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NEET में 233वीं रैंक से लेकर मेडिकल दाखिले की कानूनी लड़ाई तक, दिव्यांगता को मात देकर डॉक्टर बने गणेश बरैया

डॉ. गणेश बरैया ने KBC 18 में दिव्यांगता से डॉक्टर बनने तक का प्रेरणादायक सफर साझा किया। 72 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने NEET में ऑल इंडिया रैंक 233 हासिल की और MBBS में प्रवेश के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। परिवार के समर्थन और दृढ़ संकल्प से उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। KBC में उन्होंने बचपन में सर्कस की 5 लाख रुपये की पेशकश ठुकराने वाले अपने पिता की कहानी भी साझा की।

Vindhya Dubey15 अग. 2026, 01:10 PM IST
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NEET में 233वीं रैंक से लेकर मेडिकल दाखिले की कानूनी लड़ाई तक, दिव्यांगता को मात देकर डॉक्टर बने गणेश बरैया

कौन बनेगा करोड़पति 18 के हालिया एपिसोड में गुजरात के भावनगर जिले के गोरखी गांव से आए डॉ. गणेश बरैया ने अपनी जिंदगी की ऐसी कहानी सुनाई, जिसने शो के होस्ट अमिताभ बच्चन के साथ-साथ दर्शकों को भी भावुक कर दिया। करीब 3 फीट लंबे डॉ. गणेश को शारीरिक चुनौतियों के कारण बचपन से कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई और डॉक्टर बनने के सपने को कभी नहीं छोड़ा। आज वह चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उनकी कहानी दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल बन गई है।

बचपन से ही चुनौतियों से सामना

डॉ. गणेश बरैया का जन्म गुजरात के भावनगर जिले के गोरखी गांव में हुआ। वह लगभग 3 फीट 4 इंच लंबे हैं और उन्हें 72 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता है। बचपन में उनकी शारीरिक बनावट के कारण उन्हें कई तरह की सामाजिक और व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद परिवार ने उनकी पढ़ाई को कभी रुकने नहीं दिया। गणेश ने KBC में बताया कि उनका स्कूल घर से करीब 5 किलोमीटर दूर था। उनकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए उनके पिता उन्हें अपनी पीठ पर बैठाकर स्कूल ले जाते थे। स्कूल की सामान्य बेंच और अन्य सुविधाएं भी उनकी जरूरतों के मुताबिक नहीं थीं, लेकिन इन परेशानियों ने उनके हौसले को कमजोर नहीं किया।


KBC में डॉ. गणेश ने अपने बचपन की एक बेहद भावुक घटना साझा की। उन्होंने बताया कि जब वह प्राथमिक स्कूल में पढ़ते थे, तब एक सर्कस से जुड़े लोग उनके घर पहुंचे थे। उन्होंने गणेश के किसान पिता को उन्हें अपने साथ ले जाने के बदले 5 लाख रुपये देने की पेशकश की थी। हालांकि उनके पिता ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने बेटे को पैसे कमाने का जरिया बनाने के बजाय उसकी शिक्षा और भविष्य को प्राथमिकता दी। गणेश ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि उनके पिता ने पैसे के बजाय शिक्षा को चुना। यही फैसला आगे चलकर गणेश की जिंदगी में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। परिवार के समर्थन ने उन्हें यह विश्वास दिया कि उनकी शारीरिक स्थिति उनके सपनों की सीमा तय नहीं कर सकती।

12वीं में 87 प्रतिशत, NEET में हासिल की शानदार रैंक

गणेश ने पढ़ाई में भी अपनी क्षमता साबित की। उन्होंने कक्षा 12वीं में 87 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में ऑल इंडिया रैंक 233 हासिल की। लेकिन मेडिकल कॉलेज में दाखिले की राह आसान नहीं थी। उनकी दिव्यांगता को आधार बनाकर उन्हें MBBS में प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपने स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. दलपत कटारिया के सहयोग से कानूनी लड़ाई शुरू की।

MBBS में दाखिले के लिए अदालत तक पहुंचे

डॉ. गणेश के लिए डॉक्टर बनने का सपना केवल मेडिकल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं था। प्रवेश से इनकार किए जाने के बाद मामला पहले गुजरात हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कानूनी संघर्ष के बाद उनके लिए मेडिकल शिक्षा का रास्ता खुला और उन्होंने भावनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS की पढ़ाई की। उनकी कहानी दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समान अवसर और शिक्षा के अधिकार की बहस में भी महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।

डॉक्टर बनकर बदली लोगों की सोच

जिस व्यक्ति को कभी यह कहा गया था कि उसके लिए पढ़ाई करना या डॉक्टर बनना संभव नहीं होगा, उसी गणेश ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर अपने आलोचकों को जवाब दिया। वह अब भावनगर में चिकित्सा सेवा से जुड़े हैं और बच्चों के साथ काम करने का अनुभव भी रखते हैं। उनकी कहानी केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि परिवार का सहयोग, शिक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति किसी व्यक्ति की जिंदगी की दिशा बदल सकते हैं।

KBC में हॉट सीट तक पहुंचे

KBC 18 में डॉ. गणेश ने Fastest Finger First राउंड जीतकर हॉट सीट पर जगह बनाई। उन्होंने शुरुआती सवालों का आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया और खेल में आगे बढ़ते गए। हालांकि, आगे बढ़ने के साथ उनकी लाइफलाइन खत्म होती गई। उनकी KBC यात्रा 3 लाख रुपये के सवाल पर समाप्त हुई। उन्हें लाल किला, ताजमहल, चारमीनार और मीनाक्षी मंदिर की तस्वीरें दिखाई गईं और पूछा गया कि इनमें से कितने स्मारक गुजरात के उत्तर में स्थित हैं। उन्होंने तीन का विकल्प चुना, जबकि सही उत्तर दो था-दिल्ली का लाल किला और आगरा का ताजमहल। इसके बाद वह 25 हजार रुपये लेकर शो से बाहर हुए।


हालांकि KBC में डॉ. गणेश की आर्थिक जीत 25 हजार रुपये पर रुक गई, लेकिन उनकी असली उपलब्धि इससे कहीं बड़ी रही। उन्होंने मंच पर अपनी जिंदगी की वह कहानी साझा की जिसमें एक तरफ गरीबी और शारीरिक चुनौतियां थीं, तो दूसरी तरफ परिवार का विश्वास और शिक्षा के प्रति दृढ़ संकल्प। सर्कस की 5 लाख रुपये की पेशकश को ठुकराने वाले पिता से लेकर मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए अदालत तक पहुंचने और फिर डॉक्टर बनने तक का गणेश का सफर बताता है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी शारीरिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके साहस और उपलब्धियों से तय होती है। KBC 18 में उनकी मौजूदगी ने उनकी कहानी को देशभर के दर्शकों तक पहुंचाया और एक बार फिर यह संदेश दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सही अवसर, परिवार का साथ और दृढ़ इच्छाशक्ति सपनों को हकीकत में बदल सकती है।