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‘दोषी फिर अपराध नहीं करेगा’ की 100% गारंटी कैसे? बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘Absolute Certainty’ का पैमाना ठुकराया, करीब 20 साल जेल में रहे दोषियों की समयपूर्व रिहाई का रास्ता खुला

“क्या किसी कैदी के भविष्य की 100% गारंटी दी जा सकती है?” इसी सवाल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी दोषी के दोबारा अपराध न करने की ‘Absolute Certainty’ मांगना अव्यावहारिक है। अदालत ने साफ कहा कि अगर ऐसी गारंटी को रिहाई की शर्त बना दिया गया, तो कोई भी दोषी कभी जेल से बाहर नहीं आ सकेगा। करीब दो दशक से जेल में बंद दोषियों की समयपूर्व रिहाई के मामले में आए इस फैसले ने सजा, सुधार और समाज में पुनर्वास के बीच संतुलन को लेकर बड़ी कानूनी बहस छेड़ दी है।

Sonali13 अग. 2026, 09:39 PM IST
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‘दोषी फिर अपराध नहीं करेगा’ की 100% गारंटी कैसे? बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘Absolute Certainty’ का पैमाना ठुकराया, करीब 20 साल जेल में रहे दोषियों की समयपूर्व रिहाई का रास्ता खुला

पणजी, 13 अगस्त 2026:

 किसी दोषी को समय से पहले रिहा करने से पहले क्या यह 100 प्रतिशत सुनिश्चित किया जा सकता है कि वह भविष्य में कभी दोबारा अपराध नहीं करेगा? बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने इस सवाल पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के भविष्य के व्यवहार को लेकर “Absolute Certainty” यानी पूर्ण निश्चितता हासिल करना संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि अगर premature release के लिए ऐसी पूर्ण निश्चितता को अनिवार्य बना दिया जाए, तो कोई भी दोषी कभी जेल से बाहर नहीं आ पाएगा और संभव है कि वह जेल की दीवारों के भीतर ही अपनी जिंदगी समाप्त कर दे। 6 अगस्त 2026 को जस्टिस डॉ. नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसंदेकर की डिवीजन बेंच ने Mandar Surlakar kidnapping-cum-murder case से जुड़े premature release विवाद में गोवा सरकार के निर्णय को रद्द करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने रखा। हालांकि मामले में अब नया मोड़ आ चुका है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद गोवा सरकार ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इसलिए हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन मामले की अंतिम कानूनी स्थिति अब शीर्ष अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगी।

मामला क्या है?

यह मामला 2006 के Mandar Surlakar kidnapping-cum-murder case से जुड़ा है। Mandar Surlakar एक किशोर था, जिसका अपहरण कर बाद में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में Rohan Pai Dhungat, Shankar Tiwari, Jovito Ryan Pinto और अन्य आरोपी मुकदमे का सामना कर रहे थे। 2014 में Goa Children's Court ने मामले में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। बाद में Bombay High Court ने भी उनकी conviction और life imprisonment को बरकरार रखा। 2019 के हाईकोर्ट फैसले में अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषसिद्धि को कायम रखा था। हालांकि remission या sentence commutation पर निर्णय लेने का अधिकार सक्षम कार्यकारी प्राधिकरण के पास रहने दिया गया था। इसलिए वर्तमान विवाद दोषसिद्धि या उम्रकैद की सजा को चुनौती देने का नहीं है। सवाल यह है कि लंबे समय तक जेल में रहने के बाद संबंधित दोषियों को लागू कानून और Goa Prisons Rules के तहत premature release दी जा सकती है या नहीं।

करीब दो दशक से जेल में हैं दोषी

Mandar Surlakar मामले में दोषियों ने लंबे समय तक कारावास भुगता है। करीब दो दशक जेल में बिताने के बाद premature release का प्रश्न State Sentence Review Board यानी SSRB के सामने आया। SSRB ने दोषियों की परिस्थितियों और rehabilitation की स्थिति का मूल्यांकन किया। इसमें केवल यह नहीं देखा गया कि अपराध कितना गंभीर था, बल्कि जेल में उनके वर्तमान व्यवहार और समाज में पुनर्वास की संभावनाओं को भी देखा गया। यहीं से “absolute certainty” वाला विवाद सामने आया।

SSRB ने किन बातों का assessment किया?

Premature release के लिए re-offending risk का assessment करते समय कई factors पर विचार किया गया।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

• दोषी की उम्र
• पिछला criminal record
• जेल में conduct और discipline
• anti-social behaviour के historical patterns
• आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां
• परिवार और समाज से मिलने वाला support
• rehabilitation programmes में भागीदारी
• शिक्षा और vocational training
• parole के दौरान व्यवहार
• future re-offending risk
• समाज में वापस लौटने के बाद उपलब्ध support system

अदालत ने माना कि इस तरह के factors के आधार पर risk assessment किया जा सकता है।

लेकिन इन factors के आधार पर यह कहना कि दोषी भविष्य में “कभी भी” अपराध नहीं करेगा, अलग बात है।

राज्य सरकार ने किस आधार पर रिहाई से इनकार किया?

मामले में राज्य सरकार की ओर से यह चिंता सामने आई कि दोषियों के भविष्य के आचरण की पूरी गारंटी नहीं दी जा सकती। यानी सरकार के दृष्टिकोण में यह सवाल महत्वपूर्ण था कि क्या यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जेल से बाहर आने के बाद संबंधित दोषी दोबारा अपराध नहीं करेगा। हाईकोर्ट ने इसी reasoning को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के भविष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी संस्था पूर्ण और अचूक भविष्यवाणी नहीं कर सकती।

‘Probability’ और ‘Certainty’ में फर्क

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू probability और certainty के बीच अंतर है। किसी कैदी के दोबारा अपराध करने के risk का assessment किया जा सकता है। उपलब्ध रिकॉर्ड, व्यवहार, rehabilitation और social circumstances के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि re-offending का risk कम है या अधिक। लेकिन यह प्रमाणित करना कि कोई व्यक्ति भविष्य में किसी भी परिस्थिति में दोबारा अपराध नहीं करेगा, संभव नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी वजह से “absolute certainty” को premature release की अनिवार्य कसौटी बनाने से इनकार किया।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी—“कैदी जेल में ही मर जाएगा”

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि State Sentence Review Board से यह अपेक्षा की जाए कि वह किसी दोषी के भविष्य में अपराध न करने को लेकर “absolute certainty” व्यक्त करे, तो इसका परिणाम यह होगा कि convicted person कभी freedom नहीं देख पाएगा। ऐसी स्थिति में दोषी जेल की दीवारों के भीतर ही अपनी जिंदगी समाप्त कर सकता है। अदालत की यह टिप्पणी premature release की पूरी प्रक्रिया के उद्देश्य पर सवाल उठाती है। यदि किसी व्यक्ति की रिहाई के लिए ऐसी शर्त रखी जाए जिसे मानव संस्था पूरा ही नहीं कर सकती, तो premature release का प्रावधान व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो जाएगा।

Rohan Dhungat के rehabilitation efforts पर भी कोर्ट की नजर

Rohan Dhungat के मामले में अदालत के सामने जेल में उनके लंबे rehabilitation efforts का भी उल्लेख हुआ। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने जेल में रहते हुए BA in English पूरा किया। उन्होंने Labour and Administrative Law में postgraduate diploma, Advanced Computer Application और Communication and IT Skills से जुड़े courses भी किए। वह LLB की पढ़ाई भी कर रहे थे। इसके अलावा उन्होंने कविता और कला में रुचि दिखाई, कविता की पुस्तक प्रकाशित की और जेल में candle-making section में काम किया। उन्हें Convict Warden की जिम्मेदारी भी दी गई थी। अदालत ने इन गतिविधियों को उनके rehabilitation और reform के assessment के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।

Parole के दौरान भी कोई adverse report नहीं

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि Dhungat को पहले parole पर छोड़ा गया था और parole की अवधि के दौरान उनके खिलाफ कोई adverse report सामने नहीं आई।

यह factor इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि premature release के मामलों में केवल जेल के भीतर का conduct ही नहीं, बल्कि जेल से बाहर सीमित अवधि के दौरान व्यक्ति का व्यवहार भी relevant हो सकता है।

माता-पिता का support भी बना अहम factor

SSRB के assessment में Dhungat के परिवार की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही। रिकॉर्ड के अनुसार उनके माता-पिता दोनों physicians हैं और वे जेल से बाहर आने के बाद उन्हें स्वीकार करने तथा rehabilitation में सहयोग करने के लिए तैयार थे। अदालत ने family support को rehabilitation और social reintegration के protective factor के रूप में देखा।

Reformative justice पर हाईकोर्ट का जोर

फैसले का व्यापक महत्व reformative justice के सिद्धांत से जुड़ा है। भारतीय जेल व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है। जहां कानून और परिस्थितियां अनुमति दें, वहां दोषी के सुधार और समाज में पुनर्वास की संभावना पर भी विचार किया जाता है। इसलिए किसी कैदी के अच्छे conduct, education, vocational skills, rehabilitation programmes, family support और future risk को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अपराध की गंभीरता को भुला दिया जाए। अदालत ने मूल अपराध की गंभीरता और दोषसिद्धि को खत्म नहीं किया। उसने premature release के assessment की कसौटी पर सवाल उठाया।

यह पहला मौका नहीं जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा

Dhungat की premature release का विवाद पहले भी Bombay High Court की गोवा पीठ के सामने आ चुका है। 2022 में अदालत के सामने यह सवाल आया था कि क्या दोषियों ने premature release पर विचार के लिए Section 433-A CrPC के तहत आवश्यक 14 वर्ष की actual imprisonment पूरी की है। इस चरण में actual imprisonment और parole की अवधि की गणना महत्वपूर्ण मुद्दा बनी थी। अदालत ने qualifying imprisonment पूरी होने के बाद संबंधित मामलों को Sentence Review Board के सामने रखने की प्रक्रिया पर विचार किया।

2023 में Supreme Court ने भी की थी सुनवाई

5 जनवरी 2023 को Supreme Court ने Rohan Dhungat और अन्य बनाम State of Goa मामले में Goa Prisons Rules, 2006 के संदर्भ में parole, furlough और actual imprisonment से जुड़े कानूनी सवालों की व्याख्या की थी। यह फैसला मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है क्योंकि दोषियों की premature release के लिए qualifying period और जेल में बिताई वास्तविक अवधि का प्रश्न पहले भी शीर्ष अदालत के सामने आ चुका था। हालांकि 2023 का Supreme Court judgment अपने विशिष्ट कानूनी सवालों पर था और उसे 2026 के premature release order के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

दिसंबर 2025 में भी सरकार का आदेश हुआ था रद्द

यह मामला 2025 में भी हाईकोर्ट पहुंचा था। दिसंबर 2025 में Bombay High Court की Goa Bench ने Goa Government के 20 अगस्त 2025 के उस आदेश को रद्द किया था, जिसमें Dhungat की premature release की मांग खारिज की गई थी। उस समय हाईकोर्ट ने माना था कि सरकार को State Sentence Review Board की recommendation और लागू Goa Prisons Rules के तहत मामले पर उचित तरीके से विचार करना चाहिए। अदालत ने सरकार को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया था। यानी 2026 का विवाद एक लंबी judicial और administrative process का अगला चरण है।

जून-जुलाई 2026 में भी सुनवाई हुई

मामले में जून और जुलाई 2026 में भी हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। Mandar Surlakar के पिता ने proceedings में formally intervene करने की मांग की थी। अदालत ने उन्हें औपचारिक intervention की अनुमति नहीं दी, लेकिन राज्य की सहायता करने और अपनी written submissions रखने का अवसर दिया। जुलाई में अदालत ने parties से written submissions और chronology भी दाखिल करने को कहा था। इससे साफ है कि अदालत ने premature release के सवाल को केवल convict और government के बीच सीमित विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि मामले की पूरी factual और legal background पर विचार किया।

पीड़ित परिवार की आपत्ति क्यों महत्वपूर्ण है?

मामला एक गंभीर kidnapping-cum-murder से जुड़ा है। इसलिए victim's family की concerns भी महत्वपूर्ण हैं। पीड़ित परिवार की ओर से premature release का विरोध किया गया और अपराध की गंभीरता तथा दोषियों की सजा से जुड़े मुद्दे अदालत के सामने रखे गए। हालांकि हाईकोर्ट का मौजूदा फैसला दोषियों की conviction को प्रभावित नहीं करता। यह केवल premature release के assessment से संबंधित है। यानी एक तरफ दोषी के reform और rehabilitation का सवाल है, दूसरी तरफ victim और उसके परिवार के हितों का। प्रशासन को दोनों पहलुओं को लागू कानून के तहत संतुलित करना होगा।

क्या हाईकोर्ट ने कहा कि हर life convict को रिहाई मिलेगी?

नहीं।

यह इस फैसले को समझने का सबसे जरूरी हिस्सा है। हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि हर उम्रकैद के दोषी को premature release मिलनी चाहिए। अदालत ने केवल यह कहा कि eligible convict की premature release पर विचार करते समय ऐसा असंभव standard नहीं बनाया जा सकता जिसमें State Sentence Review Board से यह 100 प्रतिशत गारंटी मांगी जाए कि वह व्यक्ति भविष्य में कभी अपराध नहीं करेगा। Premature release अभी भी कानून, policy, prison rules, conduct, risk assessment और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

तीन life convicts की premature release का आदेश

6 अगस्त 2026 के हाईकोर्ट आदेश से संबंधित उपलब्ध विवरण के अनुसार Mandar Surlakar मामले में तीन life convicts—Rohan Pai Dhungat, Shankar Tiwari और Jovito Ryan Pinto—की premature release का रास्ता खुला। यह बिंदु महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती रिपोर्टिंग में मुख्य फोकस Rohan Dhungat पर रहा था, जबकि आदेश का प्रभाव तीन दोषियों तक बताया गया है। रिहाई लागू शर्तों और संबंधित कानूनी requirements के अधीन है।

अब सबसे बड़ा ट्विस्ट—Goa Government Supreme Court पहुंची

हाईकोर्ट के 6 अगस्त 2026 के आदेश के बाद Goa Government ने 11 अगस्त 2026 को Supreme Court में challenge दाखिल किया। इससे मामले में नया कानूनी अध्याय शुरू हो गया है। इस समय यह कहना सही नहीं होगा कि तीनों दोषियों की रिहाई पर विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। हाईकोर्ट का आदेश मौजूद है, लेकिन राज्य सरकार ने उसे शीर्ष अदालत में चुनौती दे दी है। अब Supreme Court के सामने हाईकोर्ट की reasoning, SSRB की recommendation, premature release के assessment और “absolute certainty” की कसौटी से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

Supreme Court में अब किन सवालों पर नजर?

मामले की आगे की सुनवाई में मुख्य रूप से इन पहलुओं पर नजर रहेगी:

• क्या premature release के लिए re-offending risk का assessment पर्याप्त है?

• क्या State Sentence Review Board से भविष्य में अपराध न करने की absolute certainty मांगी जा सकती है?

• SSRB की recommendation पर सरकार किस सीमा तक अलग निष्कर्ष निकाल सकती है?

• क्या rehabilitation और prison conduct को पर्याप्त weight दिया गया?

• गंभीर अपराध और victim's family के हितों का premature release assessment में किस तरह संतुलन किया जाए?

• Goa Prisons Rules के तहत premature release की प्रक्रिया में राज्य सरकार की discretion की सीमा क्या है?

इस फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला भारतीय prison jurisprudence में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है—क्या किसी कैदी की समयपूर्व रिहाई के लिए भविष्य की पूर्ण गारंटी मांगना न्यायसंगत है?

हाईकोर्ट ने कहा कि भविष्य के मानव व्यवहार की 100 प्रतिशत भविष्यवाणी संभव नहीं है। इसलिए risk assessment को practical factors पर आधारित होना चाहिए।

यह approach reformative justice की उस अवधारणा से जुड़ती है जिसमें यह माना जाता है कि कैदी के सुधार, rehabilitation और समाज में पुनर्वास की संभावना को भी महत्व दिया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि premature release automatic entitlement नहीं है। अपराध की गंभीरता, पीड़ित परिवार की concerns, convict का conduct, rehabilitation, social support और re-offending risk—सभी relevant factors का assessment जरूरी है।


बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ की टिप्पणी ने premature release के मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बहस को सामने ला दिया है।

अगर किसी दोषी की रिहाई के लिए यह शर्त रखी जाए कि राज्य को 100 प्रतिशत यकीन होना चाहिए कि वह भविष्य में कभी अपराध नहीं करेगा, तो ऐसी कसौटी को पूरा करना लगभग असंभव होगा। हाईकोर्ट ने इसी वजह से “absolute certainty” की मांग को अव्यावहारिक माना और rehabilitation तथा realistic risk assessment पर जोर दिया। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। Goa Government इस आदेश को Supreme Court में चुनौती दे चुकी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि देश की शीर्ष अदालत premature release, SSRB की भूमिका और future re-offending risk के इस महत्वपूर्ण सवाल पर क्या रुख अपनाती है। फिलहाल हाईकोर्ट का संदेश साफ है—किसी व्यक्ति के भविष्य की 100 प्रतिशत गारंटी संभव नहीं, इसलिए premature release के लिए ऐसी असंभव शर्त नहीं बनाई जा सकती जो रिहाई के पूरे कानूनी तंत्र को ही निष्प्रभावी कर दे।