को रोजाना के भोजन में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। आहार में विविधता बढ़ाने पर भी जोर होगा, ताकि एनीमिया की रोकथाम केवल सरकारी सप्लीमेंट पर निर्भर न रहे। एनीमिया मुक्त भारत अभियान की नई रणनीति में जनभागीदारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सरकार का लक्ष्य लोगों में यह समझ बढ़ाना है कि लगातार कमजोरी, थकान और एनीमिया को सामान्य स्थिति मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जागरूकता अभियान के जरिए लोगों को जांच कराने, उपचार पूरा करने और आयरन-फोलिक एसिड की खुराक नियमित रूप से लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
सात संस्थागत तंत्रों से मजबूत होगा अभियान
नई 7X7X7 रणनीति के तीसरे हिस्से में सात संस्थागत व्यवस्थाएं शामिल हैं। इनमें मंत्रालय के भीतर बेहतर समन्वय, एनीमिया पर राष्ट्रीय उत्कृष्टता एवं उन्नत अनुसंधान केंद्र, राष्ट्रीय एनीमिया मुक्त भारत अभियान इकाई, आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स को मजबूत करना, अन्य मंत्रालयों के साथ समन्वय, एनीमिया मुक्त भारत अभियान पोर्टल और टी4 आधारित डिजिटल निगरानी व्यवस्था शामिल हैं। गाइडलाइन में एनीमिया के खिलाफ ‘संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण’ अपनाने की बात कही गई है। एनीमिया केवल स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी समस्या नहीं है। इसका संबंध पोषण, भोजन, शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार से भी है। इसलिए विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय बढ़ाकर अभियान को व्यापक स्तर पर लागू करने का प्रयास किया जाएगा।
एनीमिया की रोकथाम और उपचार से संबंधित आयरन-फोलिक एसिड तथा अन्य जरूरी सामग्री स्वास्थ्य केंद्रों तक समय पर पहुंचती रहे, इसके लिए आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स को मजबूत करने को भी नई रणनीति का हिस्सा बनाया गया है। इससे अभियान के तहत दी जाने वाली सेवाओं और दवाओं की उपलब्धता को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। एनीमिया मुक्त भारत अभियान अब केवल आयरन की खुराक देने वाला कार्यक्रम नहीं रहेगा। नई रणनीति में पूरी प्रक्रिया को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। पहले लाभार्थी की जांच होगी। एनीमिया मिलने पर उसकी गंभीरता तय होगी। इसके बाद निर्धारित उपचार दिया जाएगा। लाभार्थी और परिवार को जागरूक किया जाएगा। खान-पान में सुधार पर जोर दिया जाएगा और अंत में उपचार तथा फॉलो-अप की डिजिटल निगरानी की जाएगी। यानी नई रणनीति का पूरा ढांचा जांच से शुरू होकर उपचार और निगरानी तक जाता है।
7X7X7 रणनीति का सार
- सात लाभार्थी समूह: 6 से 59 महीने के बच्चे, 5 से 9 वर्ष के बच्चे, 10 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियां, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, 20 से 49 वर्ष की महिलाएं और 0 से 6 महीने के कम वजन वाले नवजात।
- सात हस्तक्षेप: आयरन-फोलिक एसिड की रोकथामात्मक खुराक, एनीमिया जांच, उपचार, कृमिनाशक दवा और विलंबित नाल काटना, जनभागीदारी, गैर-पोषण संबंधी कारणों का समाधान और आयरन से भरपूर भोजन व आहार विविधता।
- सात संस्थागत तंत्र: अंतर-मंत्रालयीय समन्वय, राष्ट्रीय उत्कृष्टता एवं अनुसंधान केंद्र, राष्ट्रीय अभियान इकाई, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, अन्य मंत्रालयों से समन्वय, अभियान पोर्टल और टी4 आधारित डिजिटल निगरानी।
एनीमिया मुक्त भारत अभियान की नई 7X7X7 रणनीति का उद्देश्य एनीमिया की समस्या से निपटने के तरीके को अधिक व्यापक बनाना है। सरकार अब जांच के बाद उपचार और उपचार के बाद फॉलो-अप तक पूरी प्रक्रिया को जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। T4 मॉडल के जरिए जांच, इलाज, जागरूकता और डिजिटल निगरानी को एक साथ लाने की कोशिश की गई है, जबकि पोषण और गैर-पोषण संबंधी दोनों कारणों पर ध्यान देकर एनीमिया नियंत्रण को अधिक प्रभावी बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
