general
6th Pay Commission पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! रिटायरमेंट के बाद दोबारा नियुक्त अधिकारियों को नहीं मिलेगा मनचाहा वेतनमान
6th Pay Commission पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! रिटायरमेंट के बाद दोबारा नियुक्त अधिकारियों को नहीं मिलेगा मनचाहा वेतनमानरना मुख्य रूप से कार्यपालिका तथा विशेषज्ञ वेतन समितियों का विषय है। इस मामले में 6th Pay Commission का लाभ न देने की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना या संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं माना।

नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026।
6th Pay Commission को लेकर सरकारी सेवा से जुड़े अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है। कोर्ट ने Central Government Industrial Tribunals-cum-Labour Courts (CGIT-cum-LCs) में पुनर्नियुक्त Presiding Officers की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 6वें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतनमान दिए जाने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 12 अगस्त 2026 को R.K. Yadav एवं अन्य बनाम Union of India एवं अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्त अधिकारियों को नियमित सरकारी अधिकारियों के समान श्रेणी में रखना जरूरी नहीं है। कोर्ट के मुताबिक पुनर्नियुक्त अधिकारी एक अलग वर्ग हैं और उनके वेतन निर्धारण के लिए अलग नियम लागू किए जा सकते हैं।
मामला आखिर क्या था?
यह मामला Writ Petition (Civil) No. 193 of 2012 से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं R.K. Yadav और एक अन्य अधिकारी की नियुक्ति Central Government Industrial Tribunals-cum-Labour Courts में Presiding Officer के तौर पर हुई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि CGIT-cum-LCs भी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत आने वाले ट्रिब्यूनल हैं और Central Administrative Tribunal तथा Income Tax Appellate Tribunal जैसे अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनलों के अधिकारियों को 6th Pay Commission का लाभ दिया गया है। इसलिए उन्हें भी समान वेतनमान मिलना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि उन्हें District Judiciary के अधिकारियों के समान वेतनमान देकर 6th Pay Commission के लाभ से वंचित किया गया, जो उनके अनुसार समानता के अधिकार के खिलाफ था।
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध किया। सरकार की ओर से बताया गया कि CGIT-cum-LCs के Presiding Officers के वेतनमान पहले National Judicial Pay Commission यानी Shetty Commission की सिफारिशों के आधार पर District Judges के वेतनमान से जोड़े गए थे। बाद में Justice E. Padmanabhan Committee की सिफारिशों के आधार पर वेतनमान में संशोधन किया गया। 16 जनवरी 2012 के आदेश के जरिए संबंधित Presiding Officers के लिए संशोधित वेतन संरचना लागू की गई।
सरकार ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्त अधिकारी थे और ऐसे अधिकारियों के वेतन निर्धारण के लिए Central Civil Services (Fixation of Pay of Re-employed Pensioners) Orders, 1986 लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर याचिका खारिज की?
जस्टिस S.V. Bhatti और जस्टिस N.V. Anjaria की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। फैसला जस्टिस N.V. Anjaria ने लिखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वेतनमान तय करना मूल रूप से कार्यपालिका और विशेषज्ञ संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत सामान्य तौर पर विशेषज्ञ वेतन आयोग या समितियों द्वारा तय वेतन संरचना में तब तक हस्तक्षेप नहीं करती, जब तक कोई स्पष्ट मनमानी या संवैधानिक विसंगति सामने न हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अलग वेतन संरचना होने से Article 14 और Article 16 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। अलग परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को अलग श्रेणी में रखना कानूनन उचित हो सकता है, यदि उसका आधार तार्किक और समझने योग्य हो।
पुनर्नियुक्त अधिकारियों को अलग वर्ग क्यों माना गया?
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद दोबारा नियुक्त किए गए अधिकारी नियमित सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकारियों के समान स्थिति में नहीं होते।
कोर्ट के अनुसार पुनर्नियुक्त अधिकारियों की सेवा और वेतन निर्धारण अलग नियमों से नियंत्रित होते हैं। इसलिए उन्हें नियमित सरकारी अधिकारियों के साथ समान श्रेणी में रखकर समान वेतनमान देने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
District Judiciary से वेतनमान जोड़ने पर भी कोर्ट ने दी सफाई
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा था कि CGIT-cum-LCs के Presiding Officers को District Judiciary के साथ जोड़ना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि संबंधित Presiding Officers को District Judiciary के वेतनमान से जोड़ने की व्यवस्था Shetty Commission और Justice E. Padmanabhan Committee जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं की सिफारिशों पर आधारित थी। कोर्ट ने कहा कि वेतनमान और पदों के बीच समानता तय करना जटिल विषय है और विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा किए गए ऐसे मूल्यांकन में अदालत को सामान्यतः अपना अलग दृष्टिकोण नहीं थोपना चाहिए।
6th Pay Commission को लेकर सबसे अहम बात
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने 6th Pay Commission की सिफारिशों को अमान्य कर दिया है या सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए 6th Pay Commission का लाभ खत्म कर दिया है। फैसला विशेष रूप से इस मामले में CGIT-cum-LCs के पुनर्नियुक्त Presiding Officers द्वारा मांगे गए वेतनमान से संबंधित है। कोर्ट ने उनकी सेवा की विशेष स्थिति और लागू पुनर्नियुक्ति नियमों को देखते हुए 6th Pay Commission के अनुरूप वेतनमान देने से इनकार किया। दरअसल, रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि बाद के नियमों के जरिए CGIT के Presiding Officers के वेतनमान में संशोधन किया गया। 2017 के नियमों में Industrial Tribunal के Presiding Officer के लिए ₹1,44,200–₹2,18,200 का वेतनमान निर्धारित किया गया था, जिसे 2020 और 2021 के संबंधित नियमों में भी जारी रखा गया।
कोर्ट का अंतिम आदेश क्या रहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की 6th Pay Commission के वेतनमान की मांग का कोई पर्याप्त आधार नहीं है। पुनर्नियुक्त अधिकारियों को अलग श्रेणी में रखना Article 14 या Article 16 का उल्लंघन नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने Writ Petition No. 193 of 2012 को meritless मानते हुए खारिज कर दिया। फैसला 12 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट है कि वेतन समानता का दावा केवल इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता कि दो पदों या संस्थाओं का काम कुछ हद तक समान है। नियुक्ति की प्रकृति, सेवा की स्थिति, लागू नियम और विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशें भी महत्वपूर्ण हैं।
इस मामले में कोर्ट ने माना कि सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्त अधिकारियों की स्थिति नियमित सरकारी अधिकारियों से अलग है और उनके वेतन निर्धारण के लिए अलग व्यवस्था की जा सकती है। इसी आधार पर 6th Pay Commission के अनुरूप वेतनमान देने की मांग खारिज कर दी गई।
