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‘बांझ’ कहकर ताना देना ही 498-A नहीं! इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति के खिलाफ आपराधिक केस रद्द
बच्चा न होने का दर्द, रिश्ते में बढ़ती कड़वाहट और फिर कोर्ट तक पहुंचा विवाद… लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि हर वैवाहिक झगड़े को 498-A की ‘क्रूरता’ का नाम नहीं दिया जा सकता। पत्नी को ‘बांझ’ कहकर ताना देने और बच्चे को लेकर हुए विवाद के आधार पर पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर अदालत ने गंभीरता से गौर किया और पाया कि मामले में आरोप काफी हद तक सामान्य और अस्पष्ट हैं।

लखनऊ:
बच्चे न होने को लेकर पति-पत्नी के बीच हुए विवाद से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी को ‘बांझ महिला’ कहना, बच्चे न होने को लेकर ताने देना या पति-पत्नी के बीच गाली-गलौज और कहासुनी होना, हर स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के तहत ‘क्रूरता’ का अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि 498-A लागू करने के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का प्रथम दृष्टया सामने आना जरूरी है।
न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की एकल पीठ ने 13 अगस्त 2026 को Hirendra Kushwaha बनाम State of U.P. एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पति के खिलाफ धारा 498-A, 323, 504, 506 IPC तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3/4 के तहत जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामला क्या था?
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, महिला की शादी हिरेंद्र कुशवाहा से 14 दिसंबर 2015 को हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि शादी के कई साल बाद भी बच्चा नहीं होने को लेकर वैवाहिक जीवन में विवाद बढ़ने लगा। महिला ने आरोप लगाया कि उसे ‘बांझ’ कहकर ताने दिए जाते थे और पति मेडिकल जांच कराने के लिए तैयार नहीं था।
शिकायत में 23 नवंबर 2020 की एक घटना के संबंध में मारपीट और बेहद गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोप भी लगाए गए थे। महिला के अनुसार, विवाद के बाद उसे कमरे में बंद किया गया और उसके ससुर तथा देवर पर बलात्कार का आरोप लगाया गया। उसने यह भी कहा कि घटना के बाद वह अपने मायके चली गई और सामाजिक दबाव, डर तथा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण तत्काल पूरी घटना नहीं बता सकी। महिला ने आरोप लगाया कि पुलिस से शिकायत करने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले को धारा 156(3) CrPC के तहत दाखिल आवेदन के बाद शिकायत मामले के रूप में आगे बढ़ाया गया।
मजिस्ट्रेट ने पति को किया था तलब
मामले में 17 जनवरी 2023 को संबंधित मजिस्ट्रेट ने पति हिरेंद्र कुशवाहा को IPC की धारा 498-A, 323, 504, 506 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था। हालांकि, ससुर और देवर को तलब करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना गया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की कार्यवाही?
हाईकोर्ट ने शिकायत, पत्नी के बयान और उसके परिवार की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि दहेज की मांग के संबंध में मूल शिकायत में कोई स्पष्ट विवरण नहीं था। बाद के बयान में दहेज मांगने का सामान्य आरोप सामने आया, लेकिन रकम, वस्तु, तारीख, समय या कथित मांग करने वाले व्यक्ति का कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया था। अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता की मां और भाई के बयानों में भी दहेज मांगने की कोई ठोस बात सामने नहीं आई। ऐसे में धारा 3 और 4 दहेज निषेध अधिनियम के तहत समन जारी करना न्यायिक विवेक के पर्याप्त इस्तेमाल के बिना किया गया माना गया।
‘बांझ महिला’ कहना संवेदनहीन है, लेकिन हर मामले में 498-A नहीं
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 498-A से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को ‘बांझ महिला’ कहना निश्चित रूप से असंवेदनशील और निंदनीय है, लेकिन केवल इसी आधार पर धारा 498-A IPC के तहत अपराध नहीं बन जाता। अदालत के अनुसार, 498-A के लिए यह दिखना चाहिए कि कथित आचरण इतना गंभीर और जानबूझकर किया गया था कि वह महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने या उसके जीवन, अंग अथवा शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डालने वाला हो, अथवा वह किसी गैरकानूनी संपत्ति/दहेज की मांग पूरी कराने के लिए उत्पीड़न से जुड़ा हो। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बच्चे न होने को लेकर पति-पत्नी दोनों के बीच अपशब्दों का आदान-प्रदान हुआ था। इसलिए रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह विवाद एकतरफा क्रूरता की बजाय आपसी वैवाहिक कलह के रूप में सामने आया।
धारा 504 IPC पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने धारा 504 IPC यानी जानबूझकर अपमान कर शांति भंग के लिए उकसाने के आरोप पर भी विचार किया। कोर्ट ने कहा कि केवल गाली या अपमानजनक शब्दों का आदान-प्रदान पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को प्रथम दृष्टया यह दिखाना होगा कि अपमान जानबूझकर किया गया था और उसकी प्रकृति ऐसी थी कि उससे शांति भंग या कोई अन्य अपराध होने की संभावना थी। मौजूदा मामले में अदालत ने माना कि कथित शब्द वैवाहिक विवाद के दौरान अचानक हुई कहासुनी के संदर्भ में सामने आए और धारा 504 के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया पूरे नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी लिया सहारा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का सहारा लिया। इनमें State of Haryana v. Bhajan Lal, Kahkashan Kausar v. State of Bihar, Abhishek v. State of Madhya Pradesh, Achin Gupta v. State of Haryana और Dara Lakshmi Narayana v. State of Telangana जैसे फैसले शामिल हैं।
कोर्ट ने विशेष रूप से इस सिद्धांत को ध्यान में रखा कि वैवाहिक विवादों में सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग में बदल सकता है। साथ ही, 498-A को हर वैवाहिक मतभेद या घरेलू अप्रियता पर यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यौन अपराध के आरोपों पर क्या कहा?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने इस आदेश में आरोपों की सत्यता का ट्रायल नहीं किया। अदालत ने यह जांच की कि शिकायत और उपलब्ध सामग्री को उसके चेहरे पर सही मान लेने के बावजूद, क्या पति के खिलाफ जिन धाराओं में उसे तलब किया गया था, उनके आवश्यक कानूनी तत्व प्रथम दृष्टया बनते हैं।
अदालत ने रिकॉर्ड की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि आरोप मुख्य रूप से सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा व्यक्तिगत भूमिकाएं स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं हैं। कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को मौजूदा परिस्थितियों में अत्यंत असंभाव्य माना और कहा कि ऐसे में पति को पूरी आपराधिक सुनवाई का सामना कराना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला ने 13 अगस्त 2026 के आदेश में पति के खिलाफ 17 जनवरी 2023 का समन आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही Complaint Case No. 96681 of 2021, Nancy Verma बनाम Hirendra Kushwaha एवं अन्य, जो लखनऊ के Special Chief Judicial Magistrate (Custom) के समक्ष लंबित था, उसमें पति के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही भी समाप्त कर दी गई।
इस फैसले का बड़ा कानूनी संदेश
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि 498-A जैसी गंभीर आपराधिक धाराओं का उद्देश्य वास्तविक क्रूरता और दहेज उत्पीड़न से महिलाओं की रक्षा करना है, लेकिन आपराधिक मुकदमा शुरू करने के लिए आरोपों में कानून द्वारा निर्धारित आवश्यक तत्वों का प्रथम दृष्टया होना भी जरूरी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में हर झगड़ा, हर कटु टिप्पणी या हर असहमति अपने आप आपराधिक ‘क्रूरता’ नहीं बन जाती। अदालतों को शिकायत और प्रारंभिक सामग्री का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना होगा, ताकि वास्तविक अपराधों पर कार्रवाई भी हो और आपराधिक प्रक्रिया का अनावश्यक इस्तेमाल भी रोका जा सके।
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