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सरसों की जैविक संपदा से जुड़े लाभ का बंटवारा, NBA ने जारी किए ₹15.52 करोड़

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने भारत के जैविक संसाधनों से विकसित सरसों की 10 व्यावसायिक हाइब्रिड किस्मों से जुड़े ₹15.52 करोड़ के Access and Benefit Sharing (ABS) फंड जारी किए हैं। यह राशि 26 राज्य जैव विविधता बोर्डों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों में सरसों की खेती के क्षेत्रफल के आधार पर बांटी जाएगी। राजस्थान को सबसे अधिक ₹6.43 करोड़ मिलेंगे।

Anshuman Mishra13 अग. 2026, 09:41 PM IST
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सरसों की जैविक संपदा से जुड़े लाभ का बंटवारा, NBA ने जारी किए ₹15.52 करोड़


नई दिल्ली: भारत की जैविक और आनुवंशिक संपदा से होने वाले व्यावसायिक लाभ में स्थानीय स्तर पर हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने बड़ा कदम उठाया है। NBA ने सरसों की आनुवंशिक संसाधनों के व्यावसायिक इस्तेमाल से प्राप्त 15.52 करोड़ रुपये के Access and Benefit Sharing (ABS) फंड को 26 राज्य जैव विविधता बोर्डों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों के लिए जारी किया है। यह राशि संबंधित राज्यों में सरसों की खेती के क्षेत्रफल के आधार पर बांटी जाएगी।

10 हाइब्रिड सरसों किस्मों के इस्तेमाल से जुड़ा है मामला

PIB के अनुसार, Pioneer Overseas Corporation ने भारत के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल कर सरसों यानी Brassica juncea की 10 व्यावसायिक हाइब्रिड किस्में विकसित कीं। कंपनी ने इन किस्मों की ब्रीडिंग खुद की, लेकिन इनके लिए इस्तेमाल की गई पैतृक लाइनों को खुले बाजार और व्यापारियों के माध्यम से हासिल किया गया था। चूंकि इन संसाधनों के मूल किसान या समुदाय की पहचान नहीं हो सकी, इसलिए ABS राशि के वितरण का तरीका तय करने के लिए NBA ने एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी।

विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को NBA ने मंजूरी दी। इसके तहत ऐसे मामलों में, जहां जैविक संसाधन सीधे किसान के बजाय किसी मध्यस्थ के जरिए प्राप्त हुआ हो, ABS राशि उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के जैव विविधता संस्थानों के बीच बांटी जाएगी जहां संबंधित संसाधन की खेती होती है।

राजस्थान को सबसे ज्यादा 6.43 करोड़ रुपये

सरसों की खेती के क्षेत्रफल के आधार पर राजस्थान को सबसे बड़ा हिस्सा मिला है। भारत की कुल सरसों खेती में राजस्थान की हिस्सेदारी करीब 42 प्रतिशत बताई गई है। राज्य को 6.43 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

इसके बाद उत्तर प्रदेश को 2.28 करोड़ रुपये, मध्य प्रदेश को 1.86 करोड़ रुपये, हरियाणा को 1.21 करोड़ रुपये और पश्चिम बंगाल को 1.10 करोड़ रुपये मिले हैं।

राज्यजारी राशि
राजस्थान₹6.43 करोड़
उत्तर प्रदेश₹2.28 करोड़
मध्य प्रदेश₹1.86 करोड़
हरियाणा₹1.21 करोड़
पश्चिम बंगाल₹1.10 करोड़
झारखंड₹0.73 करोड़
असम₹0.53 करोड़
गुजरात₹0.48 करोड़
बिहार₹0.15 करोड़
पंजाब₹0.08 करोड़
अन्य₹0.67 करोड़

NBA ने सरसों की खेती के राज्यवार क्षेत्रफल का डेटा ICAR–Indian Institute of Rapeseed-Mustard Research (ICAR-IIRMR), भरतपुर, राजस्थान से लिया और इसी आधार पर राज्यों की हिस्सेदारी निर्धारित की।

ABS क्या है और पैसा कहां खर्च होगा?

Access and Benefit Sharing यानी ABS ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत भारत के जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक या अन्य उपयोग करने पर उससे होने वाले लाभ को उचित तरीके से साझा किया जाता है। इस मामले में जारी राशि का इस्तेमाल सिर्फ सामान्य सरकारी खर्च के लिए नहीं किया जा सकता। PIB के अनुसार, राज्य जैव विविधता बोर्ड और केंद्रशासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों को इस धन का उपयोग जैव विविधता संरक्षण, People's Biodiversity Registers को तैयार और अपडेट करने, प्राकृतिक आवासों में संरक्षण (in-situ conservation), बाहरी संरक्षण (ex-situ conservation), खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, Biodiversity Heritage Sites को मजबूत करने और Biodiversity Management Committees की क्षमता बढ़ाने जैसे कार्यों में करना होगा। इसके अलावा स्थानीय समुदायों की आजीविका सुधारने से जुड़े कार्य भी किए जा सकते हैं।

12 महीनों में 116.22 करोड़ रुपये जारी

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, अब तक उसके द्वारा कुल 182.5 करोड़ रुपये की ABS राशि जारी की जा चुकी है। इसमें पिछले 12 महीनों के दौरान देशभर के लाभार्थियों को जारी की गई 116.22 करोड़ रुपये की राशि भी शामिल है।

Corporation से सरसों और चावल के हाइब्रिड के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए 2.30 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे।

किसानों और जैव विविधता संरक्षण के बीच कैसे जुड़ता है ABS?

ABS व्यवस्था का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की जैविक संपदा से अगर किसी कंपनी या संस्था को व्यावसायिक लाभ मिलता है, तो उस लाभ का एक हिस्सा जैव विविधता संरक्षण और उन संसाधनों को बनाए रखने वाले तंत्र तक वापस पहुंचे।

इस मामले की खासियत यह है कि सरसों की पैतृक लाइनों का मूल स्रोत किसी एक किसान या समुदाय के रूप में चिन्हित नहीं हो पाया। ऐसे में NBA ने सीधे किसी एक समुदाय को राशि देने के बजाय खेती के क्षेत्रफल के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राशि वितरित करने का मॉडल अपनाया है।

भारत के जैव संसाधनों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

NBA का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कृषि, औषधि, बीज, कॉस्मेटिक्स और अन्य क्षेत्रों में जैविक संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग होता है। ABS व्यवस्था ऐसे उपयोग को जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय हितों से जोड़ती है। PIB के मुताबिक यह पहल Biological Diversity Act, 2002, नागोया प्रोटोकॉल और Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework के Target 13 में निर्धारित लाभों के निष्पक्ष और समान वितरण के सिद्धांत के अनुरूप है।


राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत काम करने वाला वैधानिक निकाय है। इसका गठन Biological Diversity Act, 2002 के तहत हुआ है और यह भारत के जैविक संसाधनों तथा उनसे जुड़े ज्ञान तक पहुंच को विनियमित करने और लाभों के उचित बंटवारे के सिद्धांत को लागू करने की जिम्मेदारी निभाता है।

निष्कर्ष: सरसों की 10 हाइब्रिड किस्मों से जुड़े इस मामले में जारी 15.52 करोड़ रुपये केवल एक वित्तीय हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि भारत अपनी जैविक और आनुवंशिक संपदा से होने वाले व्यावसायिक लाभ को जैव विविधता संरक्षण और राज्यों तक वापस पहुंचाने की व्यवस्था को कैसे मजबूत कर रहा है।