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आरजी कर के दो साल बाद भी अस्पतालों में डर, जाति और सत्ता का खेल

भारत में अस्पतालों को अक्सर जीवन बचाने वाली जगह के रूप में देखा जाता है। यहां डॉक्टर बीमारी से लड़ते हैं, नर्स मरीजों की देखभाल करती हैं, तकनीशियन जांच करते हैं और सफाईकर्मी संक्रमण से बचाने के लिए अस्पताल के सबसे कठिन काम संभालते हैं। लेकिन इसी व्यवस्था के भीतर काम करने वाले लोगों की दुनिया हमेशा उतनी सुरक्षित नहीं होती, जितनी बाहर से दिखाई देती है। लंबी ड्यूटी, स्टाफ की कमी, वरिष्ठ और कनिष्ठ के बीच असमान शक्ति-संबंध, महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव, संविदा कर्मचारियों की नौकरी की असुरक्षा और शिकायत करने पर प्रतिशोध का डर—ये सभी समस्याएं मिलकर अस्पतालों के भीतर एक ऐसी कार्यसंस्कृति बना सकती हैं, जहां कर्मचारी मदद मांगने के बजाय चुप रहना ज्यादा सुरक्षित समझता है।

Vindhya Dubey13 अग. 2026, 09:41 PM IST
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आरजी कर के दो साल बाद भी अस्पतालों में डर, जाति और सत्ता का खेल

9 अगस्त 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 31 वर्षीय पोस्टग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या ने इसी डरावनी तस्वीर को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया था। घटना के बाद देशभर के डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन किया और अस्पतालों में महिला स्वास्थ्यकर्मियों तथा मेडिकल कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लेते हुए मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रोटोकॉल तैयार करने के उद्देश्य से नेशनल टास्क फोर्स गठित की थी। लेकिन अगस्त 2026 में, घटना के दो साल बाद भी आरजी कर मामला पूरी तरह अतीत नहीं बना है। मई 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े षड्यंत्र के पहलू की जांच के लिए विशेष जांच टीम गठित की थी। अगस्त 2026 में मामला फिर सुर्खियों में आया और 13 अगस्त को पूर्व टीएमसी विधायक निर्मल घोष की गिरफ्तारी हुई। उन पर पीड़िता के अंतिम संस्कार से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में कार्रवाई हुई है। इसका मतलब यह नहीं है कि अस्पतालों की हर समस्या आरजी कर जैसी आपराधिक घटना में बदल जाती है। लेकिन यह जरूर बताता है कि सुरक्षा, जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता का सवाल अभी खत्म नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी अस्पतालों की सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता माना

आरजी कर घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों में डॉक्टरों और अन्य मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा को गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा माना था। अदालत ने कहा था कि डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल कर्मचारी दिन-रात काम करते हैं और अस्पतालों में लोगों की आवाजाही तथा कई हिस्सों तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच स्वास्थ्यकर्मियों को हिंसा के प्रति संवेदनशील बनाती है। कोर्ट ने स्वास्थ्य संस्थानों में सुरक्षित कामकाजी माहौल को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चिंता दर्ज की थी। लेकिन आज भी असली चुनौती यही है कि सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम जमीन पर कितने प्रभावी हैं। अस्पताल में सीसीटीवी, सुरक्षा गार्ड या प्रवेश नियंत्रण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अकेले समस्या का समाधान नहीं कर सकते। अगर एक जूनियर डॉक्टर वरिष्ठ के डर से शिकायत नहीं कर सकता, अगर संविदा कर्मचारी नौकरी जाने के डर से उत्पीड़न सहता है या अगर किसी दलित कर्मचारी को जातिगत अपमान के बावजूद चुप रहना पड़ता है, तो अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था अधूरी है।

हिंसा केवल मरीज और डॉक्टर के बीच का संघर्ष नहीं

अस्पतालों में हिंसा की चर्चा अक्सर मरीजों या उनके परिजनों द्वारा डॉक्टरों पर हमले तक सीमित रहती है। यह एक वास्तविक समस्या है, लेकिन तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एक स्वास्थ्यकर्मी को बाहर से मरीज या परिजन के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है और भीतर से वरिष्ठ अधिकारी, सुपरवाइजर या संस्थागत पदानुक्रम का दबाव। किसी महिला कर्मचारी के सामने लैंगिक उत्पीड़न का खतरा हो सकता है, जबकि किसी संविदा कर्मचारी के सामने नौकरी खोने का डर। जातिगत या सामाजिक पहचान भी कई मामलों में इस असमानता को और गहरा कर सकती है। इसलिए अस्पतालों में सुरक्षा का अर्थ केवल यह नहीं होना चाहिए कि कोई बाहरी व्यक्ति डॉक्टर पर हमला न करे। सुरक्षा का अर्थ यह भी है कि अस्पताल के भीतर कोई वरिष्ठ अपने पद का दुरुपयोग न कर सके और कोई कर्मचारी शिकायत करने के बाद प्रतिशोध का शिकार न हो।  

जाति का सवाल आज भी खत्म नहीं हुआ

2026 में प्रकाशित बिहार के एक नए अध्ययन ने स्वास्थ्य सेवा में जाति और धर्म आधारित भेदभाव के सवाल को भी नए साक्ष्य के साथ सामने रखा है। अध्ययन में मानकीकृत मरीजों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा के अनुभवों की तुलना की गई और धार्मिक पहचान के आधार पर देखभाल की गुणवत्ता में अंतर के संकेत मिले। शोधकर्ताओं ने इसे भारत में स्वास्थ्य सेवा की समानता के लिए महत्वपूर्ण चिंता बताया। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि अस्पताल को समाज से अलग कोई दुनिया नहीं माना जा सकता। जिस समाज में जाति, धर्म, लिंग और आर्थिक स्थिति सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं, उनके प्रभाव स्वास्थ्य संस्थानों के भीतर भी दिखाई दे सकते हैं। यही कारण है कि अस्पतालों में समानता का सवाल केवल मरीजों तक सीमित नहीं होना चाहिए। डॉक्टरों, नर्सों, मेडिकल छात्रों, सफाईकर्मियों, वार्ड अटेंडेंट और संविदा कर्मचारियों के साथ भी समान सम्मान और निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करना जरूरी है। 

2026 में असली सवाल: क्या शिकायत करना सुरक्षित है?

किसी भी संस्थान की कार्य संस्कृति को परखने का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं है कि वहां कितने नियम लिखे हुए हैं। असली पैमाना यह है कि कोई कमजोर कर्मचारी अपने वरिष्ठ के खिलाफ शिकायत करने के बाद भी सुरक्षित रह सकता है या नहीं। अगर शिकायत के बाद नौकरी जाने का डर है, परीक्षा में नुकसान का डर है, करियर प्रभावित होने का डर है या सामाजिक बहिष्कार का डर है, तो कागज पर मौजूद शिकायत समिति भी कर्मचारी के लिए बेअसर हो जाती है। यही वजह है कि अस्पतालों में स्वतंत्र शिकायत तंत्र, बाहरी निगरानी, शिकायतकर्ता की सुरक्षा और समयबद्ध कार्रवाई बेहद जरूरी है।

आरजी कर से आगे बढ़ने का मतलब घटना को भूलना नहीं

आरजी कर की घटना को केवल एक भयावह अपराध के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी सबसे बड़ी सीख यह है कि अस्पतालों में सुरक्षा को व्यापक रूप से परिभाषित किया जाए। सुरक्षा का मतलब महिला डॉक्टर के लिए सुरक्षित नाइट ड्यूटी रूम भी है। यह जूनियर डॉक्टर के लिए सम्मानजनक कार्यस्थल भी है। यह दलित और आदिवासी कर्मचारी के लिए जातिगत अपमान से मुक्ति भी है। यह संविदा कर्मचारी के लिए नौकरी की सुरक्षा भी है। यह नर्स और सफाईकर्मी के लिए सुरक्षित कार्य परिस्थितियां भी हैं। और सबसे महत्वपूर्ण, यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसी कर्मचारी को अपनी नौकरी, जाति, लिंग या करियर की कीमत पर चुप रहने के लिए मजबूर न होना पड़े।

अस्पताल बचाने वालों को भी बचाना होगा

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टर और मरीज अक्सर आमने-सामने दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा संस्थागत ढांचा मौजूद है। अगर उस ढांचे में कर्मचारियों की कमी, लंबे काम के घंटे, असुरक्षित परिसर, संविदा रोजगार, जातिगत भेदभाव और शिकायतों पर कमजोर कार्रवाई बनी रहती है, तो केवल नए सुरक्षा दिशानिर्देश पर्याप्त नहीं होंगे। 2026 की स्थिति यह याद दिलाती है कि आरजी कर का सवाल अभी इतिहास का हिस्सा नहीं बना है। नए अध्ययन, अस्पतालों में हिंसा की घटनाएं और मामले में दोबारा जांच जैसी गतिविधियां दिखाती हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा पर बहस अभी भी जरूरी है।

अस्पतालों को केवल मरीजों के लिए सुरक्षित स्थान बनाने की नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित कार्यस्थल बनाने की जरूरत है। क्योंकि जो व्यवस्था अपने स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षा और सम्मान नहीं दे सकती, वह लंबे समय तक मरीजों को भी सुरक्षित और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा नहीं दे सकती।