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2027 की जनगणना में क्या बदलेगा? 90 साल बाद होगी देशव्यापी जाति गणना
भारत में 16वीं जनगणना वर्ष 2027 में दो चरणों में आयोजित की जाएगी। अधिकांश देश के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 होगी, जबकि बर्फीले और दुर्गम क्षेत्रों में 1 अक्टूबर 2026 से प्रक्रिया शुरू होगी। करीब 30 लाख गणनाकर्मियों की तैनाती का अनुमान है। इस जनगणना की सबसे बड़ी खासियत 90 साल बाद देशभर में सभी जातियों की गणना का फैसला है। इसके आंकड़े सामाजिक नीतियों, सरकारी योजनाओं, चुनावी परिसीमन और SC/ST आरक्षित सीटों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भारत में 16वीं जनगणना वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। इस बार जनगणना कई मायनों में महत्वपूर्ण होने जा रही है। सरकार ने इसे दो चरणों में कराने का फैसला किया है और करीब 30 लाख गणनाकर्मियों की तैनाती का अनुमान है। इनमें बड़ी संख्या में स्कूल शिक्षकों के शामिल होने की संभावना है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि 1931 के बाद पहली बार देशभर में सभी व्यक्तियों की जाति की गणना की जाएगी। यानी इस बार केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि सभी जातियों से संबंधित जानकारी दर्ज की जाएगी।
दो चरणों में होगी जनगणना
2027 की जनगणना के लिए देश को व्यापक रूप से दो चरणों में कवर किया जाएगा। अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जनसंख्या की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 निर्धारित की गई है। वहीं बर्फीले और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए अलग संदर्भ तिथि रखी गई है। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले तथा दुर्गम इलाकों में जनगणना की संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 होगी। इन क्षेत्रों में मौसम की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए प्रक्रिया पहले पूरी की जाएगी।
पहले होगी घरों की गिनती
जनसंख्या की वास्तविक गणना से पहले घरों की सूची और आवास संबंधी जानकारी जुटाई जाएगी। इस चरण में मकानों की स्थिति, उपलब्ध सुविधाओं और आवास से संबंधित विभिन्न जानकारियां दर्ज की जाएंगी। इसके बाद दूसरे चरण में प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित जनसांख्यिकीय जानकारी एकत्र की जाएगी। इस प्रक्रिया का उद्देश्य देश की आबादी की संख्या के साथ-साथ उसकी सामाजिक और आर्थिक संरचना की व्यापक तस्वीर तैयार करना है।
करीब 30 लाख गणनाकर्मियों की तैनाती
इतने बड़े पैमाने पर जनगणना कराने के लिए लगभग 30 लाख गणनाकर्मियों की आवश्यकता होगी। इनमें मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारी और बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल किए जा सकते हैं। गणनाकर्मियों की जिम्मेदारी घर-घर जाकर निर्धारित प्रश्नों के आधार पर जानकारी दर्ज करने की होगी। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में जनगणना की प्रक्रिया को पूरा करना प्रशासन के लिए एक विशाल अभियान होता है।
90 साल बाद सभी जातियों की गणना
2027 की जनगणना का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू जाति गणना है। देश में आखिरी बार 1931 की जनगणना में व्यापक स्तर पर जातिगत आंकड़े एकत्र किए गए थे। आजादी के बाद नियमित जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित आंकड़े दर्ज किए जाते रहे, लेकिन अन्य जातियों की देशव्यापी गणना नहीं की गई। अब 2027 की जनगणना में सभी व्यक्तियों की जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने का फैसला किया गया है। इससे देश में विभिन्न सामाजिक समूहों की आबादी और उनकी सामाजिक संरचना से संबंधित अधिक विस्तृत आंकड़े उपलब्ध हो सकते हैं।
जाति के आंकड़ों का क्या होगा असर?
जातिगत आंकड़ों का इस्तेमाल सामाजिक और आर्थिक नीतियों को बेहतर तरीके से तैयार करने में किया जा सकता है। सरकार को विभिन्न सामाजिक समूहों की आबादी, उनकी स्थिति और विकास से जुड़े मुद्दों को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, जाति गणना का राजनीतिक महत्व भी काफी बड़ा है। अलग-अलग सामाजिक समूह लंबे समय से अपनी आबादी के अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं में हिस्सेदारी की मांग करते रहे हैं। ऐसे में नए जातिगत आंकड़े भविष्य की नीतियों और राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकते हैं।
जनगणना और परिसीमन का संबंध
जनगणना केवल आबादी का आंकड़ा जुटाने की प्रक्रिया नहीं है। इसके आंकड़े देश की चुनावी व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए जनसंख्या संबंधी आंकड़े महत्वपूर्ण आधार होते हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के निर्धारण में भी जनसंख्या के आंकड़ों की भूमिका होती है। इसी कारण 2027 की जनगणना के आंकड़े आने वाले वर्षों में चुनावी प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भूगोल पर भी असर डाल सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है 2027 का Census?
भारत की आबादी, शहरीकरण, प्रवासन, परिवारों की संरचना और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में पिछले कुछ दशकों में बड़े बदलाव आए हैं। ऐसे समय में नई जनगणना देश की वर्तमान सामाजिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर सामने रखने का महत्वपूर्ण माध्यम होगी। विशेष रूप से जाति संबंधी आंकड़ों को शामिल किए जाने से 2027 की जनगणना का महत्व और बढ़ गया है। इन आंकड़ों का इस्तेमाल सरकार की योजनाओं, सामाजिक कल्याण नीतियों, संसाधनों के वितरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी बहस में किया जा सकता है। कुल मिलाकर, 2027 की जनगणना भारत के लिए केवल आबादी की गणना नहीं होगी। यह देश की बदलती सामाजिक संरचना का एक विस्तृत दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया होगी, जिसके प्रभाव प्रशासन, कल्याणकारी योजनाओं, चुनावी परिसीमन और सामाजिक-राजनीतिक विमर्श तक दिखाई दे सकते हैं।
