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“रिश्वत का जाल: छात्र की सीट से खिलाड़ी के इंटरनेशनल सपने तक”

भारत में भ्रष्टाचार की चर्चा अक्सर बड़े घोटालों, करोड़ों रुपये की हेराफेरी और राजनीतिक विवादों तक सीमित रह जाती है। लेकिन आम आदमी के लिए भ्रष्टाचार की असली तस्वीर कहीं ज्यादा छोटी और रोजमर्रा की है। यह कभी सरकारी दफ्तर में अटकी फाइल के रूप में सामने आता है, कभी पुलिस थाने में FIR दर्ज कराने के लिए कथित पैसे की मांग के रूप में, कभी जमीन के कागज आगे बढ़ाने के लिए, कभी अस्पताल में किसी प्रक्रिया को जल्दी कराने के नाम पर और कभी नौकरी, शिक्षा या खेल के अवसर से जुड़ी कथित अनियमितता के रूप में। रकम कई बार सिर्फ ₹500, ₹2,000 या ₹10,000 होती है, लेकिन उस छोटी रकम के पीछे किसी व्यक्ति का भविष्य, परिवार की बचत या वर्षों की मेहनत दांव पर लगी हो सकती है।

Vindhya Dubey13 अग. 2026, 09:39 PM IST
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“रिश्वत का जाल: छात्र की सीट से खिलाड़ी के इंटरनेशनल सपने तक”

रिश्वत की असली कीमत नोटों में नहीं, अवसरों में है

रिश्वत लेने वाले के लिए ₹2,000 शायद अतिरिक्त कमाई हो सकती है, लेकिन जिस व्यक्ति से यह रकम ली जाती है, उसके लिए वही पैसा बच्चे की फीस, घर का राशन, दवा या यात्रा का खर्च हो सकता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार को सिर्फ पैसों के लेन-देन के रूप में देखना अधूरा है। इसकी असली कीमत उस अवसर में छिपी होती है जो किसी योग्य व्यक्ति से छिन जाता है। महाराष्ट्र Anti-Corruption Bureau के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2025 में राज्य में 669 ट्रैप मामले दर्ज हुए और 989 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। ट्रैप कार्रवाई उन मामलों में होती है जहां रिश्वत की शिकायत के बाद सत्यापन और कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपी को कथित तौर पर रिश्वत स्वीकार करते हुए पकड़ा जाता है। लेकिन यह आंकड़ा भ्रष्टाचार की पूरी तस्वीर नहीं है। जो व्यक्ति शिकायत नहीं करता, जो मजबूरी में पैसा दे देता है या जो सरकारी तंत्र से टकराव के डर से चुप रह जाता है, उसका मामला इन आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देता।

शिक्षा में रिश्वत का मतलब सिर्फ पैसा नहीं, बच्चे का भविष्य है

शिक्षा को हमेशा सामाजिक बराबरी का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। लेकिन जब किसी छात्र को प्रवेश, प्रमाणपत्र, परीक्षा, प्रशासनिक काम या किसी अन्य प्रक्रिया के लिए कथित रूप से अतिरिक्त भुगतान का सामना करना पड़े तो सबसे पहला नुकसान उसकी योग्यता और व्यवस्था पर उसके भरोसे का होता है। अगस्त 2026 में महाराष्ट्र के जालना में एक कॉलेज के प्रिंसिपल और चार कर्मचारियों के खिलाफ कथित ₹1.5 लाख रिश्वत मामले में ACB कार्रवाई की खबर सामने आई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कॉलेज से जुड़े एक काम के लिए अवैध रकम मांगने का आरोप था। मामले में अंतिम दोष अदालत की प्रक्रिया के बाद ही तय होगा, लेकिन ऐसी घटनाएं यह सवाल जरूर उठाती हैं कि शिक्षा व्यवस्था में अगर पैसे का दबाव प्रवेश करता है तो उसका असर किस पर पड़ता है। जवाब साफ है-छात्र और उसके परिवार पर। किसी विद्यार्थी के लिए एक प्रमाणपत्र, परीक्षा प्रक्रिया या कॉलेज से जुड़ी प्रशासनिक मंजूरी उसके आगे के करियर का आधार हो सकती है। अगर उस प्रक्रिया में पैसे की मांग का आरोप सामने आता है तो नुकसान केवल तत्काल आर्थिक नहीं होता। उसका असर आगे की पढ़ाई और रोजगार तक पहुंच सकता है।

सरकारी नौकरी: एक पद के पीछे हजारों सपने

सरकारी नौकरी भारत के करोड़ों युवाओं के लिए आज भी स्थिर भविष्य का सपना है। एक पद के लिए हजारों आवेदन आते हैं। उम्मीदवार वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार आर्थिक बोझ उठाता है और युवा कई दूसरे अवसर छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं पर ध्यान देता है। ऐसे में भर्ती, दस्तावेज सत्यापन, नियुक्ति, पोस्टिंग या प्रमोशन से जुड़ी किसी भी रिश्वत की शिकायत पूरी चयन व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। अगर कोई योग्य उम्मीदवार इसलिए पीछे रह जाए क्योंकि वह पैसे नहीं दे सकता, जबकि दूसरा व्यक्ति पैसे या प्रभाव के कारण आगे निकल जाए, तो इससे समाज में एक बेहद खतरनाक संदेश जाता है कि मेहनत से ज्यादा पैसा महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत में व्यापम जैसे मामलों ने पहले ही परीक्षा और भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर बहस छेड़ी थी। आज भी जब भर्ती परीक्षाओं या चयन प्रक्रियाओं पर अनियमितताओं के आरोप लगते हैं तो सबसे ज्यादा चोट उन युवाओं को लगती है जिन्होंने वर्षों अपनी जिंदगी इस उम्मीद में लगाई होती है कि एक दिन उनकी मेहनत रंग लाएगी।

खेल में भी पैसे की दीवार? राष्ट्रीय गोल्ड के बाद अंतरराष्ट्रीय सपना रुका

भ्रष्टाचार और आर्थिक बाधा का सबसे भावुक चेहरा खेल के मैदान में दिखाई देता है। अगस्त 2026 में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में उत्तराखंड की एक युवा खिलाड़ी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने अपनी परेशानी बताते हुए नजर आई। लड़की के अनुसार उसने राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीता था और उसका चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ था। लड़की ने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए उससे करीब ₹1.5 लाख मांगे गए और परिवार के पास इतनी राशि की व्यवस्था नहीं होने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी। वीडियो में लड़की अपनी बात रखते हुए भावुक दिखाई देती है और मुख्यमंत्री की ओर से उसे शांत रहने के लिए कहा जाता सुनाई देता है। इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर चर्चा हुई। हालांकि इस मामले में सावधानी जरूरी है। 


वायरल वीडियो में लगाया गया आरोप अपने आप में यह साबित नहीं करता कि ₹1.5 लाख की मांग रिश्वत थी। यह रकम किसी आधिकारिक प्रतियोगिता शुल्क, यात्रा खर्च या अन्य वैध खर्च से संबंधित थी अथवा कथित अवैध मांग थी, इसकी पुष्टि संबंधित संस्था और आधिकारिक जांच से ही हो सकती है। लेकिन आरोप सही साबित होते हैं तो सवाल बेहद गंभीर होगा। राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड जीतने वाली खिलाड़ी ने अपनी प्रतिभा के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का अवसर हासिल किया था। उसके सामने अगर आर्थिक मजबूरी या कथित अवैध भुगतान की मांग रास्ता रोकती है तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी के सपने का नुकसान नहीं होगा। देश संभवतः उस प्रतिभा को भी खो देगा जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए पदक जीत सकती थी। खिलाड़ी के हाथ में एक गोल्ड मेडल दिखाई देता है, लेकिन उस मेडल के पीछे वर्षों की मेहनत, ट्रेनिंग, चोटें, कोचिंग, यात्रा और परिवार का त्याग छिपा होता है। इसलिए किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने से पहले आर्थिक या कथित भ्रष्टाचार की दीवार से गुजरना पड़े तो यह पूरे खेल तंत्र के लिए गंभीर सवाल बन जाता है।

पुलिस में रिश्वत: जब FIR के लिए भी पैसे का आरोप लगे

पुलिस नागरिक के लिए न्याय का पहला दरवाजा है। लेकिन जब FIR दर्ज कराने या कार्रवाई आगे बढ़ाने के बदले रिश्वत मांगने के आरोप सामने आते हैं तो मामला और गंभीर हो जाता है। मुंबई के कुरार पुलिस स्टेशन से जुड़े एक मामले में महाराष्ट्र ACB ने 2026 में एक वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक और सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ कथित रिश्वत मामले में कार्रवाई की थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोप था कि FIR दर्ज न करने के बदले ₹3 लाख की मांग की गई थी और शिकायतकर्ता से पहले ₹2 लाख लिए जाने का आरोप था। अगर कोई व्यक्ति किसी अपराध या विवाद की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता है तो वह कानून से सुरक्षा की उम्मीद करता है। लेकिन अगर उसे यह महसूस हो कि कार्रवाई के लिए भी पैसा देना पड़ेगा तो उसका भरोसा केवल पुलिस से नहीं, पूरी न्याय व्यवस्था से कमजोर हो सकता है। मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों में यह डर भी रहता है कि शिकायत के बाद संबंधित विभाग या अधिकारी से भविष्य में फिर सामना हो सकता है। इसलिए कई लोग लड़ाई लड़ने के बजाय पैसा देकर मामला खत्म करना आसान समझते हैं।

जमीन और घर: जिंदगीभर की कमाई फाइल में अटक सकती है

जमीन और घर भारतीय परिवारों के लिए सिर्फ संपत्ति नहीं होते। वे अक्सर जिंदगीभर की बचत और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा होते हैं। नामांतरण, भूमि रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, नक्शा या निर्माण अनुमति जैसे काम अगर सरकारी कार्यालय में अटक जाएं तो परिवार की पूरी आर्थिक योजना प्रभावित हो सकती है। महाराष्ट्र में ACB से जुड़े आंकड़ों पर प्रकाशित रिपोर्टों में Revenue, Land Records और Registration से जुड़े विभागों का रिश्वत के ट्रैप मामलों में प्रमुखता से सामने आना इसी समस्या की ओर संकेत करता है।लेकिन यहां भी यही सवाल है कि जो व्यक्ति शिकायत नहीं करता, उसका क्या? अगर कोई व्यक्ति ₹5,000 देकर जमीन का काम करा लेता है तो वह सरकारी भ्रष्टाचार के आंकड़े में नहीं आएगा। लेकिन उसके परिवार की जेब से निकली वह रकम भ्रष्टाचार की वास्तविक कीमत जरूर है।

अस्पताल में रिश्वत: जहां मजबूरी का फायदा सबसे आसान है

स्वास्थ्य व्यवस्था में रिश्वत का आरोप सबसे ज्यादा संवेदनशील इसलिए होता है क्योंकि मरीज और परिवार के पास कई बार इंतजार करने का विकल्प नहीं होता। मरीज अस्पताल में भर्ती है, परिवार इलाज और दवाइयों के खर्च से पहले ही परेशान है और इसी बीच अगर किसी प्रक्रिया को जल्दी कराने या सुविधा दिलाने के नाम पर अतिरिक्त पैसे की मांग हो तो परिवार के पास विरोध करने की क्षमता कम हो सकती है। गरीब परिवार के लिए ₹2,000 दवाइयों का पैसा हो सकता है। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह महीने का बजट बिगाड़ सकता है। इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में किसी भी तरह की अनौपचारिक भुगतान की मांग केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि मानवीय मजबूरी के इस्तेमाल का भी सवाल बन जाती है।

सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार: गरीब के अधिकार की कीमत कौन तय करेगा?

सरकारी योजनाएं गरीब, किसान, मजदूर, महिला, बुजुर्ग और जरूरतमंद परिवारों को सहायता देने के लिए बनाई जाती हैं। लेकिन यदि किसी पात्र व्यक्ति से योजना का लाभ दिलाने के नाम पर पैसे मांगे जाएं तो भ्रष्टाचार सीधे उसी व्यक्ति को चोट करता है जिसके लिए योजना बनाई गई है। गरीब परिवार के लिए ₹1,000 भी बड़ी रकम हो सकती है। यह कई दिनों का राशन, बच्चे की फीस या दवा का खर्च हो सकता है। अगर उसे अपना अधिकार पाने के लिए भुगतान करना पड़े तो सवाल यह नहीं रह जाता कि रिश्वत कितनी थी। सवाल यह बन जाता है कि सरकारी सहायता जरूरतमंद तक बिना कटौती और बिना डर के क्यों नहीं पहुंच सकी।

बिजली, पानी, प्रमाणपत्र से लेकर लाइसेंस तक रोजमर्रा की रिश्वत

भ्रष्टाचार हमेशा बड़ी फाइलों में नहीं होता। बिजली कनेक्शन, पानी कनेक्शन, जन्म प्रमाणपत्र, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, लाइसेंस, स्थानीय निकाय की अनुमति और दूसरे रोजमर्रा के कामों में भी नागरिक को कथित तौर पर अनौपचारिक भुगतान के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इन सेवाओं को देखने में छोटा समझा जा सकता है, लेकिन इनके बिना आम नागरिक की जिंदगी कई स्तरों पर रुक सकती है। एक प्रमाणपत्र छात्रवृत्ति से जुड़ा हो सकता है, जमीन का रिकॉर्ड संपत्ति के अधिकार से और बिजली कनेक्शन परिवार के घर से। इसलिए जब कोई कर्मचारी कहता है कि “काम हो जाएगा, लेकिन कुछ करना पड़ेगा”, तो वह केवल एक फाइल नहीं रोक रहा होता। वह किसी परिवार की पूरी प्रक्रिया रोक सकता है।

छोटे कारोबारी के लिए रिश्वत दोहरा नुकसान

छोटे दुकानदार और कारोबारी के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना अपने आप में आर्थिक नुकसान है। लाइसेंस, परमिट, निरीक्षण और स्थानीय निकाय की मंजूरी जैसे कामों में अगर अनौपचारिक भुगतान की मांग हो तो उसके पास अक्सर दो ही विकल्प होते हैं—समय और पैसा गंवाते हुए प्रक्रिया जारी रखे या मजबूरी में भुगतान करे। बड़े कारोबारी कानूनी सलाहकार और विशेषज्ञ रख सकते हैं। छोटे व्यापारी के लिए यह सुविधा हमेशा उपलब्ध नहीं होती। यही कारण है कि भ्रष्टाचार छोटे व्यवसायों पर अपेक्षाकृत ज्यादा बोझ डाल सकता है और ईमानदारी से नियमों का पालन करने वाले कारोबारियों में भी व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा कर सकता है।

रिश्वत देने वाला हर व्यक्ति भ्रष्ट नहीं, कई बार व्यवस्था का मजबूर शिकार

भ्रष्टाचार पर बहस करते समय रिश्वत देने वाले व्यक्ति को भी समझना जरूरी है। कई बार वह व्यवस्था का लाभार्थी नहीं बल्कि मजबूर शिकार होता है। एक व्यक्ति के सामने अगर ₹2,000 देकर तीन दिन में काम कराने और महीनों तक दफ्तर के चक्कर लगाने का विकल्प हो तो वह डर, समय और आर्थिक नुकसान के कारण भुगतान कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि रिश्वत देना उचित है। इसका अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सिर्फ नागरिकों से ईमानदार रहने की अपील काफी नहीं है। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें ईमानदार रहना व्यावहारिक रूप से संभव हो।

शिकायत क्यों नहीं करते लोग?

रिश्वत के खिलाफ शिकायत करने की प्रक्रिया भी आम आदमी के लिए आसान नहीं होती। नौकरीपेशा व्यक्ति को छुट्टी लेनी पड़ सकती है, दुकानदार को दुकान बंद करनी पड़ सकती है और दिहाड़ी मजदूर को मजदूरी छोड़नी पड़ सकती है। इसके अलावा एक बड़ा डर यह भी होता है कि शिकायत के बाद संबंधित अधिकारी या विभाग उसके भविष्य के काम में परेशानी पैदा कर सकता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के वास्तविक मामलों की संख्या और आधिकारिक शिकायतों की संख्या में बड़ा अंतर हो सकता है। शिकायत कम होना यह साबित नहीं करता कि भ्रष्टाचार कम है। कई बार इसका मतलब यह होता है कि नागरिक शिकायत करने से ज्यादा डरता है।

डिजिटल व्यवस्था उम्मीद देती है, लेकिन निगरानी जरूरी

ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, आवेदन ट्रैकिंग और ऑनलाइन प्रमाणपत्र जैसी व्यवस्थाएं नागरिक और अधिकारी के बीच अनावश्यक संपर्क को कम कर सकती हैं। डिजिटल रिकॉर्ड से यह भी पता लगाया जा सकता है कि आवेदन कब किया गया और उसकी स्थिति क्या है। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ जवाबदेही भी हो। अगर ऑनलाइन आवेदन के बाद भी नागरिक को अंतिम काम के लिए अधिकारी के पास जाना पड़े और वहां कथित भुगतान की मांग हो, तो डिजिटल व्यवस्था समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।

भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जीत तब होती है जब ईमानदारी पर भरोसा खत्म हो जाए

भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जीत तब नहीं होती जब कोई अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है। उसकी सबसे बड़ी जीत तब होती है जब नागरिक यह मानने लगे कि बिना पैसे के काम हो ही नहीं सकता। जब छात्र सोचे कि मेरिट से ज्यादा पैसा महत्वपूर्ण है। जब नौकरी का उम्मीदवार माने कि मेहनत से ज्यादा संपर्क जरूरी है। जब खिलाड़ी को लगे कि प्रतिभा से ज्यादा आर्थिक क्षमता मायने रखती है। जब गरीब व्यक्ति सरकारी योजना के लिए बिचौलिए पर निर्भर हो जाए। जब छोटा कारोबारी माने कि नियमों का पालन करना उसके लिए नुकसान का सौदा है। उस समय भ्रष्टाचार सरकारी कार्यालय की चारदीवारी से बाहर निकलकर समाज की सोच का हिस्सा बन जाता है।

असली नुकसान किसका होता है?

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान उस व्यक्ति को होता है जिसके पास विकल्प सबसे कम हैं। अमीर व्यक्ति वकील कर सकता है, बड़ा कारोबारी सलाहकार रख सकता है और प्रभावशाली व्यक्ति किसी वरिष्ठ अधिकारी तक पहुंच सकता है। लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिक के पास अक्सर सिर्फ अपने दस्तावेज और अपनी उम्मीद होती है। यही कारण है कि रिश्वत सामाजिक असमानता को और गहरा करती है। पैसा रखने वाला व्यक्ति व्यवस्था में अपना रास्ता जल्दी बना सकता है और पैसा न रखने वाला व्यक्ति इंतजार करता रह जाता है।

रिश्वत की असली कीमत भविष्य से वसूली जाती है

रिश्वत की असली कीमत रिश्वत की रकम नहीं है। असली कीमत वह सीट है जो किसी योग्य छात्र से छिन सकती है। वह नौकरी है जो किसी मेहनती युवा को नहीं मिलती। वह FIR है जो समय पर दर्ज नहीं होती। वह जमीन है जिसकी फाइल अटक जाती है। वह सरकारी सहायता है जो पात्र व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंचती। वह मरीज है जिसके परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। वह छोटा कारोबारी है जो नियमों का पालन करने के कारण पीछे रह जाता है। और वह खिलाड़ी भी है, जिसके बारे में वायरल वीडियो में दावा किया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड जीतने के बावजूद कथित ₹1.5 लाख की मांग के कारण वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं जा सकी। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक खिलाड़ी का नुकसान नहीं होगा, बल्कि उस प्रतिभा का नुकसान होगा जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकती थी।


भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सिर्फ रिश्वत लेने वाले कर्मचारी को पकड़ने की लड़ाई नहीं है। यह उस भरोसे की लड़ाई है कि कानून और व्यवस्था आम आदमी के साथ खड़ी है। नागरिक को अपना वैध अधिकार पाने के लिए अमीर, प्रभावशाली या रिश्वत देने वाला होना जरूरी नहीं होना चाहिए। क्योंकि एक रिश्वत किसी की जेब भर सकती है, लेकिन उसकी कीमत अक्सर किसी दूसरे व्यक्ति के भविष्य से वसूली जाती है। और सबसे डरावना दिन वह नहीं होगा जब किसी दफ्तर में रिश्वत का मामला सामने आएगा। सबसे डरावना दिन वह होगा जब देश का ईमानदार नागरिक यह मान लेगा कि ईमानदारी से काम करना घाटे का सौदा है।