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मां से रेप के दोषी बेटे पर कोर्ट का कड़ा फैसला, 15 साल की सजा बरकरार; गुवाहाटी HC बोला- पारिवारिक भरोसा तोड़ने वाली यौन हिंसा पर नरमी नहीं

जिस रिश्ते में मां को अपने बेटे से सुरक्षा और भरोसे की उम्मीद होती है, उसी रिश्ते के टूटने के मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 29 जुलाई 2026 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने मां से बलात्कार के दोषी 33 वर्षीय बेटे की 15 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया, जिसमें पारिवारिक रिश्तों के भीतर होने वाली यौन हिंसा को विश्वास की बुनियाद पर गंभीर हमला माना गया है।

Sonali13 अग. 2026, 07:26 PM IST
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मां से रेप के दोषी बेटे पर कोर्ट का कड़ा फैसला, 15 साल की सजा बरकरार; गुवाहाटी HC बोला- पारिवारिक भरोसा तोड़ने वाली यौन हिंसा पर नरमी नहीं

गुवाहाटी/आइजोल:

 अपनी ही मां से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए गए 33 वर्षीय व्यक्ति को गुवाहाटी हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट की आइजोल बेंच ने 29 जुलाई 2026 को दिए अपने फैसले में आरोपी की दोषसिद्धि और 15 साल की कठोर कारावास की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। जस्टिस माइकल जोथनखुमा और जस्टिस बुडी हाबुंग की डिवीजन बेंच ने कहा कि यौन हिंसा के मामले में यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसा पैदा करने वाली है, तो उसे केवल स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में खारिज नहीं किया जा सकता। यह फैसला अब 13 अगस्त 2026 को कानूनी समाचार प्लेटफॉर्मों पर प्रमुखता से रिपोर्ट किए जाने के बाद सामने आया है। यानी आदेश की तारीख 29 जुलाई 2026 है, जबकि इसकी रिपोर्टिंग बाद में हुई है।

2023 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 15 साल की सजा

यह मामला Sh. Lalzarmawia v. The State of Mizoram के नाम से सामने आया। आरोपी को Additional Sessions Judge-I, Aizawl की अदालत ने 5 जुलाई 2023 को दोषी ठहराया था। इसके दो दिन बाद यानी 7 जुलाई 2023 को अदालत ने उसे 15 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी पर ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया था। जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में उसे तीन महीने का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना था। आरोपी ने इस फैसले को गुवाहाटी हाईकोर्ट की आइजोल बेंच में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल साक्ष्य और आरोपी की दलीलों पर विचार करने के बाद अपील खारिज कर दी।

आरोपी ने मां की गवाही पर उठाए थे सवाल

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से मुख्य दलील यह थी कि उसकी मां का Section 164 CrPC के तहत दर्ज बयान और ट्रायल के दौरान अदालत में दिया गया बयान पूरी तरह समान नहीं था। बचाव पक्ष ने इन कथित विरोधाभासों के आधार पर अभियोजन की कहानी पर सवाल उठाया। आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि उसकी बहन को अभियोजन पक्ष ने गवाह के रूप में पेश नहीं किया, जबकि कथित तौर पर घटना के बाद पीड़िता ने उसे घटना की जानकारी दी थी। लेकिन हाईकोर्ट को इन दलीलों में ऐसा कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं मिला, जिससे अभियोजन का पूरा मामला अविश्वसनीय हो जाए।

पीड़िता की भरोसेमंद गवाही अकेले भी बन सकती है आधार

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने बलात्कार के मामलों में पीड़िता की गवाही के कानूनी महत्व को दोहराते हुए कहा कि यदि उसकी testimony विश्वसनीय और confidence-inspiring है, तो उसके आधार पर अकेले भी दोषसिद्धि कायम की जा सकती है। हालांकि इस मामले में अभियोजन का मामला केवल पीड़िता की गवाही पर निर्भर नहीं था। अदालत ने मेडिकल रिकॉर्ड और घटना के तुरंत बाद सामने आए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर भी विचार किया।

मेडिकल रिपोर्ट में मिली थी ताजा चोट

मेडिकल साक्ष्य भी इस मामले में महत्वपूर्ण रहा। अदालत के समक्ष मौजूद मेडिकल रिकॉर्ड में डॉक्टर ने पीड़िता के labia minora पर fresh laceration यानी ताजा चोट दर्ज की थी। हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य को पीड़िता के बयान के साथ पढ़ा और पाया कि उपलब्ध सामग्री अभियोजन की कहानी को समर्थन देती है।

घटना के तुरंत बाद पड़ोसी ने देखी थी पीड़िता की हालत

मामले में एक पड़ोसी की गवाही भी सामने आई। पड़ोसी ने घटना के बाद पीड़िता को डरी और परेशान अवस्था में देखने की बात कही थी। रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता ने संकेत दिया था कि उसके बेटे ने उसके साथ बलात्कार किया है। हाईकोर्ट ने घटना के तुरंत बाद पीड़िता की स्थिति और इस गवाही को भी मामले के परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में महत्व दिया।

“नशे में था और घटना याद नहीं” वाली दलील भी नहीं चली

आरोपी ने Section 313 CrPC के तहत अपने बयान में कहा था कि घटना के समय वह नशे में था और उसे कथित घटना की याद नहीं थी। उसने यह भी कहा कि उसे विश्वास नहीं था कि वह ऐसा अपराध कर सकता है। लेकिन अदालत ने इस स्पष्टीकरण को अभियोजन की विश्वसनीय गवाही को कमजोर करने वाला पर्याप्त आधार नहीं माना।

बहन को गवाह नहीं बनाने से केस कमजोर नहीं हुआ

बचाव पक्ष ने आरोपी की बहन को गवाह नहीं बनाए जाने को भी अभियोजन के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश की। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि बहन कथित घटना की प्रत्यक्षदर्शी नहीं थी। इसलिए उसे अभियोजन गवाह के तौर पर पेश न किए जाने से ऐसा कोई prejudice नहीं हुआ, जिससे ट्रायल या आरोपी के अधिकार प्रभावित होते।

सुप्रीम कोर्ट के Bhanei Prasad फैसले का भी सहारा

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सुप्रीम कोर्ट के Bhanei Prasad alias Raju v. State of Himachal Pradesh मामले का संदर्भ है। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2025 को एक पिता द्वारा अपनी नाबालिग बेटी के साथ यौन हिंसा के मामले में incestuous sexual violence को बेहद गंभीर अपराध माना था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि परिवार के भीतर होने वाली ऐसी यौन हिंसा पारिवारिक विश्वास की बुनियाद को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती है और ऐसे अपराधों पर कठोर न्यायिक प्रतिक्रिया आवश्यक है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इसी न्यायिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां मौजूदा मामले में भी एक हद तक लागू होती हैं, क्योंकि यहां भी अपराधी और पीड़िता के बीच बेहद करीबी पारिवारिक रिश्ता था—आरोपी पीड़िता का अपना बेटा था।

मां के खिलाफ बेटे का अपराध, कोर्ट ने माना बेहद गंभीर

हाईकोर्ट ने इस पहलू को विशेष महत्व दिया कि कथित अपराध किसी अजनबी द्वारा नहीं बल्कि पीड़िता के अपने बेटे द्वारा किया गया था। पारिवारिक रिश्ते में मौजूद विश्वास और सुरक्षा की भावना का उल्लंघन इस मामले की गंभीरता को और बढ़ाता है। यही वजह है कि अदालत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा incestuous sexual violence के संबंध में व्यक्त किए गए विचारों को मौजूदा मामले के संदर्भ में प्रासंगिक माना।

झूठे आरोप की वजह भी कोर्ट को नहीं मिली

अदालत ने पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता का आकलन करते हुए यह भी देखा कि क्या उसके पास अपने ही बेटे को झूठे मामले में फंसाने का कोई स्पष्ट कारण था।

हाईकोर्ट को ऐसा कोई विश्वसनीय कारण सामने नहीं मिला। अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों और गवाही को समग्र रूप से देखने के बाद पीड़िता के बयान पर भरोसा किया।

Section 164 CrPC के बयान को लेकर भी कोर्ट ने दलील खारिज की

आरोपी ने मजिस्ट्रेट के सामने Section 164 CrPC के तहत दर्ज बयान और ट्रायल में दिए गए बयान के बीच अंतर का मुद्दा उठाया था। अदालत ने माना कि बयान में मामूली अंतर अपने आप में अभियोजन के पूरे मामले को खारिज करने का आधार नहीं बनता। अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि क्या कथित अंतर मामले के मूल तथ्य और अभियोजन की कहानी को प्रभावित करता है। उसे ऐसा कोई material contradiction नहीं मिला जो पीड़िता की पूरी गवाही को अविश्वसनीय बना दे।

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस फैसले में तीन कानूनी बातें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। पहली, बलात्कार के मामलों में विश्वसनीय पीड़िता की गवाही स्वयं दोषसिद्धि का आधार बन सकती है।

दूसरी, अदालत केवल अलग-अलग बयानों में छोटे अंतर देखकर पूरी गवाही को खारिज नहीं कर सकती; उसे यह देखना होगा कि विरोधाभास मामले के मूल तथ्य को कितना प्रभावित करता है। तीसरी, परिवार के भीतर होने वाली यौन हिंसा को अदालत ने केवल सामान्य sexual offence के रूप में नहीं देखा, बल्कि familial trust के गंभीर उल्लंघन के रूप में भी माना।

कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी दलीलों, गवाहों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर विचार करने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही 15 साल की कठोर कारावास की सजा और दोषसिद्धि बरकरार रही। यह फैसला पारिवारिक रिश्तों में होने वाली यौन हिंसा के मामलों में अदालतों के सख्त रुख को दर्शाता है। खास तौर पर हाईकोर्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट के incestuous sexual violence से जुड़े सिद्धांत को मां-बेटे के मामले में लागू करना इस फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।