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ओडिशा में कागजों पर 100% विद्युतीकरण, लेकिन नूनारेश गांव आज भी अंधेरे में

ओडिशा सरकार भले ही सभी राजस्व गांवों के विद्युतीकरण का दावा करती है, लेकिन कालाहांडी का नूनारेश गांव इस दावे की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाता है। यहां लगाए गए सोलर सिस्टम खराब होने के बाद ग्रामीण फिर से रोशनी के लिए बैटरी, पावर बैंक और डीजल जनरेटर पर निर्भर हैं। यह मामला बताता है कि सिर्फ बिजली कनेक्शन या सोलर पैनल पहुंचाना पर्याप्त नहीं, बल्कि नियमित बिजली आपूर्ति, रखरखाव और किफायती ऊर्जा भी जरूरी है।

Anshuman Mishra13 अग. 2026, 09:43 PM IST
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ओडिशा में कागजों पर 100% विद्युतीकरण, लेकिन नूनारेश गांव आज भी अंधेरे में


ओडिशा: ओडिशा सरकार का दावा है कि राज्य के सभी राजस्व गांवों तक बिजली पहुंच चुकी है। लेकिन कालाहांडी जिले के दूरदराज आदिवासी गांव नूनारेश की तस्वीर इस दावे के दूसरे पहलू को सामने लाती है। यहां बिजली पहुंचने के प्रयास हुए, सौर ऊर्जा आधारित सिस्टम लगाए गए, लेकिन सिस्टम खराब होने के बाद ग्रामीण दोबारा अंधेरे में लौट आए। यह मामला बताता है कि किसी गांव को ‘विद्युतीकृत’ घोषित करना और वहां लोगों को लगातार, भरोसेमंद और किफायती बिजली मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

30 घर, करीब 200 लोग और बिजली अब भी दूर
नूनारेश ओडिशा के कालाहांडी जिले के थुआमूल रामपुर ब्लॉक में स्थित एक दूरस्थ मंडा खोंड/कंध आदिवासी बस्ती है। चार छोटे-छोटे टोले मिलाकर यहां करीब 30 घर और लगभग 200 लोग रहते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक थुआमूल रामपुर ब्लॉक में करीब 15 गांव अब भी ग्रिड से बाहर हैं। गांव में बिजली के साथ-साथ सुरक्षित पेयजल, स्कूल, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य सुविधाओं की भी भारी कमी है। नजदीकी प्राथमिक स्कूल लगभग 5 किलोमीटर दूर है, जबकि सरकारी अस्पताल करीब 45 किलोमीटर दूर और निजी अस्पताल लगभग 60 किलोमीटर दूर है। गांव तक नियमित एंबुलेंस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। मुख्य सड़क करीब 3 किलोमीटर दूर है, जहां तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को पैदल जाना पड़ता है।

2017 में आई रोशनी, लेकिन ज्यादा दिन नहीं टिकी
नूनारेश के ग्रामीणों के लिए बिजली की उम्मीद 2017 में जगी, जब SELCO Foundation की ओर से सोलर होम सिस्टम लगाए गए। इनमें 40 वॉट का सोलर पैनल, बैटरी, इन्वर्टर, एलईडी लाइट, सॉकेट और अन्य उपकरण शामिल थे। शुरुआत में गांव रोशन हुआ, लेकिन कुछ वर्षों में सिस्टम खराब होने लगे। ग्रामीणों के मुताबिक कई इन्वर्टर भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाए। बाद में 2021 में Integrated Tribal Development Agency (ITDA) की ओर से भी सोलर सिस्टम दिए गए, लेकिन वे भी कुछ ही महीनों में खराब हो गए। एक ग्रामीण के मुताबिक, दो एलईडी बल्ब और एक पंखा केवल 4-5 दिन चले, जबकि पैनल करीब दो महीने और इन्वर्टर लगभग साढ़े तीन महीने तक ही काम कर पाया।

सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?
फरवरी 2026 में ओडिशा सरकार ने विधानसभा में बताया था कि राज्य के सभी राजस्व गांवों तक बिजली पहुंच चुकी है। हालांकि सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ व्यक्तिगत घर अभी भी बिजली कनेक्शन से वंचित हैं और ऐसे घरों की पहचान के लिए सर्वे कराया जा रहा है। ऊर्जा मंत्री और उपमुख्यमंत्री केवी सिंह देव के अनुसार, 2024 के बाद से 35,741 घरों को बिजली कनेक्शन दिए गए हैं। वहीं, बंगीरिपोसी विधानसभा क्षेत्र के तीन ब्लॉकों में 1,059 घरों के बिजली कनेक्शन अभी लंबित बताए गए थे। आदिवासी इलाकों में बिना बिजली वाले घरों को PM-JANMAN के तहत कवर करने की बात भी कही गई थी।

असली समस्या सिर्फ कनेक्शन नहीं, ‘ऊर्जा की विश्वसनीयता’ है
नूनारेश की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। बिजली के बुनियादी ढांचे की मौजूदगी अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अगर सिस्टम खराब हो जाए, उसकी मरम्मत के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध न हो या मरम्मत की लागत ग्रामीणों की क्षमता से बाहर हो, तो बिजली की पहुंच व्यवहारिक रूप से खत्म हो जाती है। Decentralised Renewable Energy यानी DRE ऐसे छोटे स्तर के अक्षय ऊर्जा सिस्टम हैं जो बिजली को उपभोक्ता के नजदीक पैदा और उपलब्ध कराते हैं। दूरदराज इलाकों में जहां ग्रिड पहुंचाना मुश्किल या महंगा है, वहां सोलर होम सिस्टम और मिनी-ग्रिड जैसे मॉडल बेहद उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन इनके लिए स्थापना के साथ-साथ लंबे समय तक रखरखाव और स्थानीय तकनीकी सहायता भी जरूरी है।

कम आय वाले परिवारों के लिए मरम्मत भी बड़ी चुनौती
नूनारेश में समस्या सिर्फ सिस्टम लगाने तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट के अनुसार गांव के लोगों की सालाना आय करीब 15,000 से 35,000 रुपये के बीच बताई गई है। ऐसे में दूर स्थित शहर से उपकरणों की मरम्मत या नए सिस्टम की खरीद करना बेहद मुश्किल है। एक ग्रामीण ने बताया कि बेहतर हाइब्रिड मिनी-ग्रिड सिस्टम की कीमत करीब 36,000 रुपये हो सकती है। इतनी कम वार्षिक आय में यह खर्च उठाना उनके लिए लगभग असंभव है। खराब सिस्टम की मरम्मत के लिए करीब 60 किलोमीटर दूर भवानीपटना जाना भी बड़ी चुनौती है।

बिजली के लिए आज भी दूसरे गांव जाना पड़ता है
फिलहाल नूनारेश के लोग कुछ इमरजेंसी लाइट, बैटरी और पावर बैंक पर निर्भर हैं। पावर बैंक चार्ज करने के लिए उन्हें करीब 3 किलोमीटर दूर खाकेश गांव जाना पड़ता है। बैटरी खत्म होने के बाद फिर वही सफर करना पड़ता है। सामुदायिक कार्यक्रमों के दौरान ग्रामीण कुछ दिनों के लिए डीजल जनरेटर किराये पर लेते हैं, जिसकी लागत करीब 1,500 से 2,000 रुपये तक आती है और इसे कई परिवार मिलकर वहन करते हैं।

ओडिशा ही नहीं, ग्रामीण विद्युतीकरण की बड़ी चुनौती
नूनारेश का मामला यह सवाल उठाता है कि भारत में ग्रामीण विद्युतीकरण को सिर्फ बिजली के कनेक्शन या बुनियादी ढांचे की मौजूदगी से क्यों मापा जाए। 2024 में Down To Earth की एक रिपोर्ट ने भी बताया था कि गांव के विद्युतीकृत घोषित होने और वहां गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध होने के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। ऐतिहासिक रूप से भी ग्रामीण विद्युतीकरण की परिभाषा और वास्तविक घरेलू बिजली पहुंच के बीच अंतर चिंता का विषय रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऊर्जा गरीबी को कम से कम तीन पैमानों पर देखना जरूरी है—पहला, बिजली तक पहुंच; दूसरा, बिजली की विश्वसनीयता; और तीसरा, बिजली की कीमत। नूनारेश इन तीनों मोर्चों पर चुनौती दिखाता है।

आगे क्या होना चाहिए?
नूनारेश जैसे दूरदराज इलाकों के लिए सिर्फ नए सोलर पैनल लगाना पर्याप्त नहीं होगा। सिस्टम की नियमित निगरानी, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित तकनीशियन, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और कम लागत वाली मरम्मत व्यवस्था जरूरी है। इसके साथ ही ऐसे गांवों की पहचान केवल ‘विद्युतीकृत’ या ‘गैर-विद्युतीकृत’ के दो वर्गों में करने के बजाय यह भी दर्ज किया जाना चाहिए कि कितने घरों में वास्तव में बिजली उपलब्ध है, कितने घंटे बिजली मिलती है, सिस्टम कितने समय से काम कर रहा है और खराब होने पर कितने समय में उसकी मरम्मत होती है। नूनारेश की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विकास के आंकड़ों और जमीन पर रहने वाले लोगों के अनुभव के बीच का अंतर दिखाती है। बिजली का पैनल लग जाना या कनेक्शन मिल जाना ऊर्जा सुरक्षा की अंतिम मंजिल नहीं है। असली विद्युतीकरण तब होगा, जब रोशनी लगातार मिले, उसे चलाना और उसकी मरम्मत कराना लोगों की पहुंच में हो और बिजली गांव के विकास—शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सुरक्षा—का स्थायी आधार बन सके।