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विभाजन के दर्द से जूझता पंजाब, अब टिकाऊ भविष्य के लिए नई क्रांति की जरूरत

1947 के विभाजन की विरासत आज भी पंजाब की सामाजिक और आर्थिक चेतना में दिखाई देती है। कृषि संकट, जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव, युवाओं का पलायन और बदलती अर्थव्यवस्था जैसी चुनौतियां राज्य के सामने नई परीक्षा बनकर खड़ी हैं। ऐसे में पंजाब को अपने संघर्ष और बदलाव की ऐतिहासिक भावना को आधुनिक, टिकाऊ विकास की दिशा में बदलने की जरूरत है।

Vindhya Dubey15 अग. 2026, 05:48 PM IST
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विभाजन के दर्द से जूझता पंजाब, अब टिकाऊ भविष्य के लिए नई क्रांति की जरूरत

पंजाब के लिए 15 अगस्त सिर्फ आजादी का दिन नहीं, बल्कि विभाजन की उस त्रासदी की याद भी है जिसने लाखों लोगों को अपने घर, जमीन और पुरानी जिंदगी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। 1947 में पंजाब का विभाजन हुआ तो एक तरफ देश आजाद हुआ, वहीं दूसरी ओर परिवारों का विस्थापन, हिंसा और बिछड़ने का दर्द लोगों की पीढ़ियों तक पहुंचा। विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों ने जिस संघर्ष और जज्बे के साथ अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी की, वही पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। पश्चिमी पंजाब की नहर कॉलोनियों में खेती करने वाले अनेक परिवार भारत आने के बाद शरणार्थी शिविरों में रहे और फिर जमीन, कारोबार तथा खेती के जरिए नई शुरुआत की। पंजाब में पुनर्वास की इस प्रक्रिया में प्रशासन ने भी बड़ी भूमिका निभाई।

प्रतिरोध की पुरानी परंपरा

पंजाब की पहचान केवल विभाजन के दर्द से नहीं, बल्कि किसान आंदोलनों और प्रतिरोध की लंबी परंपरा से भी जुड़ी रही है। शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने 1907 में लाला लाजपत राय के साथ ब्रिटिश कृषि कानूनों के खिलाफ ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन का नेतृत्व किया था। यह आंदोलन किसानों के अधिकारों और बढ़ते पानी के शुल्क समेत औपनिवेशिक कृषि नीतियों के विरोध का प्रतीक बना। दशकों बाद 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान भी ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ का नारा दोबारा सुनाई दिया। लेकिन आज पंजाब के सामने चुनौती का स्वरूप बदल चुका है। अब संघर्ष किसी औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि उन नीतियों और व्यवस्थाओं से है जो राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही हैं।

पानी का संकट सबसे बड़ी चुनौती

पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था लंबे समय से धान जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों पर निर्भर रही है। इससे राज्य के भूजल स्तर पर लगातार दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि खेती के मौजूदा तौर-तरीकों में बदलाव नहीं किया गया तो पंजाब को गंभीर पर्यावरणीय और कृषि संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद राजनीतिक कारणों से मुफ्त पानी और मौजूदा कृषि व्यवस्था से जुड़े फैसलों को बदलना आसान नहीं रहा है। इस स्थिति में किसानों की आय सुरक्षित रखते हुए फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना बड़ी चुनौती बन गया है।

सड़कों के आंदोलन से खेतों के बदलाव तक

पंजाब के लिए अगली बड़ी क्रांति का मतलब केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि खेती के मॉडल में बदलाव हो सकता है। पानी की कम खपत वाली फसलों को बढ़ावा देना, किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना, माइक्रो-इरिगेशन में निवेश, खाद्य प्रसंस्करण को मजबूत करना और कृषि नीतियों को पर्यावरणीय जरूरतों से जोड़ना इसके महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं। पंजाब ने विभाजन के बाद उजड़ी हुई जिंदगी को दोबारा खड़ा करने का साहस दिखाया था। किसान आंदोलनों ने भी समय-समय पर राज्य की प्रतिरोध की भावना को सामने रखा। अब इसी भावना को जल संरक्षण, टिकाऊ खेती और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा की दिशा में मोड़ने की जरूरत है। आज पंजाब के सामने सवाल यह नहीं है कि वह किसके खिलाफ संघर्ष करे, बल्कि यह है कि वह अपने प्राकृतिक संसाधनों और कृषि व्यवस्था को कैसे बचाए। राज्य की अगली क्रांति सड़कों से ज्यादा खेतों में बदलाव लाने वाली हो सकती है।