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₹36 हजार के साइबर फ्रॉड में पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज! हाईकोर्ट ने कहा- ‘जितनी रकम संदिग्ध, उतनी ही रोक’, बाकी पैसा चलने दो

साइबर फ्रॉड की जांच के नाम पर आपका पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज हो जाए और कारोबार तक ठप पड़ जाए, तो क्या यह जायज है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सवाल पर बेहद अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जांच जरूरी है, लेकिन कार्रवाई इतनी व्यापक नहीं हो सकती कि संदिग्ध रकम के साथ-साथ खाताधारक का पूरा वैध पैसा भी अटक जाए।

Sonali15 अग. 2026, 01:10 PM IST
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₹36 हजार के साइबर फ्रॉड में पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज! हाईकोर्ट ने कहा- ‘जितनी रकम संदिग्ध, उतनी ही रोक’, बाकी पैसा चलने दो

लखनऊ:

 साइबर फ्रॉड की जांच के नाम पर अगर किसी बैंक खाते में सिर्फ एक तय रकम संदिग्ध बताई गई है, तो क्या उस व्यक्ति के पूरे खाते और कारोबार को ही रोक दिया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सवाल पर बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि जांच एजेंसियों की शक्ति असीमित नहीं है। यदि विवादित रकम स्पष्ट रूप से चिन्हित है, तो सामान्य तौर पर रोक भी उसी रकम तक सीमित रहनी चाहिए।  रितेश यादव के मामले में विवादित लेन-देन की रकम ₹36,000 थी, लेकिन उनके कई बैंक खातों के संचालन पर रोक लगा दी गई थी। हाईकोर्ट ने ₹36,000 पर लियन बनाए रखते हुए बाकी खाते को संचालित करने की अनुमति देने का निर्देश दिया। साथ ही बैंकों और वित्तीय संस्थानों को साइबर फ्रॉड के कारण फ्रीज खातों की शिकायतों के लिए गृह मंत्रालय की निर्धारित व्यवस्था को प्रभावी और सुलभ बनाने के निर्देश दिए।

कब हुआ फैसला और किसने सुनाया?

यह फैसला 6 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सुनाया। मामला Writ-C No. 6602 of 2026, Ritesh Yadav बनाम Reserve Bank of India एवं अन्य था। पीठ में न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अब्देश कुमार चौधरी शामिल थे। हालांकि, इस फैसले की रिपोर्टिंग 14 अगस्त 2026 को प्रमुख कानूनी और समाचार प्लेटफॉर्मों पर सामने आई। रिपोर्टों में भी यही बताया गया कि हाईकोर्ट ने ₹36,000 की विवादित रकम से आगे पूरे खाते को फ्रीज रखने को असंगत माना। 

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

याचिकाकर्ता रितेश यादव निर्माण संबंधी काम और निर्माण सामग्री की सप्लाई का कारोबार करते हैं। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने अलग-अलग बैंक खातों को डी-फ्रीज करने की मांग की थी। 3 मार्च 2026 को एक सामान्य कारोबारी लेन-देन के दौरान उन्हें पता चला कि उनके बैंक खाते पर ‘Lien Mark’ लगा हुआ है और उनका ट्रांजैक्शन फेल हो गया। बैंक से जानकारी लेने पर उन्हें बताया गया कि किसी संदिग्ध लेन-देन के कारण खाते पर रोक लगाई गई है। इसके बाद उन्होंने साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, हजरतगंज से भी संपर्क किया। बाद में रोक दूसरे बैंक खातों तक भी पहुंच गई। Bandhan Bank के अलावा ICICI Bank और Axis Bank में मौजूद खातों के संचालन पर भी असर पड़ा, जिससे याचिकाकर्ता के कारोबार पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

विवाद सिर्फ ₹36,000 का था

10 जून 2026 को याचिकाकर्ता को जानकारी मिली कि उनके Bandhan Bank खाते में ₹36,000 की विवादित रकम जमा हुई थी। यह कार्रवाई कर्नाटक के विजयपुरा स्थित Cyber, Economic and Narcotics Crime Police Station की ओर से 31 मई 2026 को भेजे गए ई-मेल निर्देश से जुड़ी थी। उन्हें ‘suspected customer’ मानते हुए खाते पर डेबिट फ्रीज लगाया गया था। रितेश यादव ने अधिकारियों को बताया कि अगर ₹36,000 विवादित रकम है तो उस रकम पर लियन रखा जा सकता है, लेकिन बाकी रकम को इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाए ताकि उनका कारोबार चलता रहे। इसके बावजूद पूरे खातों में मौजूद धनराशि पर रोक बनी रही।

हाईकोर्ट ने कहा- जांच एजेंसी की शक्ति ‘अनफेटर्ड’ नहीं

अदालत ने साइबर वित्तीय अपराधों की गंभीरता को स्वीकार किया। कोर्ट ने माना कि जांच एजेंसियों को अपराध की रकम को गायब होने से रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत हो सकती है। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक खाता फ्रीज करने की शक्ति ऐसी असीमित शक्ति नहीं हो सकती जिससे किसी व्यक्ति की पूरी वित्तीय जिंदगी और वैध कारोबारी गतिविधियां ठप हो जाएं। प्रमुख कानूनी रिपोर्टिंग में भी कोर्ट की इसी टिप्पणी को रेखांकित किया गया कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति की पूरी वित्तीय गतिविधि को उस रकम से कहीं आगे तक नहीं रोका जा सकता जो वास्तव में कथित अपराध से जुड़ी बताई गई है। 

₹36 हजार से ज्यादा का फ्रीज क्यों नहीं?

हाईकोर्ट ने कहा कि जब जांच एजेंसी ने खुद ₹36,000 को विवादित रकम के रूप में चिन्हित किया है, तो बाकी धनराशि को भी अपराध से जुड़ा मानने के लिए अलग सामग्री होनी चाहिए। अदालत ने खास तौर पर इस बात को महत्व दिया कि याचिकाकर्ता कारोबारी है। पूरे बैंक खाते फ्रीज होने से वह सप्लायरों को भुगतान नहीं कर सकता, वैध कारोबारी भुगतान प्राप्त नहीं कर सकता और सामान्य व्यावसायिक गतिविधियां जारी नहीं रख सकता। इसलिए कोर्ट ने कहा कि ₹36,000 पर लियन बनाए रखना जांच एजेंसी के हित को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त है, जबकि बाकी धनराशि पर रोक जारी रखना आनुपातिक नहीं होगा।

कोर्ट ने बैंक को दिया तुरंत डी-फ्रीज करने का आदेश

हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक को निर्देश दिया कि खाते को तुरंत डी-फ्रीज किया जाए और ₹36,000 पर लियन मार्क किया जाए। इसके बाद खाताधारक को बाकी खाते को कानून के अनुसार संचालित करने दिया जाए।

जनवरी 2026 के फैसले ने तैयार की थी कानूनी जमीन

इस मामले में हाईकोर्ट ने अपने पहले के महत्वपूर्ण फैसले Khalsa Medical Store बनाम RBI का भी सहारा लिया। 19 जनवरी 2026 के इस फैसले में बैंक खातों को साइबर अपराध के संदेह में फ्रीज करने के लिए कई महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए गए थे। उस फैसले में कहा गया था कि केवल संदेह के आधार पर पुलिस को बैंक खाते पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए; कार्रवाई के पीछे उचित आधार होना चाहिए। जांच अधिकारी द्वारा बैंक को अपराध से संबंधित जानकारी और FIR/शिकायत की प्रति उपलब्ध कराई जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यदि किसी खास रकम पर लियन चाहिए तो उसी रकम को चिन्हित किया जाना चाहिए। पूरे बैंक खाते को ब्लॉक या सस्पेंड करने का सामान्य निर्देश नहीं दिया जा सकता। इस पुराने फैसले में यह भी कहा गया था कि यदि बैंक खाते पर रोक लगाने की कार्रवाई की जा रही है तो संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी निर्धारित समय में इसकी सूचना दी जानी चाहिए। बाद के मामलों में भी इसी सिद्धांत को दोहराया गया है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Khalsa Medical Store के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि साइबर अपराध के मामलों में बैंक खाते को फ्रीज करने की प्रक्रिया में विवादित रकम, FIR और कार्रवाई के आधार को स्पष्ट करना जरूरी है। 

साइबर फ्रॉड में खाता फ्रीज होने पर शिकायत का रास्ता भी बताया

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में गृह मंत्रालय के NCRP-CFCFRMS से जुड़े Standard Operating Procedure में मौजूद Grievance Redressal Mechanism पर भी विस्तार से विचार किया। इसके तहत प्रभावित खाताधारक अपने बैंक की शाखा या निर्धारित कार्यालय में शिकायत कर सकता है। बैंक को आवश्यक Customer Due Diligence और Enhanced Due Diligence के बाद, परिस्थितियों के अनुसार शिकायत को संबंधित grievance mechanism में आगे बढ़ाना होता है। यदि जांच अधिकारी खाताधारक की सफाई से संतुष्ट होता है तो विवादित रकम को होल्ड रखते हुए खाते को रिलीज करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। यदि शिकायत खारिज होती है तो उसके बाद District Grievance Officer और State Grievance Officer के स्तर पर समीक्षा और अपील की व्यवस्था भी है।

बैंकों को वेबसाइट और शाखाओं पर जानकारी प्रदर्शित करनी होगी

हाईकोर्ट ने केवल इस मामले में राहत देकर मामला खत्म नहीं किया। अदालत ने अपने क्षेत्राधिकार में काम कर रहे सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को साइबर अपराध के कारण फ्रीज खातों से जुड़ी शिकायतों के लिए उचित नोडल व्यवस्था रखने का निर्देश दिया। साथ ही शाखाओं और संबंधित कार्यालयों में इस शिकायत व्यवस्था की जानकारी प्रमुखता से प्रदर्शित करने तथा वेबसाइट पर भी इसे आसानी से उपलब्ध कराने को कहा गया।

RBI को भी भेजा जाएगा आदेश

अदालत ने अपने आदेश की प्रति RBI को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे संबंधित बैंकों और वित्तीय संस्थानों तक पहुंचाया जा सके और उनके अधिकारियों व कर्मचारियों को इस grievance redressal mechanism के बारे में जानकारी दी जा सके।

हाईकोर्ट का बड़ा संदेश

कोर्ट ने साफ किया कि इन निर्देशों का उद्देश्य साइबर अपराध की जांच करने वाली एजेंसियों की वैधानिक शक्तियों को खत्म करना नहीं है। जांच एजेंसियां कानून के तहत कार्रवाई कर सकती हैं और अपराध की रकम को सुरक्षित रख सकती हैं। लेकिन कार्रवाई पारदर्शी, आनुपातिक और कानून के अनुरूप होनी चाहिए। किसी निर्दोष खाताधारक को केवल इसलिए अनिश्चितकाल तक उसके वैध पैसों से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके खाते से किसी निश्चित रकम का विवादित लेन-देन गुजरा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला साइबर फ्रॉड की जांच और आम खाताधारक के बैंकिंग अधिकारों के बीच संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अदालत ने एक तरफ जांच एजेंसियों की साइबर अपराध से लड़ने की शक्ति को स्वीकार किया, वहीं दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट किया कि किसी खास रकम के विवाद को आधार बनाकर व्यक्ति की पूरी आर्थिक जिंदगी को अनिश्चितकाल के लिए रोक देना उचित नहीं है। इस मामले में ₹36,000 की कथित विवादित रकम को सुरक्षित रखते हुए बाकी खाते को खोलने का आदेश दिया गया। साथ ही बैंकों को यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि जिन ग्राहकों के खाते साइबर अपराध के कारण फ्रीज होते हैं, उन्हें शिकायत और राहत पाने का स्पष्ट, सुलभ और समयबद्ध रास्ता उपलब्ध हो।