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‘एक जड़ी-बूटी, एक मानक’ से पारंपरिक औषधियों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता होगी मजबूत

PCIM&H और IPC ने ‘वन हर्ब, वन स्टैंडर्ड’ पहल के तहत MoU को तीन साल के लिए नवीनीकृत किया है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी में इस्तेमाल औषधीय पौधों के लिए समान वैज्ञानिक गुणवत्ता मानक तय करना है। पहले चरण में 50 मोनोग्राफ तैयार किए गए थे। नई पहल से दवाओं की गुणवत्ता, वैश्विक स्वीकार्यता और निर्यात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

Vindhya Dubey12 अग. 2026, 08:33 PM IST
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‘एक जड़ी-बूटी, एक मानक’ से पारंपरिक औषधियों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता होगी मजबूत

भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले औषधीय पौधों की गुणवत्ता, शुद्धता और वैज्ञानिक मानकीकरण को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आयुष मंत्रालय के अधीन भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी के लिए फार्माकोपिया आयोग PCIM&H और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन भारतीय फार्माकोपिया आयोग IPC ने ‘वन हर्ब, वन स्टैंडर्ड’ यानी ‘एक जड़ी-बूटी, एक मानक’ पहल के लिए अपने समझौता ज्ञापन MoU को अगले तीन वर्षों के लिए नवीनीकृत किया है। इस पहल का मूल उद्देश्य भारत में अलग-अलग पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाली एक ही औषधीय वनस्पति के लिए समान, स्पष्ट, वैज्ञानिक और विश्वसनीय गुणवत्ता मानक तैयार करना है। इससे आयुर्वेद, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, यूनानी और होम्योपैथी में इस्तेमाल होने वाले समान औषधीय पौधों के मानकों में मौजूद संभावित अंतर को कम करने और एक अधिक समन्वित गुणवत्ता व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलेगी।


कर्तव्य भवन में हुआ MoU का नवीनीकरण

12 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में आयोजित कार्यक्रम में PCIM&H की निदेशक प्रभारी डॉ. कौस्थुभा उपाध्याय और IPC के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेल्वन ने नवीनीकृत समझौता ज्ञापन का आदान-प्रदान किया। यह कार्यक्रम आयुष मंत्रालय के राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री श्री प्रतापराव गणपतराव जाधव तथा आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा की उपस्थिति में आयोजित हुआ। इस अवसर पर दोनों संस्थानों के अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने औषधीय पौधों के वैज्ञानिक मानकीकरण और पारंपरिक औषधियों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में संस्थागत सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया।


क्या है ‘वन हर्ब, वन स्टैंडर्ड’ पहल?

‘वन हर्ब, वन स्टैंडर्ड’ पहल का उद्देश्य एक ही औषधीय पौधे के लिए अलग-अलग पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में अलग-अलग गुणवत्ता मानकों की स्थिति को कम करना है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई औषधीय वनस्पति आयुर्वेद के साथ-साथ यूनानी, सिद्ध या सोवा-रिग्पा में भी इस्तेमाल होती है, तो उसके लिए वैज्ञानिक पहचान और गुणवत्ता के आधार पर एक समान तथा समन्वित मानक विकसित किया जा सके। इस व्यवस्था में औषधीय पौधे की पहचान, उसकी गुणवत्ता, शुद्धता और उससे संबंधित वैज्ञानिक विशेषताओं को निर्धारित करने पर जोर दिया जाता है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त समान औषधीय पौधे की गुणवत्ता का मूल्यांकन एक स्पष्ट और वैज्ञानिक आधार पर किया जाए।


2022 में शुरू हुआ था सहयोग

PCIM&H और IPC के बीच यह सहयोग वर्ष 2022 में शुरू हुआ था। पहले चरण में ‘वन हर्ब, वन स्टैंडर्ड’ अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए 50 औषधीय पौधों के मोनोग्राफ सफलतापूर्वक विकसित किए गए। मोनोग्राफ किसी औषधीय पदार्थ या पौधे की पहचान और गुणवत्ता से जुड़े वैज्ञानिक मानकों का विस्तृत दस्तावेज होता है। इसमें उस औषधीय पौधे की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए आवश्यक वैज्ञानिक मानकों और परीक्षण संबंधी पहलुओं को व्यवस्थित किया जाता है। पहले चरण में तैयार किए गए 50 मोनोग्राफ ने इस पहल के लिए आधार तैयार किया है। अब नवीनीकृत तीन वर्षीय समझौते के तहत इस कार्य को और विस्तारित किया जाएगा।


अगले तीन वर्षों में क्या होगा?

नवीनीकृत MoU के तहत PCIM&H और IPC मिलकर पौधों से प्राप्त उन एकल औषधीय द्रव्यों के लिए वैज्ञानिक रूप से मजबूत गुणवत्ता मानक विकसित करने पर काम करेंगे, जिनका उपयोग आयुर्वेद, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, यूनानी और होम्योपैथी जैसी प्रणालियों में किया जाता है। इस सहयोग में अलग-अलग चिकित्सा प्रणालियों के बीच मानकों के सामंजस्य पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें एक ही औषधीय पौधे के लिए गुणवत्ता मूल्यांकन का आधार अधिक स्पष्ट और एकरूप हो। नवीनीकृत सहयोग की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि नए मोनोग्राफ तैयार करते समय भारतीय मानकों के साथ अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाएगा। इसका व्यापक उद्देश्य भारतीय औषधीय पौधों और पारंपरिक औषधीय उत्पादों की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत करना है। यदि भारतीय मानक अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता आवश्यकताओं के साथ बेहतर तरीके से सामंजस्य स्थापित करते हैं, तो इससे भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता और वैश्विक स्वीकार्यता को बढ़ावा मिल सकता है।


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पारंपरिक चिकित्सा उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ाने की कोशिश

केंद्रीय मंत्री श्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां देश की समृद्ध ज्ञान परंपरा और औषधीय वनस्पति विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में इन प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाली औषधियों की गुणवत्ता और शुद्धता सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक रूप से विकसित गुणवत्ता मानक पारंपरिक औषधियों की विश्वसनीयता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ‘एक जड़ी-बूटी, एक मानक’ पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका व्यावसायिक और नियामकीय प्रभाव भी है। औषधीय पौधों के लिए स्पष्ट और समान गुणवत्ता मानक उपलब्ध होने से निर्माताओं, निर्यातकों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और नियामक संस्थाओं के लिए प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है। अलग-अलग प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले समान पौधों के लिए यदि गुणवत्ता मूल्यांकन का आधार अधिक स्पष्ट हो, तो इससे परीक्षण और नियामकीय प्रक्रियाओं में संभावित भ्रम कम करने में मदद मिल सकती है। सरकार के अनुसार, इससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को भी बढ़ावा मिल सकता है। स्पष्ट मानकों के कारण उद्योग जगत के लिए गुणवत्ता आवश्यकताओं को समझना और उनके अनुरूप प्रक्रियाएं विकसित करना आसान हो सकता है।

निर्यात और वैश्विक बाजार में संभावनाएं

भारत लंबे समय से आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के लिए जाना जाता है। भारतीय औषधीय पौधों और पारंपरिक औषधीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में संभावनाओं को देखते हुए गुणवत्ता और मानकीकरण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैश्विक बाजारों में किसी भी औषधीय उत्पाद की स्वीकार्यता के लिए गुणवत्ता, सुरक्षा और मानकीकरण से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाण महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में भारतीय औषधीय पौधों के लिए अधिक स्पष्ट और अंतरराष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्ता मानक तैयार करने से भविष्य में निर्यात और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए बेहतर आधार तैयार हो सकता है।


जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर भी जोर

यह पहल केवल औषधियों की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। इसे भारत की जैव विविधता और पारंपरिक औषधीय ज्ञान के संरक्षण से भी जोड़ा गया है। भारत में विभिन्न क्षेत्रों में अनेक औषधीय पौधों का पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है। इनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, पहचान और गुणवत्ता मानकीकरण से देश की औषधीय वनस्पति विरासत को व्यवस्थित रूप से संरक्षित करने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक मानकों के विकास से पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक गुणवत्ता मूल्यांकन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की संभावना भी बढ़ती है। PCIM&H और IPC के बीच सहयोग को अंतर-मंत्रालयी समन्वय के उदाहरण के तौर पर भी देखा जा रहा है। एक ओर आयुष मंत्रालय के अधीन संस्थान पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों और उनसे जुड़े औषधीय पदार्थों के मानकीकरण पर काम कर रहा है, वहीं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन IPC औषधीय मानकों के क्षेत्र में अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता के साथ इस प्रयास में सहयोग कर रहा है। इस प्रकार दोनों संस्थानों की वैज्ञानिक और मानक-निर्धारण विशेषज्ञता को एक साथ लाकर औषधीय पौधों के लिए अधिक व्यापक और समन्वित गुणवत्ता ढांचा विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।


भारत को वैश्विक मानक-निर्धारक बनाने की दिशा में कदम

केंद्रीय मंत्री श्री जाधव ने कहा कि इस प्रकार के समन्वित प्रयास भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को मजबूत करने में योगदान दे सकते हैं। उनका कहना है कि वैज्ञानिक मानकों को मजबूत करना भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक है।

सरकार का लक्ष्य केवल भारतीय बाजार में गुणवत्ता सुधारना नहीं, बल्कि भारतीय औषधीय पौधों, पारंपरिक औषधियों और उनके गुणवत्ता मानकों को वैश्विक स्तर पर अधिक स्वीकार्य बनाना भी है।


नए MoU से पहल को मिलेगी नई गति

पहले चरण में 50 मोनोग्राफ विकसित किए जाने के बाद अब नवीनीकृत तीन वर्षीय MoU इस पहल के विस्तार का आधार बनेगा। अगले चरण में अधिक औषधीय पौधों के लिए वैज्ञानिक और harmonised standards विकसित किए जाने की दिशा में काम होगा। इससे एक ही औषधीय पौधे के लिए विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में मानकों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करने, गुणवत्ता आश्वासन को मजबूत करने और हितधारकों के बीच अस्पष्टता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। ‘एक जड़ी-बूटी, एक मानक’ पहल भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैज्ञानिक गुणवत्ता मानकों के साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। PCIM&H और IPC के बीच अगले तीन वर्षों का नवीनीकृत सहयोग औषधीय पौधों के मानकीकरण, गुणवत्ता आश्वासन, उद्योग के लिए सुगमता, वैश्विक स्वीकार्यता और भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत के संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है।