तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जे. सी. डी. प्रभाकर के कथित गर्भपात विरोधी रुख को लेकर Doctors’ Association for Social Equality ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन ने कहा कि गर्भपात का विरोध करने वाली ऐसी टिप्पणियां महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और उनके कानूनी अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं। विवाद उस समय सामने आया जब विधानसभा अध्यक्ष ने चेन्नई के एक कॉलेज में आयोजित ‘March for Life’ नामक प्रो-लाइफ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम गर्भपात के विरोध में आयोजित किया गया था। डॉक्टरों के संगठन ने उनके इस कार्यक्रम में शामिल होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि गर्भपात जैसे संवेदनशील चिकित्सा विषय को केवल एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
डॉक्टरों के संगठन ने क्या कहा?
संगठन के महासचिव ने कहा कि भारत में कानून के तहत महिलाओं को निर्धारित परिस्थितियों में गर्भपात कराने का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने 1971 में बने कानून और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा महिलाओं के अधिकारों को मान्यता दिए जाने का भी उल्लेख किया। संगठन का कहना है कि गर्भपात कई अलग-अलग चिकित्सकीय और व्यक्तिगत परिस्थितियों में आवश्यक हो सकता है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया का एकतरफा विरोध महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके निर्णय लेने के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
भ्रूण में असामान्यता और महिला की सेहत का मामला
डॉक्टरों के मुताबिक, कुछ मामलों में गर्भ में पल रहे भ्रूण में गंभीर शारीरिक असामान्यता का पता चल सकता है। वहीं कुछ परिस्थितियों में गर्भ जारी रखना महिला के स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ऐसे मामलों को ध्यान में रखते हुए संगठन ने कहा कि गर्भपात के खिलाफ व्यापक या बिना किसी अपवाद के विरोध उचित नहीं है। चिकित्सा संबंधी फैसले प्रत्येक महिला की व्यक्तिगत स्थिति और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के आधार पर लिए जाने चाहिए।
अवैध प्रक्रियाओं का खतरा
डॉक्टरों के संगठन ने यह भी चेतावनी दी कि यदि महिलाओं के लिए कानूनी रूप से उपलब्ध गर्भपात सेवाओं तक पहुंच सीमित करने की कोशिश की जाती है, तो कुछ महिलाएं असुरक्षित या अवैध प्रक्रियाओं का सहारा ले सकती हैं। इससे उनके स्वास्थ्य और जीवन को गंभीर खतरा हो सकता है।
प्रजनन अधिकारों पर फिर बहस
स्पीकर के प्रो-लाइफ कार्यक्रम में शामिल होने के बाद शुरू हुआ विवाद गर्भपात और महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है। डॉक्टरों के संगठन ने दोहराया कि कानून के तहत अनुमत गर्भपात सेवाओं तक महिलाओं की सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। संगठन का तर्क है कि गर्भपात से जुड़े फैसले भावनात्मक या राजनीतिक नजरिए के बजाय महिला की स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सकीय परिस्थितियों और लागू कानूनों को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।