health

शोध से प्रकाशन तक आयुर्वेद छात्रों को मिलेगा सहयोग, CCRAS की ‘प्रयत्न’ पहल पर जोर

आयुर्वेद के क्षेत्र में शोध की गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रकाशनों को बेहतर बनाने के लिए केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी सीसीआरएएस ने शोध क्षमता निर्माण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें पीजी और पीएचडी शोधार्थियों के लिए ‘प्रयत्न’ पहल, डिजिटल शोध मंच, शोध संस्थानों की गुणवत्ता मान्यता और रिसर्च मेथडोलॉजी पर नई पाठ्यपुस्तक शामिल हैं।

Vindhya Dubey12 अग. 2026, 08:30 PM IST
खबर शेयर करें:
शोध से प्रकाशन तक आयुर्वेद छात्रों को मिलेगा सहयोग, CCRAS की ‘प्रयत्न’ पहल पर जोर

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, आयुष मंत्रालय के तहत आयुर्वेद में वैज्ञानिक आधार पर शोध के निर्माण, समन्वय, विकास और प्रसार के लिए प्रमुख संस्था है। सरकार ने 11 अगस्त 2026 को आयुर्वेद में शोध क्षमता निर्माण से जुड़ी इन पहलों की जानकारी साझा की।

पीजी और पीएचडी शोधार्थियों के लिए ‘प्रयत्न’ पहल

सीसीआरएएस की प्रमुख पहल ‘प्रयत्न’ का उद्देश्य आयुर्वेद के पीजी और पीएचडी शोधार्थियों में वैज्ञानिक लेखन की क्षमता विकसित करना है। इस पहल के जरिए शोधार्थियों को बेहतर वैज्ञानिक लेख तैयार करने, शोध परिणामों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने और उच्च गुणवत्ता वाली शोध पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य आयुर्वेद क्षेत्र में प्रकाशित होने वाले शोध कार्यों की गुणवत्ता सुधारना और शोध परिणामों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित करना है।

कैसे काम करती है ‘प्रयत्न’ योजना?

  1. आयुर्वेद कॉलेज और संस्थान अभिरुचि की अभिव्यक्ति यानी ईओआई के माध्यम से आवेदन करते हैं। 
  2. चयनित संस्थानों और शोधार्थियों के लिए दो ऑनलाइन अभिमुखीकरण सत्र आयोजित किए जाते हैं। इन सत्रों में वैज्ञानिक लेखन की बुनियादी जानकारी दी जाती है। 
  3. शोधार्थियों को उनके व्यक्तिगत शोध-पत्रों के लिए अलग-अलग स्तर पर सहायता दी जाती है।
  4. शोध-पांडुलिपियों की समीक्षा के बाद संबंधित संस्थानों में तीन दिन की प्रत्यक्ष कार्यशाला आयोजित की जाती है। इसमें शोधार्थियों को व्यावहारिक और प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिया जाता है।
  5. पूरी प्रक्रिया के बाद शोधार्थियों की पांडुलिपियों को प्रकाशन के लिए तैयार करने पर काम किया जाता है।

यानी ‘प्रयत्न’ का पूरा मॉडल प्रशिक्षण से आगे बढ़कर शोधार्थी के वास्तविक शोध-पत्र को प्रकाशन योग्य बनाने तक जाता है।

वैज्ञानिक लेखन पर क्यों दिया जा रहा है जोर?

किसी भी शोध का प्रभाव केवल शोध किए जाने तक सीमित नहीं रहता। शोध के निष्कर्षों को वैज्ञानिक समुदाय तक पहुंचाने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली वैज्ञानिक पांडुलिपि और प्रकाशन जरूरी होता है। आयुर्वेद में शोध को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप मजबूत करने के लिए शोध प्रश्न तैयार करने, शोध पद्धति, आंकड़ों के विश्लेषण, नैतिक पहलुओं और वैज्ञानिक लेखन जैसे कौशल महत्वपूर्ण हैं। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सीसीआरएएस ने शोधार्थियों की क्षमता बढ़ाने के लिए ‘प्रयत्न’ पहल को आगे बढ़ाया है।

सीसीआरएएस ने बनाया डिजिटल रिसर्च डैशबोर्ड

शोध क्षमता निर्माण के साथ-साथ सीसीआरएएस ने अपने डिजिटल संसाधनों को एकीकृत करने के लिए CCRAS Digital Initiatives Dashboard भी विकसित किया है। यह एक ऐसा एकीकृत डिजिटल मंच है, जहां सीसीआरएएस की विभिन्न वेब आधारित और डिजिटल सेवाओं तथा शोध संसाधनों को एक ही जगह उपलब्ध कराया गया है। इसका उद्देश्य शोध परिणामों, संस्थागत संसाधनों और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान बनाना है। डैशबोर्ड में अलग-अलग श्रेणियों के लिए कई सेक्शन बनाए गए हैं। इनमें कार्यालय से जुड़ी डिजिटल सेवाएं, सीसीआरएएस संस्थानों की वेबसाइट, आंतरिक अनुप्रयोग, सूचना विज्ञान और पॉइंट ऑफ केयर से जुड़े पोर्टल, ज्ञान और साहित्य पोर्टल, योजनाओं से जुड़े पोर्टल तथा अन्य वेब पोर्टल शामिल हैं। इसके अलावा मोबाइल एप्लीकेशन, विशेष परियोजनाओं के अनुप्रयोग, परीक्षण के तहत एप्लीकेशन, सीसीआरएएस की शोध पत्रिकाएं और सोशल मीडिया पेज भी इसमें शामिल हैं। डैशबोर्ड में खोज की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे शोधकर्ताओं और अन्य उपयोगकर्ताओं के लिए संबंधित संसाधन ढूंढना आसान हो सकता है।

शोध संस्थानों की गुणवत्ता पर भी जोर

सरकार ने सीसीआरएएस के संस्थानों और प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय मान्यता प्रणालियों से जुड़ी स्थिति भी साझा की है। सीसीआरएएस के कई संस्थान राष्ट्रीय अस्पताल एवं स्वास्थ्य सेवा प्रदाता प्रत्यायन बोर्ड यानी एनएबीएच से मान्यता प्राप्त हैं। इनमें नई दिल्ली, भुवनेश्वर, जयपुर, ग्वालियर, कोलकाता, नागपुर, जम्मू, विजयवाड़ा, गुवाहाटी, मुंबई और लखनऊ स्थित संस्थान शामिल हैं। क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, जयपुर और ग्वालियर की एनएबीएच मान्यता 12 मार्च 2029 तक वैध है। क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, जम्मू की मान्यता 11 मई 2029 तक और आरआरएपी-केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, मुंबई की मान्यता 2 अप्रैल 2027 तक वैध है। केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की मान्यता 6 अक्टूबर 2028 तक वैध है। कुछ संस्थानों की मान्यता के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है।

प्रयोगशालाओं को एनएबीएल मान्यता

शोध की गुणवत्ता के साथ प्रयोगशाला परीक्षणों की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए सीसीआरएएस के कई संस्थानों की प्रयोगशालाओं को राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड यानी एनएबीएल से भी मान्यता प्राप्त है। एनएबीएल मान्यता प्राप्त संस्थानों में कोलकाता, बेंगलुरु, नई दिल्ली, नागपुर, गुवाहाटी, ग्वालियर, पटियाला, जयपुर, तिरुवनंतपुरम, जम्मू, विजयवाड़ा, अहमदाबाद, पटना, लखनऊ, मुंबई, मंडी और भुवनेश्वर स्थित सीसीआरएएस संस्थान शामिल हैं। केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु की प्रयोगशाला को आईएसओ 15189:2022 के तहत 2 अप्रैल 2026 से 1 अप्रैल 2030 तक मान्यता प्राप्त है। इसके अलावा परीक्षण और अंशांकन प्रयोगशालाओं के लिए आईएसओ/आईईसी 17025:2017 के तहत भी सीसीआरएएस के कई संस्थानों को मान्यता मिली हुई है। इनमें चेन्नई, झांसी, ग्वालियर, पुणे और चेरुथुरुथी स्थित संस्थान शामिल हैं।

रिसर्च मेथडोलॉजी पर नई किताब

शोध क्षमता निर्माण की दिशा में सीसीआरएएस ने ‘आयुर्वेद प्रबोधिनी ग्रंथमाला’ श्रृंखला के तहत ‘रिसर्च मेथडोलॉजी’ पर एक व्यापक पाठ्यपुस्तक भी तैयार की है। यह पुस्तक विशेष रूप से आयुर्वेद में एमडी और एमएस कर रहे स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। पाठ्यक्रम राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग यानी एनसीआईएसएम द्वारा लागू किए गए परिणाम-आधारित और गतिशील पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयार किया गया है।

शोध प्रश्न से लेकर वैज्ञानिक लेखन तक की जानकारी

इस पाठ्यपुस्तक में शोध पद्धति से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है। इसमें साहित्य खोज, शोध प्रश्न तैयार करना, परिकल्पना निर्धारित करना, शोध डिजाइन, आंकड़ों का विश्लेषण, नैतिक पहलू और वैज्ञानिक लेखन जैसे विषय शामिल हैं। इसका उद्देश्य आयुर्वेद के स्नातकोत्तर छात्रों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें शोध की पूरी प्रक्रिया को समझने और लागू करने के लिए सक्षम बनाना है।

21 अध्याय और 6 मॉड्यूल

रिसर्च मेथडोलॉजी की इस पुस्तक में कुल 21 अध्याय हैं। इन्हें पाठ्यक्रम के छह अलग-अलग मॉड्यूल की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। पुस्तक तैयार करने में आयुष और आधुनिक वैज्ञानिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया है। इसमें 34 वैज्ञानिकों और 16 संकाय सदस्यों का योगदान रहा है। इसमें वरिष्ठ प्रोफेसर, विषय विशेषज्ञ और शोध पेशेवर शामिल रहे। प्रत्येक अध्याय को तीन चरणों से गुजारा गया है-संरचित प्रारूप तैयार करना, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा और चरणबद्ध संपादकीय सुधार।

आयुर्वेद शोध को वैज्ञानिक आधार देने की कोशिश

सीसीआरएएस की इन पहलों को आयुर्वेद में शोध की गुणवत्ता और वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करने की व्यापक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। ‘प्रयत्न’ के जरिए जहां शोधार्थियों को वैज्ञानिक लेखन और प्रकाशन की व्यावहारिक ट्रेनिंग दी जा रही है, वहीं रिसर्च मेथडोलॉजी की नई पुस्तक शोध की बुनियादी समझ मजबूत करने का प्रयास है। दूसरी ओर, एनएबीएच और एनएबीएल जैसी मान्यता व्यवस्थाओं से संस्थानों और प्रयोगशालाओं में गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने पर जोर दिखाई देता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से शोध संसाधनों तक पहुंच आसान

सीसीआरएएस डिजिटल इनिशिएटिव्स डैशबोर्ड इस पूरी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण डिजिटल हिस्सा है। एक ही मंच पर शोध पत्रिकाओं, ज्ञान एवं साहित्य संसाधनों, संस्थागत वेबसाइटों, मोबाइल एप्लीकेशन और विभिन्न डिजिटल अनुप्रयोगों को उपलब्ध कराने से शोधार्थियों और विशेषज्ञों के लिए संसाधनों तक पहुंच आसान बनाने का लक्ष्य है। इससे आयुर्वेद से जुड़े शोध परिणामों के प्रसार और संस्थागत संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

आयुर्वेद में नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को तैयार करने पर जोर

सीसीआरएएस की नई पहलों का व्यापक उद्देश्य आयुर्वेद के क्षेत्र में ऐसी शोध क्षमता विकसित करना है, जिसमें शोधार्थी आधुनिक शोध पद्धति, वैज्ञानिक लेखन, आंकड़ों के विश्लेषण, नैतिक मानकों और प्रभावी प्रकाशन की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ सकें। ‘प्रयत्न’, डिजिटल डैशबोर्ड, मान्यता प्राप्त संस्थान और प्रयोगशालाएं तथा रिसर्च मेथडोलॉजी की नई पाठ्यपुस्तक-इन सभी पहलों को एक साथ देखें तो आयुर्वेद में शोध क्षमता निर्माण के लिए प्रशिक्षण, तकनीक, गुणवत्ता और प्रकाशन को एक ही व्यापक ढांचे में जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। सरकार के अनुसार, इस पहल का लक्ष्य आयुर्वेद क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाले शोध प्रकाशनों को बढ़ावा देना और शोध परिणामों के प्रभावी प्रसार के जरिए आयुर्वेद में वैज्ञानिक अनुसंधान को और मजबूत करना है।