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भारत में शिक्षा की जमीनी तस्वीर: स्कूल पहुंच रहे बच्चे, फिर भी छूट रही पढ़ाई

गुजरात में बढ़ते स्कूल ड्रॉपआउट के आंकड़े शिक्षा व्यवस्था की जमीनी गुणवत्ता पर सवाल खड़े करते हैं। योजनाओं, स्मार्ट कक्षाओं और शिक्षक भर्ती के बावजूद असली चुनौती बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और बेहतर शिक्षा देने की है। सवाल सिर्फ शिक्षक की संख्या का नहीं, बल्कि उनकी योग्यता, प्रशिक्षण और पढ़ाने की क्षमता का भी है। आखिर कागज पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कक्षा में मिलने वाली शिक्षा के बीच इतना अंतर।

Vindhya Dubey13 अग. 2026, 09:38 PM IST
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भारत में शिक्षा की जमीनी तस्वीर: स्कूल पहुंच रहे बच्चे, फिर भी छूट रही पढ़ाई

गुजरात की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़े केवल स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है-क्या राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वास्तव में कक्षा तक पहुंच रही है या फिर शिक्षा से जुड़ी योजनाएं, घोषणाएं और आंकड़े कागज पर ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहे हैं? एक तरफ सरकारें स्मार्ट कक्षाओं, डिजिटल शिक्षा, विद्यालयों के आधुनिकीकरण, नई शिक्षा नीति, शिक्षक प्रशिक्षण और नई भर्ती को शिक्षा में सुधार की दिशा में बड़े कदम के तौर पर पेश करती हैं। दूसरी तरफ गुजरात में माध्यमिक स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने की ऊंची दर, कक्षा 12 तक कम रिटेंशन और बड़ी संख्या में स्कूल से बाहर बच्चों की पहचान यह सवाल खड़ा करती है कि शिक्षा व्यवस्था की असली कमजोरी आखिर कहां है। इस पूरी तस्वीर में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक हैं।

शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़, लेकिन सवाल गुणवत्ता का

किसी भी स्कूल में भवन, कंप्यूटर, डिजिटल बोर्ड और प्रयोगशाला कितनी भी अच्छी क्यों न हो, बच्चे के सीखने की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शिक्षक ही होता है। गुजरात में करीब 11 हजार प्राथमिक शिक्षकों के पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू किए जाने की खबर सामने आई है। इनमें पुराने लंबित पदों के साथ नए स्वीकृत पद भी शामिल बताए गए हैं। यह भर्ती केवल सरकारी नौकरी देने का आंकड़ा नहीं है। इसे शिक्षा व्यवस्था की उस जरूरत के रूप में देखना होगा जहां पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध कराना जरूरी है। हालांकि केवल शिक्षक पद खाली होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बच्चे इसी वजह से स्कूल छोड़ रहे हैं। स्कूल से बाहर होने के पीछे गरीबी, परिवार का पलायन, बाल श्रम, घरेलू जिम्मेदारियां, सामाजिक परिस्थितियां और स्कूल तक पहुंच जैसी कई वजहें हो सकती हैं। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि जिन बच्चों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक बनाए रखने की चुनौती है, क्या उन्हें हर स्तर पर पर्याप्त और विषय के अनुरूप शिक्षक मिल रहे हैं?

सिर्फ शिक्षक होना काफी नहीं, पढ़ाने की क्षमता भी जरूरी

शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी भूल तब होती है जब शिक्षक की उपलब्धता को ही शिक्षा की गुणवत्ता मान लिया जाता है। किसी विद्यालय में शिक्षक मौजूद है, इसका अर्थ यह नहीं कि हर बच्चा अपेक्षित स्तर पर सीख भी रहा है। शिक्षक के पास संबंधित विषय की पर्याप्त समझ होनी चाहिए। उसे कमजोर विद्यार्थियों की पहचान करनी चाहिए। उसे यह पता होना चाहिए कि बच्चा पिछली कक्षा की कौन-सी बुनियादी अवधारणा नहीं समझ पाया है। उसे अलग-अलग क्षमता वाले बच्चों को साथ लेकर चलना चाहिए। यानी शिक्षक की योग्यता केवल प्रमाणपत्र से तय नहीं होती। असली परीक्षा कक्षा में होती है। यही वजह है कि भारत में शिक्षक भर्ती के साथ-साथ शिक्षक प्रशिक्षण और उनकी पेशेवर क्षमता पर भी सवाल उठना जरूरी है।

क्या शिक्षण अब सिर्फ स्थिर नौकरी का विकल्प बन रहा है?

शिक्षा व्यवस्था की चर्चा में एक असहज सवाल यह भी है कि शिक्षक बनने की प्रेरणा क्या है? सरकारी शिक्षक की नौकरी को देश में लंबे समय से स्थिर वेतन, नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सम्मान से जोड़ा जाता रहा है। ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि शिक्षक पेशे में आने वाले युवाओं के लिए बच्चों को पढ़ाना प्राथमिक प्रेरणा है या स्थिर सरकारी रोजगार भी बड़ी वजह है। यह कहना कि शिक्षण अब “आखिरी विकल्प” बन गया है, बिना व्यापक सर्वेक्षण के तथ्य के रूप में सही नहीं होगा। लेकिन यह सवाल पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि एक योग्य उम्मीदवार और एक प्रभावी शिक्षक में अंतर होता है। डिग्री होना, शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करना और प्रशिक्षण प्राप्त करना जरूरी है, लेकिन इसके बाद असली सवाल यह है कि शिक्षक कक्षा में उस योग्यता का इस्तेमाल किस तरह करता है।

बच्चे की सीख ही शिक्षक की असली परीक्षा

यदि किसी बच्चे ने कई वर्षों तक स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन वह अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार पढ़ नहीं पा रहा, बुनियादी गणित नहीं कर पा रहा या सामान्य अवधारणाओं को समझने में लगातार पीछे है, तो शिक्षा व्यवस्था को अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी होगी। यहां केवल शिक्षक को दोष देना भी सही नहीं होगा। एक शिक्षक पर यदि कई कक्षाओं का भार है, विषय के अनुरूप शिक्षक उपलब्ध नहीं है, उसे लगातार प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक काम दिए जा रहे हैं या प्रशिक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, तो उससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की अपेक्षा करना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसलिए सवाल शिक्षक बनाम सरकार का नहीं है। सवाल यह है कि पूरी व्यवस्था शिक्षक को प्रभावी ढंग से पढ़ाने के लिए कितना सक्षम बनाती है।

गुजरात में ड्रॉपआउट और शिक्षक व्यवस्था को साथ देखना होगा

गुजरात में 2025-26 के दौरान करीब 2.4 लाख बच्चों को स्कूल से बाहर पाया गया। इनमें लगभग 1.1 लाख किशोरियां बताई गईं। दूसरी तरफ माध्यमिक स्तर पर गुजरात की ड्रॉपआउट दर राष्ट्रीय औसत से अधिक बताई गई है। कक्षा 12 तक विद्यार्थियों के बने रहने को लेकर भी चिंता सामने आई है।इन आंकड़ों को देखते हुए शिक्षा व्यवस्था को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि बच्चा स्कूल क्यों छोड़ रहा है। यह भी देखना होगा कि स्कूल छोड़ने से पहले बच्चे के साथ क्या हुआ।

  • क्या वह पढ़ाई में लगातार कमजोर हो रहा था?
  • क्या उसकी उपस्थिति कम हो रही थी?
  • क्या उसे विषय समझ नहीं आ रहे थे?
  • क्या स्कूल में पर्याप्त शिक्षक नहीं थे?
  • क्या माध्यमिक स्तर पर उसे नया विद्यालय ढूंढना पड़ा?
  • क्या विद्यालय उसके घर से बहुत दूर था?
  • क्या परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी?
  • या कई समस्याएं एक साथ काम कर रही थीं?

इन सवालों के जवाब के बिना ड्रॉपआउट के आंकड़े समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दे सकते।

स्कूल छोड़ना अक्सर अंतिम संकेत होता है

किसी बच्चे का स्कूल छोड़ना अक्सर एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम होता है। पहले वह कक्षा में पीछे छूट सकता है। फिर पढ़ाई में उसकी रुचि कम हो सकती है। उसके अंक गिर सकते हैं। उसकी अनुपस्थिति बढ़ सकती है। परिवार की आर्थिक समस्या बढ़ सकती है। अंततः वह स्कूल से बाहर हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। एक प्रभावी शिक्षक ऐसे बच्चे को शुरुआती स्तर पर पहचान सकता है और विद्यालय तथा परिवार के साथ मिलकर उसे वापस शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर सकता है। यानी शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं है। वह स्कूल छोड़ने के जोखिम को पहचानने वाली व्यवस्था की पहली महत्वपूर्ण कड़ी भी है।

स्मार्ट स्कूल बनाम मजबूत शिक्षक

गुजरात समेत पूरे देश में स्कूलों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया जा रहा है। स्मार्ट कक्षाएं, डिजिटल बोर्ड, कंप्यूटर, इंटरनेट और आधुनिक प्रयोगशालाएं निश्चित रूप से जरूरी हैं। लेकिन इन सुविधाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनका इस्तेमाल कौन और कैसे करता है। डिजिटल बोर्ड लगाने से कक्षा अपने आप स्मार्ट नहीं हो जाती। कंप्यूटर उपलब्ध कराने से बच्चों की डिजिटल समझ अपने आप विकसित नहीं होती। नई इमारत बनाने से सीखने के परिणाम अपने आप बेहतर नहीं होते। इन सभी सुविधाओं को प्रभावी बनाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक चाहिए। इसलिए शिक्षा के बजट में केवल भवन और उपकरण नहीं, बल्कि शिक्षक की गुणवत्ता को भी केंद्र में रखना होगा।

कागज पर योजना, जमीन पर परिणाम

सरकार की शिक्षा योजनाओं को नकारना भी सही नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकारें विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने, बच्चों को वापस स्कूल लाने, छात्रवृत्ति देने, परिवहन उपलब्ध कराने, शिक्षक भर्ती करने और विद्यालयों को बेहतर बनाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं। समस्या यह नहीं कि योजनाएं नहीं हैं। समस्या यह है कि इन योजनाओं का वास्तविक परिणाम कितना है।

  • यदि शिक्षक प्रशिक्षण हो रहा है, तो क्या बच्चों के सीखने के परिणाम सुधर रहे हैं?
  • यदि नए शिक्षक नियुक्त हो रहे हैं, तो क्या शिक्षक की कमी वाले स्कूलों तक उनका लाभ पहुंच रहा है?
  • यदि डिजिटल सुविधाएं दी जा रही हैं, तो क्या उनका इस्तेमाल नियमित शिक्षण में हो रहा है?
  • यदि स्कूलों का एकीकरण किया जा रहा है, तो क्या बच्चों की पहुंच और रिटेंशन बेहतर हो रहा है?
  • और यदि नामांकन बढ़ रहा है, तो क्या बच्चे कक्षा 12 तक पहुंच भी रहे हैं?

यही सवाल “कागज पर शिक्षा” और “जमीन पर शिक्षा” के बीच का अंतर तय करेंगे।

गुजरात मॉडल की असली परीक्षा कक्षा में होगी

गुजरात की आर्थिक उपलब्धियों, औद्योगिक विकास और निवेश की चर्चा अपनी जगह है। लेकिन किसी भी विकास मॉडल की सबसे बड़ी ताकत उसकी मानव पूंजी होती है। एक बच्चा स्कूल में प्रवेश लेता है, वर्षों तक पढ़ता है और फिर भी बुनियादी ज्ञान और कौशल हासिल नहीं कर पाता, तो केवल स्कूल में उसका नाम दर्ज होना शिक्षा की सफलता नहीं कही जा सकती। इसी तरह शिक्षक की नियुक्ति भी अंतिम उपलब्धि नहीं है। असली उपलब्धि तब होगी जब शिक्षक कक्षा में प्रभावी ढंग से पढ़ाए, बच्चा अपनी कक्षा के अनुरूप सीखे, कमजोर विद्यार्थियों की पहचान समय पर हो, किशोरियों और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को स्कूल में बनाए रखा जाए और अधिक से अधिक विद्यार्थी कक्षा 12 तक अपनी शिक्षा पूरी करें। यही वह बिंदु है जहां गुजरात के विकास मॉडल की शिक्षा संबंधी दावों की असली परीक्षा होगी। क्योंकि किसी राज्य का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि वहां कितने उद्योग आए, कितना निवेश हुआ या कितनी बड़ी परियोजनाएं बनीं। भविष्य इस बात से तय होता है कि उस राज्य के बच्चों को कैसी शिक्षा मिली। और उस शिक्षा की पहली कसौटी है—कक्षा में मौजूद शिक्षक और उसके सामने बैठा बच्चा।