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डॉक्टरों की कमी और खराब मेडिकल उपकरणों पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त
तमिलनाडु के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में खाली पड़े डॉक्टरों और मेडिकल ऑफिसरों के पद तथा काम नहीं कर रहे चिकित्सा उपकरण अब मद्रास हाई कोर्ट के निशाने पर हैं। मदुरै बेंच ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने चिकित्सा शिक्षा निदेशक और सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं निवारक चिकित्सा निदेशक को अस्पतालों की मौजूदा स्थिति और समस्याओं को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देने का निर्देश दिया है।

यह मामला पुडुकोट्टई निवासी के. मुरुगानंदम की ओर से दाखिल जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में लंबे समय से खाली पड़े चिकित्सकीय और अन्य पदों को भरने के साथ-साथ खराब पड़े मेडिकल उपकरणों को ठीक कराने की मांग की गई है।
47 डॉक्टरों और 150 से अधिक मेडिकल ऑफिसरों के पद खाली
याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार यानी RTI के जरिए प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर अदालत को बताया कि संबंधित सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में करीब 47 डॉक्टरों के पद खाली हैं। इसके अलावा 150 से अधिक मेडिकल ऑफिसरों के पद भी रिक्त बताए गए हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में डॉक्टरों की भूमिका केवल मरीजों के इलाज तक सीमित नहीं होती। यहां ओपीडी, इमरजेंसी, वार्ड, ऑपरेशन, विशेषज्ञ सेवाओं के साथ मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों की ट्रेनिंग भी होती है। ऐसे में बड़ी संख्या में पद खाली रहने से मौजूदा चिकित्सकीय कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ने और मरीजों की सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
तिरुचिरापल्ली और तूतीकोरिन के अस्पतालों में उपकरणों पर सवाल
जनहित याचिका में तिरुचिरापल्ली और तूतीकोरिन के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में कई चिकित्सा उपकरणों के काम नहीं करने का मुद्दा भी उठाया गया है। अस्पतालों में डायग्नोस्टिक मशीनों से लेकर उपचार और आपातकालीन सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि जरूरी उपकरण लंबे समय तक खराब रहें तो मरीजों को जांच या इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर करने की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में सभी गैर-कार्यशील उपकरणों की पूरी सूची या उनके खराब रहने की अवधि का विस्तृत विवरण सामने नहीं आया है।
RTI के आंकड़ों के आधार पर उठाया गया मामला
याचिकाकर्ता ने अपने दावों के समर्थन में RTI से प्राप्त जानकारी अदालत के समक्ष रखी। याचिका में सरकारी अस्पतालों में मानव संसाधन और मेडिकल उपकरणों से जुड़ी कमियों को दूर करने के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं और इन संस्थानों में पर्याप्त चिकित्सकीय स्टाफ तथा कार्यशील उपकरणों का होना जरूरी है।
सरकार ने बताया, बजट का प्रावधान किया गया
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इन समस्याओं को दूर करने के लिए बजट का प्रावधान किया जा चुका है। सरकार ने मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। इसके बाद हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत के सामने अब यह स्पष्ट किया जाना है कि कितने पद वास्तव में खाली हैं, उन्हें भरने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं और अस्पतालों में खराब पड़े उपकरणों की मरम्मत या उन्हें बदलने के लिए क्या कार्रवाई की गई है।
सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल खाली पदों और खराब मशीनों तक सीमित नहीं है। सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में इलाज, मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण तीनों जिम्मेदारियां एक साथ होती हैं। इसलिए यहां पर्याप्त डॉक्टरों, मेडिकल ऑफिसरों, तकनीकी कर्मचारियों और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता सीधे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी है। यदि डॉक्टरों के पद लंबे समय तक खाली रहते हैं, तो मरीजों की संख्या के मुकाबले उपलब्ध चिकित्सकीय कर्मचारियों का अनुपात प्रभावित हो सकता है। वहीं, जरूरी उपकरणों के खराब रहने से अस्पताल की जांच और उपचार क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
अदालत की रिपोर्ट से सामने आएगी वास्तविक स्थिति
मद्रास हाई कोर्ट ने फिलहाल सरकार से स्थिति स्पष्ट करने के लिए रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में रिक्त पदों, गैर-कार्यशील उपकरणों और उन्हें दूर करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी आने के बाद मामले की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। अब निगाहें सरकार की रिपोर्ट पर हैं, जिसमें यह बताया जाना है कि सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मानव संसाधन और उपकरणों की कमी को दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर निर्भर लाखों मरीजों के लिए यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि डॉक्टरों की उपलब्धता और काम करने वाले मेडिकल उपकरण सीधे इलाज की पहुंच और गुणवत्ता से जुड़े हैं। हाई कोर्ट की कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में केवल सुविधाएं उपलब्ध कराना पर्याप्त है या उनके नियमित संचालन और रखरखाव पर भी उतना ही ध्यान दिया जा रहा है।
