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मूर्ति नहीं बनी, पूजा नहीं हुई तो ‘देवता’ का कानूनी अस्तित्व कैसे? इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सिर्फ भक्ति से नहीं मिलेगा मुकदमा लड़ने का अधिकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवता की कानूनी हैसियत और श्रद्धालुओं के मुकदमा दायर करने के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब किसी संपत्ति पर जिस देवता की मूर्ति स्थापित करने की बात दस्तावेज में कही गई हो, वह मूर्ति कभी स्थापित या प्राण-प्रतिष्ठित ही न हुई हो, तो उस विशेष मामले में देवता के नाम पर ऐसा ‘ज्यूरिस्टिक पर्सन’ अस्तित्व में नहीं माना जा सकता, जिसके नाम संपत्ति निहित हो। सिर्फ भगवान के प्रति आस्था या भक्ति रखने से कोई व्यक्ति स्वतः उनकी ओर से संपत्ति का मुकदमा लड़ने का कानूनी अधिकार हासिल नहीं कर लेता।

प्रयागराज:
क्या किसी देवता के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा मात्र किसी व्यक्ति को उस देवता की ओर से संपत्ति का मुकदमा दायर करने का कानूनी अधिकार दे सकती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संपत्ति विवाद में इसका जवाब नकारात्मक दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी दस्तावेज में भविष्य में किसी देवता की मूर्ति स्थापित करने की बात कही गई हो, लेकिन मूर्ति कभी स्थापित या प्राण-प्रतिष्ठित ही न हुई हो, तो उस विशेष व्यवस्था में ऐसा ज्यूरिस्टिक पर्सन अस्तित्व में नहीं आता, जिसके नाम संपत्ति निहित हो सके। केवल देवता के प्रति भक्ति रखने वाले लोगों को उसके नाम पर मुकदमा दायर करने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
यह फैसला जस्टिस अनिल कुमार-X ने ‘Murti Shri Ram Chandra Ji Virajman And 6 Others v. Ashish And 19 Others’ मामले में 28 जुलाई 2026 को सुनाया। 15 अगस्त 2026 को सामने आई रिपोर्ट में इसी फैसले के आधार पर भक्तों के locus standi और deity की juristic personality के सवाल को प्रमुखता से उठाया गया है।
पूरा मामला क्या है?
विवाद मिर्जापुर के Tarkapur गांव की लगभग 5 बीघा 18 बिस्वा जमीन से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, 13 मार्च 1947 को जमीन का perpetual lease Kedar Nath Mishra के पक्ष में हुआ था। इसके बाद 17 अगस्त 1949 को एक दस्तावेज के जरिए संपत्ति को भगवान श्रीरामचंद्रजी के लिए समर्पित करने और भविष्य में वहां भगवान की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया। संपत्ति के प्रबंधन की जिम्मेदारी Kailash Nath Agrawal और उनके उत्तराधिकारियों को दी गई थी। बाद में आरोप लगा कि कैलाश नाथ अग्रवाल के उत्तराधिकारियों ने संपत्ति का बंटवारा कर लिया और उसके कुछ हिस्से बेच दिए। इसके बाद वादियों ने भगवान श्रीराम के प्रति अपनी आस्था का हवाला देते हुए खुद को deity का ‘next friend’ बताते हुए मुकदमा दायर किया।
सबसे बड़ा सवाल: क्या मूर्ति कभी स्थापित हुई थी?
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य बन गया। रिकॉर्ड और अदालत के निष्कर्ष के अनुसार, संबंधित संपत्ति पर न तो मंदिर बनाया गया, न भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित हुई और न ही उसकी प्राण-प्रतिष्ठा हुई। इसके अलावा नियमित पूजा-पाठ, पुजारी की नियुक्ति या किसी धार्मिक संस्था के संचालन की भी वास्तविक व्यवस्था अस्तित्व में नहीं आई। यानी 1949 के दस्तावेज में जिस धार्मिक व्यवस्था की कल्पना की गई थी, वह जमीन पर वास्तविक रूप में स्थापित नहीं हुई।
‘Juristic Person’ का मतलब क्या है?
भारतीय कानून में कुछ परिस्थितियों में स्थापित हिंदू deity या idol को ‘juristic person’ माना जा सकता है। इसका अर्थ है कि कानून उस deity को कुछ अधिकारों और संपत्ति के संदर्भ में एक कानूनी इकाई के रूप में पहचान सकता है। ऐसी स्थिति में deity के नाम पर संपत्ति रखी जा सकती है और उसके हितों की रक्षा के लिए उसका अधिकृत प्रतिनिधि या उपयुक्त next friend अदालत का रुख कर सकता है। लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट का सवाल यह था कि क्या 1949 की deed के आधार पर ऐसा juristic person वास्तव में अस्तित्व में आया, जबकि जिस मूर्ति को स्थापित करने की बात कही गई थी, वह कभी स्थापित ही नहीं हुई। हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसका उत्तर नकारात्मक दिया।
सिर्फ भक्त होने से नहीं मिलेगा मुकदमा दायर करने का अधिकार
हाईकोर्ट ने वादियों की legal standing पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। वादियों का दावा मुख्य रूप से भगवान श्रीराम के प्रति उनकी श्रद्धा और भक्ति पर आधारित था। लेकिन उन्होंने संपत्ति में अपना कोई स्वतंत्र title, possession या स्वतंत्र पूजा-अधिकार स्थापित नहीं किया। कोर्ट ने माना कि केवल किसी देवता के प्रति devotion अपने आप किसी व्यक्ति को उस deity की संपत्ति के स्वामित्व या प्रबंधन से जुड़े विवाद में मुकदमा दायर करने का अधिकार नहीं देता। यही कारण रहा कि plaintiffs का locus standi स्वीकार नहीं किया गया।
2017 में Trial Court ने क्या किया था?
मामले की शुरुआत कई वर्ष पहले हुई थी। Trial Court ने 11 दिसंबर 2017 को Order VII Rule 11 CPC के तहत वाद को खारिज कर दिया था। प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि plaintiffs के पास मुकदमा दायर करने का वैधानिक आधार नहीं है और suit maintainable नहीं है।इसके बाद plaintiffs ने appeal की। Additional District Judge, Mirzapur ने 18 जुलाई 2018 को Trial Court के आदेश को पलट दिया और मामले को आगे सुनवाई के लिए भेज दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
2022 का इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला क्यों बेहद महत्वपूर्ण है?
इस मामले की सबसे दिलचस्प कानूनी कड़ी 27 जून 2022 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला है। उस समय Justice Rohit Ranjan Agarwal के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या plaintiffs का suit केवल pleadings के आधार पर Order VII Rule 11 CPC के तहत शुरुआत में ही खारिज किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने उस stage पर suit को तुरंत खत्म करने से इनकार किया था। कोर्ट ने माना था कि 1949 की deed और plaint में किए गए दावों को देखते हुए मामला trial में जाना चाहिए और केवल शुरुआती स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि plaintiffs का दावा पूरी तरह अस्थिर है। यानी 2022 का फैसला मुख्य रूप से procedural stage पर था।
2022 और 2026 के फैसले में विरोधाभास है?
ऊपरी तौर पर दोनों फैसले अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से दोनों को उनके अलग-अलग procedural stages में देखना जरूरी है। 2022 में सवाल था कि क्या plaint को Order VII Rule 11 CPC के तहत threshold पर ही खारिज किया जा सकता है। वहीं बाद के proceedings में अदालत ने उपलब्ध facts और evidence के आधार पर धार्मिक endowment, मूर्ति की स्थापना और plaintiffs के locus standi के substantive पहलुओं पर विचार किया। इसीलिए 2022 के आदेश को यह मानकर नहीं पढ़ा जा सकता कि High Court ने अंतिम रूप से यह घोषित कर दिया था कि deity का juristic personality claim वैध था।यह distinction आपकी खबर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
क्या हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू देवी-देवता Juristic Person नहीं होते?
नहीं।
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण legal clarification यही है। भारतीय कानून में स्थापित न्यायिक सिद्धांत के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में स्थापित deity/idol को juristic person माना जा सकता है। मौजूदा मामले में अदालत का निष्कर्ष विशेष factual circumstances पर आधारित है—1949 की deed में भविष्य में मूर्ति स्थापित करने की बात थी, लेकिन मूर्ति कभी स्थापित नहीं हुई और संबंधित धार्मिक व्यवस्था भी अस्तित्व में नहीं आई। इसलिए इस particular arrangement में deity के नाम पर ऐसा juristic personality/endowment अस्तित्व में आया ही नहीं, जिसके आधार पर केवल श्रद्धालु व्यक्ति उसकी ओर से property litigation चला सकें।
अयोध्या मामले से कैसे अलग है यह मामला?
यहां Ayodhya judgment का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। Supreme Court ने Ayodhya मामले में Ram Lalla Virajman को juristic person के रूप में मान्यता दी थी।
लेकिन Ayodhya मामले की factual circumstances अलग थीं। वहां deity, idol worship, धार्मिक स्थल और पूजा से जुड़े विस्तृत evidence अदालत के सामने थे। इसलिए वर्तमान फैसले को Ayodhya judgment के खिलाफ किसी व्यापक सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों मामलों में मूल factual foundation अलग है।
‘भक्त’, ‘Next Friend’ और ‘Shebait’ में अंतर
इस मामले को समझते समय तीन कानूनी अवधारणाओं को अलग रखना जरूरी है—भक्त, next friend और shebait। किसी व्यक्ति का भक्त होना अपने आप उसे deity की संपत्ति का प्रतिनिधि नहीं बना देता। जब किसी deity को कानून juristic person के रूप में मान्यता देता है, तो उसके हितों की रक्षा के लिए कानूनन मान्य प्रतिनिधित्व की आवश्यकता होती है। परिस्थितियों के अनुसार shebait या उपयुक्त next friend deity की ओर से अदालत में कार्रवाई कर सकता है। लेकिन पहले यह स्थापित होना जरूरी है कि जिस deity के नाम पर दावा किया जा रहा है, उसके संबंध में वैध legal/juristic status और endowment अस्तित्व में आया है। यही मूल समस्या वर्तमान विवाद में सामने आई।
Mandatory Injunction की मांग भी क्यों नहीं मानी गई?
वादियों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संपत्ति का प्रबंधन अपने हाथ में लेने का निर्देश देने की मांग भी की थी। हाईकोर्ट ने इस relief को भी स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने माना कि mandatory injunction के लिए आवश्यक parties और legal foundation मौजूद नहीं थी। इसके अलावा plaintiffs ने स्वयं संपत्ति पर कोई स्वतंत्र अधिकार या पूजा-अधिकार स्थापित नहीं किया था। इसलिए केवल धार्मिक आस्था के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था बदलने का आदेश नहीं दिया जा सकता था।
धार्मिक Endowment और Private Gift का सवाल
फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक endowment और private gift के बीच अंतर है। किसी संपत्ति को deity के लिए समर्पित करने की बात लिख देना अपने आप हर परिस्थिति में पूर्ण धार्मिक endowment सिद्ध नहीं करता। अदालत को यह भी देखना पड़ सकता है कि क्या वास्तव में dedication हुआ, क्या deity का legal personality अस्तित्व में आया, क्या संपत्ति उस deity में vest हुई और क्या धार्मिक संस्था या पूजा की व्यवस्था वास्तविक रूप में स्थापित हुई। मौजूदा मामले में इन तथ्यों की अनुपस्थिति ने plaintiffs के दावे को कमजोर किया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने सिद्धांतों का महत्व
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में deity को juristic person मानने का सिद्धांत नया नहीं है। कई फैसलों में स्थापित deity को संपत्ति रखने और उसके behalf पर litigation करने की क्षमता को स्वीकार किया गया है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—हर धार्मिक भावना, हर प्रस्तावित मंदिर या भविष्य में स्थापित की जाने वाली मूर्ति को स्वतः juristic person नहीं माना जा सकता। यही distinction वर्तमान इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को महत्वपूर्ण बनाता है।
कानून की भाषा में फैसले का सार
इस फैसले को सरल शब्दों में समझें तो अदालत ने यह नहीं कहा कि “भक्तों का धर्म से कोई संबंध नहीं है।” अदालत ने केवल यह कहा कि नागरिक मुकदमा दायर करने के लिए legal standing जरूरी है। यदि किसी दस्तावेज में भविष्य में किसी deity की मूर्ति स्थापित करने की बात लिखी गई थी, लेकिन मूर्ति कभी स्थापित ही नहीं हुई और कोई वास्तविक religious endowment भी अस्तित्व में नहीं आया, तो केवल उस deity के प्रति devotion के आधार पर व्यक्ति को उसकी संपत्ति का मुकदमा लड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता।
28 जुलाई 2026 का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह फैसला केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं है। इसमें धार्मिक endowment, deity की juristic personality, locus standi, next friend, private property, gift deed और mandatory injunction जैसे कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न एक साथ सामने आते हैं। खास तौर पर 2022 के procedural order और 2026 के बाद के substantive findings को साथ पढ़ने से यह साफ होता है कि मुकदमे के अलग-अलग चरणों में अदालत के सामने अलग कानूनी प्रश्न थे। इसी वजह से इस फैसले को “High Court ने deity को juristic person मानने से ही इनकार कर दिया” जैसी headline में बदलना कानूनी रूप से भ्रामक होगा। सही बात यह है कि जिस specific endowment पर मुकदमा आधारित था, उसमें मूर्ति स्थापित न होने और अन्य परिस्थितियों के कारण plaintiffs को deity की ओर से संपत्ति संबंधी मुकदमा चलाने का locus नहीं मिला।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला धार्मिक आस्था और कानूनी अधिकार के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर को सामने लाता है। आस्था व्यक्तिगत और धार्मिक अधिकार का विषय हो सकती है, लेकिन अदालत में संपत्ति का मुकदमा चलाने के लिए legal standing, valid cause of action और संबंधित कानूनी अधिकार स्थापित करना आवश्यक है। इस मामले में 1949 की deed में भविष्य में भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित करने की बात कही गई थी, लेकिन मूर्ति कभी स्थापित नहीं हुई। इसी factual background में हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित deity के नाम पर ऐसा juristic personality/endowment अस्तित्व में नहीं आया, जिसके आधार पर केवल श्रद्धालु व्यक्ति संपत्ति की ओर से मुकदमा चला सकें। इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है—“भक्ति अपने आप में locus standi नहीं है।”
