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AI की नई जंग में आमने-सामने अमेरिका और चीन, दुनिया के सामने बढ़ी मुश्किल

अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की प्रतिस्पर्धा अब टेक्नोलॉजी से आगे बढ़कर वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक शक्ति का मुद्दा बनती जा रही है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों को AI, एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण सप्लाई चेन के लिए अपने तकनीकी नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि चीन अपने अलग AI इकोसिस्टम को मजबूत कर रहा है। इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा का असर सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, AI चिप और वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

Neha Sharma19 अग. 2026, 10:01 AM IST
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AI की नई जंग में आमने-सामने अमेरिका और चीन, दुनिया के सामने बढ़ी मुश्किल

वॉशिंगटन: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर अमेरिका और चीन के बीच चल रही तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब वैश्विक कूटनीतिक लड़ाई का रूप लेती जा रही है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों को अपने नेतृत्व वाले AI और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के साथ मजबूती से जोड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि चीन समानांतर वैश्विक AI नेटवर्क और तकनीकी साझेदारियां विकसित कर रहा है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका अपने ‘Pax Silica’ पहल से जुड़े देशों को चीन के प्रतिस्पर्धी AI ढांचे में शामिल होने को लेकर चेतावनी देने की तैयारी में है।


अमेरिका क्यों चाहता है कि देश पक्ष चुनें?

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी विदेश विभाग के एक मसौदा पत्र में ‘Pax Silica’ से जुड़े देशों को संकेत दिया गया है कि अगर वे चीन के प्रतिद्वंद्वी AI फ्रेमवर्क में शामिल होते हैं, तो उन्हें अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन से बाहर किया जा सकता है। इस पहल का उद्देश्य AI मॉडल, एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसी रणनीतिक सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है। अमेरिकी नीति के पीछे मुख्य चिंता यह है कि AI अब केवल टेक्नोलॉजी या कारोबारी क्षेत्र का विषय नहीं रह गया है। इसका इस्तेमाल रक्षा, साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी, औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में भी तेजी से बढ़ रहा है। इसलिए वॉशिंगटन चीन की तकनीकी क्षमता और उसके वैश्विक प्रभाव को सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहा है।


क्या है Pax Silica?

Pax Silica अमेरिका की अगुवाई वाली एक पहल है, जिसका उद्देश्य AI और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए जरूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना और सहयोगी देशों के बीच तकनीकी साझेदारी बढ़ाना है। Reuters के अनुसार इस पहल से करीब दो दर्जन देश जुड़े हैं। इनमें जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे महत्वपूर्ण अमेरिकी सहयोगी भी शामिल हैं। कजाखस्तान फिलहाल ऐसा देश बताया गया है जो दोनों प्रतिस्पर्धी ढांचों में भागीदारी रखता है।


अमेरिका को चीन से क्या चुनौती है?

चीन ने AI क्षेत्र में तेजी से अपनी क्षमता बढ़ाई है। खास तौर पर कम लागत वाले और ओपन-वेट AI मॉडल ने अमेरिकी कंपनियों के लिए नई प्रतिस्पर्धा पैदा की है। Reuters के अनुसार चीन की कंपनियों जैसे Moonshot और Z.ai के मॉडल की लोकप्रियता बढ़ने के बाद अमेरिकी कंपनियां भी ज्यादा किफायती और अनुकूलन योग्य AI मॉडल विकसित करने पर जोर दे रही हैं। अमेरिकी कंपनियों Meta और Nvidia समेत कई कंपनियां ओपन मॉडल और AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश बढ़ा रही हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हर AI उपयोग के लिए अत्यंत महंगे frontier models की जरूरत नहीं होती और कंपनियां कम लागत वाले विकल्पों की तलाश कर रही हैं।


चीन भी बना रहा है अपना AI इकोसिस्टम

चीन की रणनीति केवल AI मॉडल बनाने तक सीमित नहीं है। वह AI चिप, डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और घरेलू तकनीकी सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। Reuters के अनुसार चीनी AI कंपनी DeepSeek अपनी AI चिप विकसित करने पर भी काम कर रही है। अगर यह प्रयास सफल होता है तो चीन के लिए अमेरिकी चिप तकनीक पर निर्भरता कम करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके अलावा चीन वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ AI सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। जुलाई 2026 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने BRICS, ASEAN, लैटिन अमेरिका और अफ्रीकी देशों के साथ AI प्रशिक्षण और सहयोग केंद्र विकसित करने की योजना की बात कही थी।


AI की लड़ाई में सेमीकंडक्टर क्यों महत्वपूर्ण हैं?

AI की पूरी अर्थव्यवस्था के केंद्र में एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और AI चिप हैं। बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए अत्यधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। इसलिए जिस देश या गठबंधन के पास अत्याधुनिक चिप, चिप निर्माण उपकरण और पर्याप्त डेटा सेंटर क्षमता होगी, उसे AI प्रतिस्पर्धा में रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। इसी वजह से अमेरिका लंबे समय से चीन की एडवांस्ड AI चिप और चिप निर्माण तकनीक तक पहुंच को सीमित करने की कोशिश करता रहा है। अब यह तकनीकी नीति वैश्विक गठबंधनों और सप्लाई चेन राजनीति से भी जुड़ रही है।


क्या चीन और अमेरिका के बीच बातचीत भी चल रही है?

दिलचस्प बात यह है कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। Reuters ने जुलाई में रिपोर्ट किया था कि अमेरिका और चीन सितंबर 2026 में AI से जुड़े मुद्दों पर बातचीत कर सकते हैं। बातचीत का संभावित एजेंडा frontier AI की बढ़ती क्षमताओं और उससे जुड़े जोखिमों को कम करना बताया गया था। इसका मतलब है कि एक तरफ दोनों देश AI क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे AI से जुड़े जोखिमों और नियमों पर बातचीत की संभावना भी बनाए हुए हैं।


दुनिया के दूसरे देशों के सामने क्या चुनौती है?

अमेरिका और चीन की इस प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ सकता है जो दोनों पक्षों के साथ तकनीकी और आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहते हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे अमेरिकी सहयोगियों के लिए अमेरिका के साथ सुरक्षा और तकनीकी संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन चीन उनके लिए बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। ऐसे में दोनों तकनीकी इकोसिस्टम के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। AI, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाने के साथ भारत को वैश्विक तकनीकी साझेदारियों में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।


राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ता AI

AI की प्रतिस्पर्धा अब केवल यह तय करने की लड़ाई नहीं है कि कौन बेहतर चैटबॉट बनाएगा। AI का इस्तेमाल सैन्य प्रणालियों, साइबर सुरक्षा, निगरानी, स्वायत्त वाहनों और रणनीतिक निर्णय लेने में भी बढ़ रहा है। Reuters ने जुलाई में रिपोर्ट किया था कि चीनी सैन्य शोधकर्ताओं द्वारा अमेरिकी AI मॉडलों का इस्तेमाल रक्षा प्रणालियों के प्रशिक्षण में किए जाने के संकेत मिले हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि AI तकनीक की पहुंच और नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुका है।


अमेरिका-चीन AI रेस का अगला चरण

अमेरिका और चीन की AI प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में और तेज होने की संभावना है। मुकाबला अब AI मॉडल की गुणवत्ता से आगे बढ़कर चिप निर्माण, डेटा सेंटर, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, ओपन-सोर्स तकनीक और वैश्विक तकनीकी गठबंधनों तक पहुंच गया है। अमेरिका अपने सहयोगियों को एक साझा तकनीकी नेटवर्क में मजबूत करना चाहता है, जबकि चीन अपने नेतृत्व में अलग वैश्विक AI सहयोग व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में दुनिया धीरे-धीरे दो अलग-अलग तकनीकी इकोसिस्टम की ओर बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, अमेरिका द्वारा सहयोगी देशों से AI के मामले में स्पष्ट रणनीतिक प्रतिबद्धता की मांग इस बात का संकेत है कि AI अब वैश्विक शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आने वाले समय में यह प्रतिस्पर्धा केवल अमेरिका और चीन के बीच नहीं रहेगी, बल्कि दुनिया के कई देशों की तकनीकी, आर्थिक और विदेश नीति को भी प्रभावित कर सकती है।