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आजादी की लड़ाई के ‘कानूनी योद्धाओं’ से युवा वकीलों तक… CJI सूर्यकांत का बड़ा संदेश, बोले- संविधान का वादा जिंदा रखना हमारी जिम्मेदारी
आजादी की लड़ाई सिर्फ मैदानों में नहीं, अदालतों और कानून की किताबों के बीच भी लड़ी गई थी। इसी ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाते हुए स्वतंत्रता दिवस पर CJI सूर्यकांत ने वकीलों को बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गांधी, आंबेडकर, पटेल और नेहरू जैसे अनेक कानूनविदों ने देश की आजादी और संवैधानिक भविष्य की नींव मजबूत की। आज लड़ाई बदल गई है—अब कानूनी बिरादरी की जिम्मेदारी है कि संविधान के अधिकारों का वादा हर नागरिक तक पहुंचे और जिनकी आवाज कमजोर है, उनकी आवाज अदालतों में बुलंद हो। युवा वकीलों से CJI ने साफ कहा—अब यह विरासत आपके कंधों पर है।

नई दिल्ली।
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कानूनी बिरादरी की ऐतिहासिक भूमिका और संवैधानिक जिम्मेदारी को रेखांकित किया। 15 अगस्त 2026 को अपने संबोधन में CJI ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और कानून के बीच गहरा और स्थायी संबंध रहा है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर समेत देश के कई प्रमुख नेता और राष्ट्रनिर्माता कानून के पेशे से जुड़े थे। इसलिए वकील स्वतंत्रता आंदोलन के केवल दर्शक नहीं थे, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा थे। CJI का संदेश सिर्फ इतिहास को याद करने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवा वकीलों से कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से कानूनी बिरादरी ने जिस जिम्मेदारी को निभाया है, वह अब नई पीढ़ी के कंधों पर आने वाली है। न्याय संस्थानों को सुरक्षित रखना, संविधान के वादे को जीवित रखना और उन लोगों की आवाज अदालत तक पहुंचाना, जो खुद न्याय पाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रखते, कानूनी पेशे की बड़ी जिम्मेदारी है।
स्वतंत्रता आंदोलन में कानून और वकीलों की अहम भूमिका
CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था। औपनिवेशिक शासन की वैधता को राजनीतिक आंदोलनों, याचिकाओं, सार्वजनिक बहस और कानून की भाषा के जरिए भी चुनौती दी गई। उनके मुताबिक वकीलों का प्रशिक्षण उन्हें यह सवाल पूछने की क्षमता देता था कि किसी नियम का अस्तित्व मात्र पर्याप्त है या सत्ता का इस्तेमाल वास्तव में उन सिद्धांतों के अनुरूप भी है, जिनके आधार पर उसे वैध माना जाता है। उन्होंने महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ सरदार वल्लभभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सी. राजगोपालाचारी, चित्तरंजन दास, भूलाभाई देसाई, एम.जी. रानाडे और दुर्गाबाई देशमुख जैसे कानून से जुड़े नेताओं का भी उल्लेख किया।
आजादी के बाद खत्म नहीं हुई वकीलों की जिम्मेदारी
CJI सूर्यकांत ने कहा कि स्वतंत्रता हासिल होने के बाद कानूनी पेशे की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया। आज चुनौती औपनिवेशिक सत्ता का विरोध करने की नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के संवैधानिक vision को वास्तविक जीवन में लागू कराने की है। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और राज्य के अंगों को कानून के अधीन बनाए रखने में Bar की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने इस जिम्मेदारी को संविधान के उस वादे से जोड़ा, जिसके तहत हर व्यक्ति को न्याय और अधिकारों की सुरक्षा मिलनी चाहिए।
जिनके पास आवाज नहीं, उनकी आवाज बने Bar
CJI ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि कानूनी पेशे की जिम्मेदारी सिर्फ अदालत में सक्षम पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने तक सीमित नहीं है। कई लोग ऐसे होते हैं जिनके पास अपनी शिकायत अदालत तक ले जाने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन, जानकारी या सामाजिक प्रभाव नहीं होता। ऐसे लोगों की grievances को न्यायालय तक पहुंचाना कानूनी बिरादरी की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। यही विचार CJI के हालिया legal-aid initiatives और संबोधनों में भी दिखाई देता है। 8 अगस्त 2026 को NALSA के West Zone Regional Conference में CJI सूर्यकांत ने justice delivery को ज्यादा inclusive बनाने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि न्याय व्यवस्था को केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए जो खुद उसके दरवाजे तक पहुंच सकते हैं, बल्कि व्यवस्था को कमजोर और वंचित नागरिकों तक पहुंचना चाहिए।
Article 21 की व्यापक व्याख्या का भी किया जिक्र
CJI ने संविधान के Article 21 की विकसित होती न्यायिक व्याख्या का उदाहरण देते हुए कहा कि समय के साथ अदालतों ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा काफी व्यापक किया है। इसके अंतर्गत व्यक्ति की गरिमा, स्वच्छ पर्यावरण, मानवीय परिस्थितियों और मुफ्त कानूनी सहायता जैसे अधिकारों को भी संवैधानिक संरक्षण से जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारों के इस विकास में वकीलों की दलीलों और अदालतों के समक्ष उठाए गए सवालों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
युवा वकीलों को लेकर CJI का संदेश क्यों खास है?
15 अगस्त के भाषण में CJI ने युवा कानून स्नातकों और युवा वकीलों पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि कानूनी पेशे में शुरुआती वर्षों में अपनी जगह बनाना आसान नहीं है। यह बात 2026 में सुप्रीम कोर्ट की अन्य पहलों से भी जुड़ती है। जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने युवा वकीलों की शुरुआती आर्थिक कठिनाइयों को गंभीर मुद्दा मानते हुए Young Lawyers’ Professional Assistance Fund बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था। प्रस्ताव का उद्देश्य शुरुआती वर्षों में संघर्ष कर रहे युवा अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना था। इससे साफ है कि युवा वकीलों को CJI का संदेश केवल Independence Day speech तक सीमित नहीं है। युवा Bar को मजबूत करना, उन्हें profession में टिके रहने का अवसर देना और न्याय व्यवस्था में नई पीढ़ी की भागीदारी सुनिश्चित करना भी व्यापक institutional concern का हिस्सा है।
Social Media की लोकप्रियता नहीं, Courtroom credibility जरूरी: CJI
जुलाई 2026 में नए Advocates-on-Record को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने युवा वकीलों को social-media popularity और professional credibility को एक जैसा न मानने की सलाह दी थी। उन्होंने युवा वकीलों को legal craft, मेहनत और courtroom credibility विकसित करने पर ध्यान देने को कहा था। यह संदेश 15 अगस्त के संबोधन से भी जुड़ता है। स्वतंत्रता आंदोलन की कानूनी विरासत को आगे बढ़ाने का मतलब केवल पेशे में प्रवेश करना नहीं, बल्कि न्याय, संविधान और नागरिक अधिकारों के प्रति पेशेवर प्रतिबद्धता बनाए रखना भी है।
AI के दौर में भी मानव संवेदना जरूरी
CJI के हालिया संबोधन में तकनीक और AI को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है। नए AoRs को संबोधित करते हुए उन्होंने AI को research में उपयोगी माना, लेकिन legal profession में मानवीय समझ और client की परिस्थितियों को समझने की क्षमता के महत्व पर जोर दिया। यह पहलू भी 15 अगस्त के भाषण के constitutional promise वाले विचार से जुड़ता है। न्याय केवल कानून की तकनीकी व्याख्या नहीं है; इसके केंद्र में व्यक्ति, उसकी गरिमा और उसके अधिकार भी हैं।
Legal Aid और Justice Delivery पर लगातार जोर
CJI सूर्यकांत के हालिया कार्यक्रमों को देखें तो उनका जोर तीन प्रमुख बातों पर दिखाई देता है—न्याय तक पहुंच, युवा वकीलों का सशक्तिकरण और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा।
NALSA के आधिकारिक ढांचे में भी free legal services को समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचाना प्रमुख उद्देश्य है और CJI सूर्यकांत NALSA के Patron-in-Chief हैं।
8 अगस्त के NALSA सम्मेलन में dialogue, dignity और inclusion को justice delivery के केंद्र में रखने की बात सामने आई थी। इसका सीधा संबंध 15 अगस्त के उस संदेश से है जिसमें CJI ने कहा कि कानूनी बिरादरी को उन लोगों की शिकायतें अदालतों तक पहुंचानी हैं जिनके पास खुद अपनी आवाज उठाने के पर्याप्त साधन नहीं हैं।
युवा वकीलों के लिए CJI का सीधा संदेश
CJI ने युवा कानून स्नातकों और युवा वकीलों से कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से Bar ने जो जिम्मेदारी उठाई है, वह जल्द ही उनके कंधों पर होगी। उन्होंने न्याय की उन संस्थाओं की रक्षा करने और उन्हें आगे बढ़ाने का आह्वान किया जिन्हें पिछली पीढ़ियों ने बनाया और मजबूत किया है। साथ ही उन्होंने युवा वकीलों को आश्वस्त किया कि Bar और Bench उनके professional growth के लिए mentorship, meaningful opportunities और institutional support देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है CJI का यह संदेश?
CJI सूर्यकांत का Independence Day address मूल रूप से तीन पीढ़ियों को जोड़ता है—स्वतंत्रता आंदोलन में कानून के जरिए संघर्ष करने वाली पीढ़ी, संविधान को लागू करने वाली वर्तमान legal fraternity और आने वाले समय की युवा Bar। आजादी के दौर में वकीलों ने कानून की भाषा के जरिए औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी थी। आज वही कानूनी पेशा संविधान के जरिए नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और न्याय को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा है।इसलिए CJI का संदेश केवल युवा वकीलों को career advice नहीं है। यह पूरी legal fraternity के लिए एक constitutional reminder है कि स्वतंत्रता की विरासत तभी सार्थक होगी जब न्याय, गरिमा, समानता और अधिकारों का वादा हर नागरिक तक पहुंचे।
