law-order

नेताजी पर टिप्पणी विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, BJP सांसद के खिलाफ Suo Motu केस से इनकार

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि यदि किसी सक्षम वकील को मामला गंभीर लगता है तो वह कानून के तहत उचित याचिका दाखिल कर सकता है। वहीं जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि हेट स्पीच के आरोपों की जांच स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर की जाएगी।

Sonali13 अग. 2026, 07:26 PM IST
खबर शेयर करें:
नेताजी पर टिप्पणी विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, BJP सांसद के खिलाफ Suo Motu केस से इनकार

नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026।

 नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर BJP के राज्यसभा सांसद नागेंद्र रॉय उर्फ अनंत महाराज की कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान यानी Suo Motu केस शुरू करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मामले को खारिज करने के बजाय संबंधित वकील को उचित याचिका दाखिल करने को कहा। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने सवाल किया कि जब एक सक्षम वकील स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, तो Suo Motu कार्रवाई की मांग क्यों की जा रही है।


क्या हुआ सुप्रीम कोर्ट में?

मामला CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उठाया गया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। एक वकील ने BJP के राज्यसभा सांसद नागेंद्र रॉय उर्फ अनंत महाराज द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर की गई कथित टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने का अनुरोध किया।

वकील की दलील सुनने के बाद CJI सूर्यकांत ने कहा कि यदि वकील सक्षम है और अदालत के सामने मामले को रख सकता है, तो उसे उचित याचिका दाखिल करनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि Suo Motu अधिकार का इस्तेमाल हर विवादित बयान या हर सार्वजनिक शिकायत में नियमित प्रक्रिया के तौर पर नहीं किया जा सकता।


CJI सूर्यकांत ने Suo Motu पर क्या कहा?

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने Suo Motu कार्रवाई की परिस्थितियों को समझाते हुए कहा कि अदालत आम तौर पर ऐसे असाधारण मामलों में स्वत: संज्ञान लेती है जहां प्रभावित व्यक्ति या वर्ग स्वयं अदालत तक पहुंचने में सक्षम नहीं होता। CJI ने पर्यावरण और जंगलों से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए कहा कि जंगल स्वयं अदालत में आकर अपनी बात नहीं रख सकता। इसी तरह ऐसे मामले भी हो सकते हैं जहां हाशिए पर रहने वाले या बेहद कमजोर लोग न्यायालय तक पहुंचने की स्थिति में न हों। CJI ने एक 83 वर्षीय विधवा और उसके दृष्टिहीन बेटे से जुड़े मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अदालत को खुद आगे आना पड़ सकता है। लेकिन जब अदालत के सामने एक सक्षम वकील मौजूद है, तो वह नियमित कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल कर सकता है।


वकील ने NCERT मामले का दिया उदाहरण

सुनवाई के दौरान वकील ने सुप्रीम कोर्ट के उस मामले का भी उल्लेख किया जिसमें NCERT की एक किताब को लेकर अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया था। वकील का तर्क था कि जब न्यायपालिका को कथित रूप से बदनाम करने वाले कंटेंट पर सुप्रीम कोर्ट Suo Motu कार्रवाई कर सकता है, तो नेताजी जैसे राष्ट्रीय नेता को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी पर भी स्वत: संज्ञान लिया जाना चाहिए। इस पर CJI सूर्यकांत ने दोबारा कहा कि इस मामले में उचित याचिका दाखिल की जाए।


जस्टिस बागची ने हेट स्पीच के आरोप पर क्या कहा?

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आरोप यह है कि किसी व्यक्ति ने ऐसा भाषण दिया जो हेट स्पीच के समान है। ऐसे आरोपों की जांच स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर की जानी होगी। इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त की सुनवाई में सांसद की कथित टिप्पणी को हेट स्पीच घोषित नहीं किया। अदालत ने केवल यह कहा कि यदि ऐसा आरोप है तो उसे उचित याचिका के माध्यम से कानूनी जांच के लिए सामने लाया जाए।


SC ने BJP सांसद को क्लीन चिट नहीं दी

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने BJP सांसद नागेंद्र रॉय को कोई क्लीन चिट नहीं दी है। अदालत ने न तो कथित बयान को सही ठहराया और न ही यह कहा कि बयान कानून के मुताबिक वैध है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल स्वत: संज्ञान लेने से इनकार किया है। यदि कोई संबंधित पक्ष उचित याचिका दाखिल करता है, तो अदालत आगे कथित बयान, उसके संदर्भ, उपलब्ध सामग्री और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच कर सकती है।


विवाद की शुरुआत जुलाई में कैसे हुई?

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर विवाद जुलाई 2026 में शुरू हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, BJP सांसद नागेंद्र रॉय उर्फ अनंत महाराज ने नेताजी की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका और आजाद हिंद फौज की क्षमता को लेकर सवाल उठाए थे। कुछ रिपोर्टों में उनके हवाले से कहा गया कि नेताजी के पास आजाद हिंद फौज जैसी सेना को संगठित करने की क्षमता नहीं थी और आजाद हिंद फौज की भूमिका को लेकर भी उन्होंने विवादित टिप्पणी की थी। बाद में नेताजी को कथित रूप से “वॉर क्रिमिनल” बताए जाने की बात भी सामने आई, जिसके बाद विवाद और ज्यादा बढ़ गया। हालांकि, इन बयानों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त की सुनवाई में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।


राजबंशी बुद्धिजीवियों ने भी जताई आपत्ति

विवाद बढ़ने के बाद राजबंशी समुदाय से जुड़े कई शिक्षाविदों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य प्रमुख लोगों ने संयुक्त रूप से सांसद की कथित टिप्पणियों की आलोचना की। उन्होंने इन टिप्पणियों को भ्रामक और अपमानजनक बताते हुए बिना शर्त माफी की मांग की। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी एक व्यक्ति के बयान को पूरे राजबंशी समुदाय की राय नहीं माना जाना चाहिए।


BJP के भीतर से भी उठी आवाज

मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। BJP के वरिष्ठ नेता तथागत रॉय ने भी अनंत महाराज की नेताजी को लेकर कथित टिप्पणियों पर चिंता जताई। उन्होंने पार्टी नेतृत्व से इस विवाद पर ध्यान देने की मांग की और कहा कि नेताजी जैसे बंगाल में अत्यंत सम्मानित व्यक्तित्व को लेकर विवाद राजनीतिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है।

इससे साफ हुआ कि मामला केवल विपक्ष और BJP के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि BJP के भीतर से भी इस पर प्रतिक्रिया सामने आई।


12 अगस्त को पुलिस कार्रवाई की मांग

सुप्रीम कोर्ट में मामला उठाए जाने से एक दिन पहले यानी 12 अगस्त को पश्चिम बंगाल में नेताजी को लेकर कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट पर कार्रवाई की मांग भी तेज हुई। BJP के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कथित आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने पोस्ट हटाने और माफी मांगने की बात कही तथा यह रेखांकित किया कि कानून सांसदों, विधायकों और अन्य लोगों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। इसके बाद 13 अगस्त को यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा। 11 अगस्त को राजनीतिक विरोध भी हुआ विवाद के बीच 11 अगस्त को कोलकाता में नेताजी से जुड़े कार्यक्रम के दौरान भी राजनीतिक तनाव देखने को मिला। नेताजी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि देने के दौरान राजनीतिक नारेबाजी की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम ने नेताजी पर कथित टिप्पणियों को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे विवाद को और तेज कर दिया।


Suo Motu का मतलब क्या है?

Suo Motu का अर्थ है अदालत द्वारा बिना किसी औपचारिक याचिका के स्वयं किसी मामले का संज्ञान लेना। संवैधानिक अदालतें गंभीर सार्वजनिक महत्व के मामलों में इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकती हैं। लेकिन 13 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि Suo Motu कार्रवाई असाधारण परिस्थितियों के लिए है। यदि संबंधित व्यक्ति या सक्षम वकील सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के जरिए अदालत में मामला ला सकता है, तो उचित याचिका दाखिल करना सामान्य और उपयुक्त रास्ता है।


इस मामले में आगे क्या होगा?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर कोई केस शुरू नहीं किया है। अदालत ने संबंधित वकील को उचित याचिका दाखिल करने को कहा है। यदि याचिका दाखिल की जाती है, तो उसमें कथित भाषण की वास्तविक सामग्री, उसका संदर्भ, उपलब्ध वीडियो या अन्य रिकॉर्ड, शिकायतों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर अदालत से राहत मांगी जा सकती है। इसके बाद अदालत यह तय कर सकती है कि मामले में कानूनी कार्रवाई की जरूरत है या नहीं। इस पूरे मामले में 13 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने कथित टिप्पणी को सही या गलत घोषित नहीं किया। कोर्ट ने न तो इसे हेट स्पीच माना और न ही BJP सांसद को क्लीन चिट दी। अदालत ने केवल यह कहा कि जब मामला उठाने वाला सक्षम वकील मौजूद है, तो वह उचित याचिका दाखिल करे। इसलिए आगे की कानूनी लड़ाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित पक्ष किस आधार पर याचिका दाखिल करता है और उसमें क्या राहत मांगता है।