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Savarkar टिप्पणी मामले में राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, यूपी की आपराधिक शिकायत पूरी तरह रद्द

राहुल गांधी के लिए सावरकर टिप्पणी मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! शुक्रवार को Justice Dipankar Datta और Justice Sheel Nagu की बेंच ने उत्तर प्रदेश में चल रही आपराधिक कार्यवाही को ही खत्म कर दिया। कोर्ट में जब सवाल उठा कि क्या राहुल गांधी के खिलाफ Section 153-A IPC के तहत मुकदमा चलाने के लिए यूपी सरकार की जरूरी मंजूरी ली गई थी, तो जवाब आया—नहीं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, “Sanction नहीं है तो मामला यहीं खत्म,” और शिकायत के साथ मजिस्ट्रेट के सभी संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया।

Sonali15 अग. 2026, 01:10 PM IST
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Savarkar टिप्पणी मामले में राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, यूपी की आपराधिक शिकायत पूरी तरह रद्द

नई दिल्ली, 14 अगस्त 2026 — 

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को विनायक दामोदर सावरकर पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े उत्तर प्रदेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को लखनऊ में लंबित निजी आपराधिक शिकायत और उसके आधार पर मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया। Justice Dipankar Datta और Justice Sheel Nagu की पीठ ने यह फैसला मुख्य रूप से एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी के आधार पर दिया—उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से राहुल गांधी के खिलाफ IPC की धारा 153-A के तहत अभियोजन चलाने के लिए आवश्यक sanction मौजूद नहीं था। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश Additional Solicitor General KM Nataraj ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई sanction नहीं दी गई थी।

SC में आज क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान Justice Dipankar Datta ने सबसे पहले राज्य सरकार से पूछा कि क्या राहुल गांधी के अभियोजन के लिए आवश्यक sanction दी गई है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि कोई sanction नहीं दी गई है। इसके बाद शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि sanction आवश्यक है तो समन आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा Magistrate के पास भेजा जा सकता है, ताकि कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया। Justice Datta ने स्पष्ट किया कि sanction संज्ञान लेने से पहले आवश्यक है। अदालत की टिप्पणी का सार था कि यदि आवश्यक sanction ही नहीं है तो मामला आगे नहीं चल सकता। इसके बाद पीठ ने शिकायत और मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यूपी सरकार द्वारा दाखिल affidavit में राहुल गांधी के अभियोजन के लिए sanction दिए जाने का कोई खुलासा नहीं है।

Section 196 CrPC क्यों बना इस मामले का सबसे बड़ा आधार?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू Section 196 CrPC है। धारा 153-A IPC ऐसे अपराध से संबंधित है जिसमें अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है। ऐसे अपराध के संबंध में कानून में निर्धारित परिस्थितियों में अदालत द्वारा cognizance लेने से पहले सरकार की sanction की आवश्यकता होती है। आज सुप्रीम कोर्ट के सामने यही सवाल निर्णायक बन गया कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार ने राहुल गांधी के खिलाफ धारा 153-A के तहत अभियोजन के लिए आवश्यक sanction दी थी। राज्य सरकार का जवाब था—नहीं। यही जवाब राहुल गांधी के पक्ष में निर्णायक साबित हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही समाप्त कर दी।

मामला शुरू कैसे हुआ था?

मामले की जड़ नवंबर 2022 की राहुल गांधी की टिप्पणी से जुड़ी है। शिकायत के अनुसार, 17 नवंबर 2022 को महाराष्ट्र के अकोला में Bharat Jodo Yatra के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने सावरकर को लेकर कथित तौर पर ऐसी टिप्पणी की थी जिसमें उन्हें अंग्रेजों का सेवक बताया गया और ब्रिटिश सरकार से पेंशन लेने की बात कही गई।

शिकायतकर्ता अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे ने आरोप लगाया कि इस टिप्पणी का उद्देश्य सावरकर की छवि को नुकसान पहुंचाना और समाज में घृणा एवं वैमनस्य पैदा करना था।

पहले Magistrate ने शिकायत खारिज कर दी थी

यह मामला सीधे समन से शुरू नहीं हुआ था। रिकॉर्ड के अनुसार, लखनऊ के Additional Chief Judicial Magistrate ने शुरुआती स्तर पर शिकायत को 14 जून 2023 को खारिज कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने इस आदेश को चुनौती दी। Revisional Court ने 3 अक्टूबर 2024 को शिकायत खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस Magistrate के पास भेज दिया और उपलब्ध सामग्री एवं गवाहों के बयानों के आधार पर नए सिरे से विचार करने को कहा।इसके बाद मामला दोबारा Magistrate के सामने आया।

दिसंबर 2024 में Rahul Gandhi को किया गया था Summon

13 दिसंबर 2024 को Lucknow के Additional Chief Judicial Magistrate Alok Verma ने राहुल गांधी को आरोपी के रूप में summon किया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया IPC की धारा 153-A और 505 के तहत अपराध बनता हुआ माना था। अदालत के सामने यह आरोप था कि राहुल गांधी की टिप्पणी टेलीविजन और दूसरे माध्यमों से व्यापक रूप से प्रसारित हुई और इससे समाज में घृणा तथा वैमनस्य फैलने की स्थिति पैदा हुई। यही वह summoning order था जिसे बाद में राहुल गांधी ने चुनौती दी।

मार्च 2025 में पेशी न होने पर ₹200 का जुर्माना भी लगा था

इस मामले में राहुल गांधी की व्यक्तिगत उपस्थिति को लेकर भी घटनाक्रम सामने आया था। मार्च 2025 में उनके अदालत में उपस्थित नहीं होने पर Lucknow court ने ₹200 की लागत लगाई थी। राहुल गांधी की ओर से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए आवेदन दिया गया था। हालांकि, यह कार्रवाई आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामला रद्द किए जाने के मूल कानूनी आधार से अलग है।

4 अप्रैल 2025 को Allahabad High Court ने राहत देने से किया था इनकार

राहुल गांधी ने Lucknow Magistrate के summoning order को चुनौती देते हुए Allahabad High Court की Lucknow Bench का रुख किया।

Justice Subhash Vidyarthi ने 4 अप्रैल 2025 को उन्हें सीधे Section 482 CrPC के तहत राहत देने से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि राहुल गांधी के पास Sessions Court में revision का वैधानिक रास्ता उपलब्ध है, इसलिए उस स्तर पर High Court की inherent jurisdiction का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।

इसके बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अप्रैल 2025 में Supreme Court ने पहले लगाई थी रोक

25 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की Justice Dipankar Datta और Justice Manmohan की पीठ ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए कार्यवाही पर रोक लगाई थी।

लेकिन उस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की सावरकर संबंधी टिप्पणी को लेकर कड़ी नाराजगी भी जताई थी। पीठ ने राजनीतिक व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में सार्वजनिक बयान देते समय सावधानी बरतने पर जोर दिया था और भविष्य में ऐसी टिप्पणी दोहराए जाने की स्थिति में suo motu contempt proceedings की चेतावनी भी दी थी। यह पहलू आज के आदेश को समझने के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। क्योंकि अप्रैल 2025 में कोर्ट ने टिप्पणी की भाषा पर कड़ा रुख दिखाया था, जबकि 14 अगस्त 2026 को मामला टिप्पणी की मेरिट पर तय नहीं हुआ। आज कार्यवाही का अंत sanction की कानूनी कमी के आधार पर हुआ।

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण Savarkar केस भी है

राहुल गांधी से जुड़ा यह एकमात्र सावरकर विवाद नहीं है। महाराष्ट्र में भी राहुल गांधी के खिलाफ सावरकर से संबंधित अलग आपराधिक मानहानि शिकायत सामने आई थी। वह शिकायत सावरकर के परिजन Satyaki Savarkar से जुड़ी है और उसमें राहुल गांधी के 2023 के लंदन भाषण को लेकर आरोप लगाए गए थे। इसलिए Lucknow वाला मामला और Maharashtra/Pune वाला मामला एक ही केस नहीं हैं। आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द की गई कार्यवाही Lucknow में Advocate Nripendra Pandey की शिकायत से संबंधित है।

आज के फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

इस आदेश का सबसे अहम संदेश यह है कि किसी अपराध के लिए कानून यदि prosecution से पहले सरकारी sanction को अनिवार्य बनाता है, तो अदालत उस वैधानिक पूर्व-शर्त को नजरअंदाज करके cognizance नहीं ले सकती। यहां आरोपों की गंभीरता से ज्यादा महत्वपूर्ण procedural safeguard बन गया। यानी अदालत के सामने यह सवाल नहीं था कि राहुल गांधी की टिप्पणी से वास्तव में समाज में वैमनस्य फैला या नहीं, बल्कि पहले यह देखना जरूरी था कि जिस धारा में cognizance लिया गया, उसके लिए आवश्यक sanction मौजूद थी या नहीं। जब उत्तर नकारात्मक आया, तो शिकायत और Magistrate के orders को जारी रखने का आधार नहीं बचा।

राहुल गांधी के लिए क्या मायने रखता है आज का आदेश?

आज का आदेश राहुल गांधी को इस विशेष Lucknow complaint में बड़ी कानूनी राहत देता है। अब इस शिकायत के आधार पर Magistrate द्वारा जारी किए गए संबंधित आदेश कायम नहीं रहेंगे। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि राहुल गांधी से जुड़े सावरकर या अन्य कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से संबंधित हर दूसरी कानूनी कार्यवाही स्वतः समाप्त हो गई है। अलग-अलग शिकायतें और अलग-अलग घटनाओं पर आधारित मामले अपनी-अपनी कानूनी स्थिति रखते हैं।

सावरकर टिप्पणी से शुरू हुआ यह विवाद करीब चार साल बाद Lucknow complaint के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ समाप्त हो गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला राहुल गांधी की टिप्पणी की factual या moral correctness पर नहीं, बल्कि prosecution की वैधानिक प्रक्रिया पर आधारित है।

सबसे निर्णायक तथ्य यही रहा कि Section 153-A IPC के तहत cognizance के लिए आवश्यक सरकारी sanction उपलब्ध नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कमी को आधार बनाकर शिकायत और Magistrate के आदेशों को रद्द कर दिया।