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नाबालिग से रेप केस में बरी आरोपी को बड़ा झटका, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

नाबालिग पीड़िता के यौन अपराध से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने निचली अदालत के बरी करने के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषी ठहराने का रास्ता साफ कर दिया। अदालत ने पीड़िता की गवाही और मामले में सामने आए साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए कहा कि केवल मामूली विसंगतियों के आधार पर विश्वसनीय बाल पीड़िता की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। यह फैसला नाबालिग पीड़िताओं की गवाही और रेप मामलों में साक्ष्यों के न्यायिक मूल्यांकन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Sonali12 अग. 2026, 08:32 PM IST
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नाबालिग से रेप केस में बरी आरोपी को बड़ा झटका, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला

महाराष्ट्र के औरंगाबाद से सामने आए करीब 14 साल पुराने यौन अपराध के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय महज छह साल की बच्ची से यौन हमले का सटीक और विस्तार से वर्णन करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। सिर्फ इसलिए उसकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि वह यौन कृत्य को वयस्कों की तरह शब्दों में नहीं बता पाई।

जस्टिस संदीपकुमार सी. मोरे और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की पीठ ने 10 अगस्त 2026 को State of Maharashtra v. Anil Shridhar Gaikwad मामले में फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट का acquittal रद्द कर दिया। आरोपी को IPC की धारा 363 के तहत 3 साल और धारा 376 के तहत 7 साल की कठोर कारावास की सजा दी गई। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

2012 में छह साल की बच्ची के साथ क्या हुआ था?

मामला 3 मई 2012 का है। उस समय पीड़िता की उम्र लगभग छह साल थी। घटना के दिन उसकी मां बाजार गई हुई थी और बच्ची अपनी चाची के घर टीवी देख रही थी।

अभियोजन के मुताबिक आरोपी बच्ची को आटा चक्की तक चलने के बहाने अपने साथ ले गया। इसके बाद वह उसे बांध की ओर ले गया और उसकी आंखों पर कपड़ा बांधा।

बाद में बच्ची इमली के पेड़ के नीचे बेहोशी की हालत में मिली। उसके निजी अंग से खून निकल रहा था। होश में आने के बाद उसने परिवार को बताया कि आरोपी उसे वहां लेकर गया था। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और IPC की धाराओं 363, 376 और 323 के तहत मामला दर्ज हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने 2017 में आरोपी को क्यों बरी किया?

Additional Sessions Judge, Aurangabad ने 19 अप्रैल 2017 को आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों में कई कथित विसंगतियों और कमियों को महत्व दिया। इनमें कुछ गवाहों की गवाही, बच्ची की शुरुआती मेडिकल जांच, घटना स्थल के विवरण में अंतर और Chemical Analysis reports से जुड़े पहलू शामिल थे। ट्रायल कोर्ट ने इस बात को भी महत्व दिया था कि बच्ची यौन गतिविधि का स्पष्ट विवरण नहीं दे सकी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस approach को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट बोला- छह साल की बच्ची से ‘सटीक यौन विवरण’ की उम्मीद गलत

हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय बच्ची केवल छह साल की थी। इतनी कम उम्र के बच्चे से यौन हमले की प्रकृति और पूरे घटनाक्रम को कानूनी या वयस्क भाषा में समझाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता trauma की स्थिति में हो सकती है और उसे यह भी पूरी तरह समझ न हो कि उसके साथ वास्तव में क्या हुआ। इसलिए केवल इस आधार पर उसकी testimony को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने sexual act का स्पष्ट विवरण नहीं दिया।


साढ़े चार साल बाद भी बच्ची ने आरोपी की पहचान की

हाईकोर्ट के फैसले में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई।

घटना मई 2012 में हुई थी, जबकि बच्ची की examination-in-chief फरवरी 2017 में हुई। यानी लगभग साढ़े चार साल बाद भी उसने अदालत में आरोपी की पहचान की और घटना का विवरण अपनी उम्र एवं समझ के अनुसार बताया। कोर्ट ने उसकी cross-examination को भी देखा और पाया कि उसकी मुख्य गवाही इस प्रक्रिया में कमजोर नहीं हुई। अदालत ने इस consistency को उसकी credibility के पक्ष में महत्वपूर्ण माना।  बच्ची ने आरोपी की पहचान “Anya” के नाम से की थी और बाद में video conference के माध्यम से पेश किए गए आरोपी की भी पहचान की थी। 

Child victim की गवाही को adult witness की तरह नहीं परखा जा सकता

इस फैसले का बड़ा कानूनी महत्व यही है कि हाईकोर्ट ने child victim की testimony को उसकी उम्र और मानसिक क्षमता के संदर्भ में देखने पर जोर दिया। अदालत ने माना कि छह साल के बच्चे से उस घटना का वैसा detailed narration अपेक्षित नहीं हो सकता जैसा किसी वयस्क गवाह से किया जाता है। इसलिए छोटे-मोटे contradictions या घटना को पूरी तरह articulate न कर पाने को अकेले prosecution case खत्म करने वाला आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब मुख्य testimony अन्य evidence से supported हो।

क्या हाईकोर्ट ने केवल बच्ची की गवाही पर सजा दी?

नहीं।

यह भी इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू है। हाईकोर्ट ने बच्ची की testimony को medical और circumstantial evidence के साथ पढ़ा। Court ने medical examination के findings और आरोपी की निशानदेही पर हुई recovery को भी evidence के समग्र मूल्यांकन में शामिल किया। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि conviction केवल बच्ची की गवाही पर नहीं बल्कि उसके बयान और corroborating evidence के संयुक्त मूल्यांकन पर आधारित थी।

मेडिकल रिपोर्ट में क्या मिला?

फैसले में medical certificate का उल्लेख करते हुए कहा गया कि बच्ची के कपड़ों और genital area पर blood stains पाए गए थे। Medical findings में hymen rupture और second-degree perineal tear का भी उल्लेख था। डॉक्टर की clinical findings को हाईकोर्ट ने prosecution version के समर्थन में महत्वपूर्ण माना।

आरोपी की निशानदेही पर बच्ची का कपड़ा बरामद

फैसले के मुताबिक 20 मई 2012 को आरोपी की निशानदेही पर नदी के पास घास से बच्ची का undergarment बरामद किया गया था। उस पर blood stains पाए गए थे। हालांकि Chemical Analysis report निर्णायक नहीं थी, हाईकोर्ट ने इस recovery को अकेले नहीं बल्कि पीड़िता की गवाही और अन्य evidence के साथ देखा।

घटना स्थल के विवरण में अंतर से भी केस खत्म नहीं हुआ

बचाव पक्ष ने घटना स्थल को लेकर अलग-अलग विवरणों का मुद्दा उठाया था। पीड़िता के बयान में maize crop का उल्लेख था, जबकि दूसरे evidence में इमली के पेड़ और अलग location description सामने आया। हाईकोर्ट ने इन अंतर को पूरे evidence के संदर्भ में देखा और माना कि केवल location description में अंतर से prosecution case को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

POCSO Act इस मामले में क्यों लागू नहीं हुआ?

यह एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य है। घटना 3 मई 2012 की है। इसलिए यह POCSO Act, 2012 के लागू होने से पहले की घटना है। आरोपी के खिलाफ कार्रवाई उस समय लागू IPC provisions के तहत हुई। हाईकोर्ट ने sentencing के समय विशेष रूप से घटना की तारीख और उस समय लागू IPC Section 376 के प्रावधान को ध्यान में रखा।

इसलिए इस खबर में इसे “POCSO Act के तहत 7 साल की सजा” लिखना सही नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला क्यों पलटा?

हाईकोर्ट ने पूरे evidence की दोबारा समीक्षा की। अदालत के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने बच्ची की testimony की credibility को सही तरीके से appreciate नहीं किया और कुछ minor discrepancies को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का approach evidence की गलत reading और material evidence की सही appreciation न करने से प्रभावित था। इसी आधार पर acquittal को set aside किया गया।

Supreme Court के पुराने फैसलों का भी सहारा

Acquittal के खिलाफ appeal के scope को लेकर हाईकोर्ट ने Supreme Court के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें Ghurey Lal, Shingara Singh और Chandrappa शामिल हैं। इन फैसलों से संबंधित सिद्धांत यह है कि appellate court acquittal के खिलाफ appeal में evidence को दोबारा assess कर सकता है, लेकिन reasonable view होने की स्थिति में सावधानी से हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। वहीं, यदि trial court का निष्कर्ष evidence की गलत समझ या perversity पर आधारित हो, तो appellate court acquittal को पलट सकता है।

आरोपी को कितनी सजा मिली?

हाईकोर्ट ने आरोपी को:

  • IPC Section 363: 3 साल की rigorous imprisonment और ₹3,000 जुर्माना
  • IPC Section 376: 7 साल की rigorous imprisonment और ₹5,000 जुर्माना

    की सजा सुनाई। 

दोनों सजाएं concurrent यानी साथ-साथ चलेंगी। Section 363 के जुर्माने का भुगतान न करने पर एक महीने और Section 376 के जुर्माने का भुगतान न करने पर तीन महीने की अतिरिक्त imprisonment का आदेश दिया गया।

सात साल की सजा, लेकिन पूरी सात साल जेल नहीं?

यहां भी एक महत्वपूर्ण बात है। आरोपी 14 मई 2012 से 19 अप्रैल 2017 तक custody में रहा था। यानी trial के दौरान वह करीब पांच साल जेल में रह चुका था।

हाईकोर्ट ने उस अवधि का set-off दिया है। इसलिए सात साल की sentence में पहले से बिताई गई custody period को adjust किया जाएगा। Court ने आरोपी को remaining sentence भुगतने के लिए surrender करने का निर्देश दिया है।


आरोपी को एक महीने में करना होगा surrender

High Court ने आरोपी को आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर संबंधित trial court के समक्ष surrender करने का निर्देश दिया है। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो trial court को उसके खिलाफ necessary steps लेने के निर्देश दिए गए हैं।

पीड़िता को compensation क्यों नहीं दिया गया?

फैसले का एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा compensation से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने compensation देने से इनकार किया। कोर्ट ने ध्यान दिया कि घटना के समय पीड़िता छह साल की थी, जबकि judgment के समय उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी। वह शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। अदालत ने माना कि compensation claim की प्रक्रिया में उसे दोबारा अदालत के सामने आकर बचपन की traumatic घटना याद करनी पड़ सकती है और उसकी वर्तमान settled life प्रभावित हो सकती है। इसी consideration के आधार पर court ने compensation award नहीं किया।

इस फैसले का कानूनी महत्व क्या है?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि child sexual assault victim की testimony को उसकी उम्र और परिस्थितियों को नजरअंदाज करके adult witness के पैमाने पर नहीं परखा जा सकता। यदि बच्चा घटना को पूरी तरह स्पष्ट या तकनीकी भाषा में बयान नहीं कर पाता, तो केवल इस कमी के आधार पर उसकी testimony को खारिज करना उचित नहीं है। Court को उसके पूरे बयान, consistency, conduct, medical evidence और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को एक साथ देखना होगा।

इस मामले में Bombay High Court ने इसी समग्र दृष्टिकोण को अपनाते हुए करीब नौ साल पुराने acquittal को पलट दिया और आरोपी को IPC Sections 363 और 376 के तहत दोषी ठहराया।

करीब 14 साल पुराने इस मामले में Bombay High Court ने trial court के acquittal को पलटते हुए आरोपी को दोषी ठहराया है। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि छह साल की child victim से sexual assault का पूरा और सटीक विवरण बताने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लगभग साढ़े चार साल बाद भी बच्ची की पहचान और मुख्य testimony में consistency, medical findings तथा recovery evidence को साथ में देखते हुए हाईकोर्ट ने prosecution case को विश्वसनीय माना। अदालत ने trial court द्वारा minor discrepancies को दिए गए महत्व को पर्याप्त नहीं माना और acquittal को set aside कर दिया। आरोपी को IPC Section 376 में सात साल और Section 363 में तीन साल की कठोर कारावास की सजा दी गई है, लेकिन पहले से बिताई गई custody का set-off मिलेगा। इस फैसले की एक महत्वपूर्ण कानूनी सीख यह है कि नाबालिग यौन अपराध पीड़िता की गवाही को उसकी उम्र, trauma और समझ के संदर्भ में परखा जाना चाहिए, न कि वयस्क गवाह के पैमाने पर।