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चीन के सामने भारत की बड़ी तैयारी, ₹70 हजार करोड़ में आएंगी 6 नई पनडुब्बियां

भारत की महत्वाकांक्षी Project-75(I) पनडुब्बी परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। करीब ₹70,000 करोड़ की इस परियोजना के तहत भारतीय नौसेना के लिए 6 अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना है। जर्मनी की Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) और भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) इस परियोजना में प्रमुख साझेदार हैं। प्रस्तावित पनडुब्बियों में Air Independent Propulsion (AIP) तकनीक होगी, जिससे वे लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकेंगी। परियोजना को अंतिम सरकारी मंजूरी मिलने के बाद भारत की समुद्री सुरक्षा और Make in India रक्षा उत्पादन क्षमता को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

Neha Sharma19 अग. 2026, 10:01 AM IST
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चीन के सामने भारत की बड़ी तैयारी, ₹70 हजार करोड़ में आएंगी 6 नई पनडुब्बियां

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने वाली महत्वाकांक्षी Project-75(I) पनडुब्बी परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है। इस परियोजना के तहत भारत में छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने की योजना है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब ₹70,000 करोड़ है और इसमें जर्मनी की Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) तथा भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) की महत्वपूर्ण भूमिका है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, परियोजना से जुड़े प्रस्ताव पर जल्द उच्चस्तरीय फैसला हो सकता है।


क्या है Project-75(I)?

Project-75(I) भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े के आधुनिकीकरण की बड़ी योजना है। इसके तहत छह नई conventional यानी गैर-परमाणु पनडुब्बियों का निर्माण भारत में किया जाना है। इन पनडुब्बियों में Air Independent Propulsion यानी AIP तकनीक का इस्तेमाल प्रस्तावित है। AIP तकनीक पनडुब्बी को सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तुलना में लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में मदद करती है। इससे पनडुब्बी की stealth क्षमता और समुद्री अभियानों में उसकी उपयोगिता बढ़ती है।


जर्मनी की TKMS और MDL की साझेदारी

इस परियोजना में जर्मनी की TKMS तकनीकी साझेदार है, जबकि भारत की सरकारी कंपनी Mazagon Dock Shipbuilders Limited को निर्माण में प्रमुख भूमिका निभानी है। TKMS और MDL ने 2023 में इस परियोजना के लिए सहयोग का समझौता किया था। बाद में सितंबर 2025 में दोनों कंपनियों ने Project-75(I) के तहत छह जर्मन-डिजाइन वाली पनडुब्बियों के लिए आधिकारिक अनुबंध वार्ता शुरू की थी। योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि पनडुब्बियों का निर्माण भारत में किया जाए। इससे केवल नौसेना की क्षमता बढ़ाने में मदद नहीं मिलेगी, बल्कि देश में submarine manufacturing ecosystem और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी क्षमता को भी मजबूत करने का लक्ष्य है।


₹70 हजार करोड़ की डील इतनी महत्वपूर्ण क्यों?

यह परियोजना भारतीय नौसेना के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। चीन लगातार अपनी नौसैनिक और पनडुब्बी क्षमता का विस्तार कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए underwater warfare capabilities को मजबूत करना रणनीतिक प्राथमिकता बन गया है। नई पनडुब्बियां भारतीय नौसेना को समुद्र के भीतर निगरानी, दुश्मन के युद्धपोतों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर offensive operations की क्षमता को मजबूत करने में मदद कर सकती हैं।


Make in India को भी मिलेगा बड़ा फायदा

Project-75(I) केवल पनडुब्बियां खरीदने की परियोजना नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत में advanced submarine construction की क्षमता विकसित करना है। जर्मनी से मिलने वाली तकनीकी विशेषज्ञता और भारतीय शिपयार्ड की निर्माण क्षमता के संयोजन से देश में भविष्य की पनडुब्बियों के निर्माण के लिए औद्योगिक आधार मजबूत हो सकता है। TKMS ने भी Project-75(I) को भारत की घरेलू submarine manufacturing capability को आगे बढ़ाने वाली परियोजना के रूप में पेश किया है।


AIP तकनीक क्या करेगी?

AIP यानी Air Independent Propulsion पनडुब्बी को पानी की सतह पर आए बिना ज्यादा समय तक संचालन करने की क्षमता देती है।

सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के करीब आना या snorkel का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। AIP प्रणाली इस आवश्यकता को कम करती है। इसका सीधा फायदा stealth में मिलता है। पनडुब्बी जितने लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती है, दुश्मन के लिए उसका पता लगाना उतना ही मुश्किल हो सकता है।


अभी डील फाइनल हुई या नहीं?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। ₹70,000 करोड़ की परियोजना को लेकर खबरें लगातार आती रही हैं, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम को अंतिम contract signing नहीं माना जाना चाहिए। 16 अगस्त 2026 की रिपोर्टों के अनुसार Project-75(I) का प्रस्ताव CCS के सामने ले जाए जाने की संभावना है। यानी परियोजना अभी भी सरकारी मंजूरी और अंतिम प्रक्रियाओं के महत्वपूर्ण चरणों से गुजर रही है। इसलिए फिलहाल इसे “डील फाइनल” की बजाय “डील में महत्वपूर्ण प्रगति की संभावना” के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा।


भारत-जर्मनी रक्षा संबंधों के लिए भी बड़ा कदम

यह परियोजना भारत और जर्मनी के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच पहले से ही आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन submarine manufacturing जैसी high-end defence technology में सहयोग संबंधों को नई दिशा दे सकता है। अगर Project-75(I) सफलतापूर्वक आगे बढ़ता है, तो भविष्य में भारत और जर्मनी के बीच रक्षा उत्पादन, तकनीकी सहयोग और समुद्री सुरक्षा से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ने की संभावना बन सकती है।


नौसेना की ताकत पर क्या असर पड़ेगा?

छह नई AIP-सक्षम पनडुब्बियों के शामिल होने से भारतीय नौसेना की conventional submarine fleet को बड़ा boost मिल सकता है। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में लंबे समय तक underwater surveillance और deterrence क्षमता मजबूत करने में इनका योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत पहले से ही अपने submarine fleet के आधुनिकीकरण पर काम कर रहा है। Project-75(I) इसी व्यापक रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है।


क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?

₹70,000 करोड़ की यह परियोजना तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है—राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा आत्मनिर्भरता और भारत-जर्मनी रणनीतिक संबंध। एक ओर इससे भारतीय नौसेना को छह अत्याधुनिक पनडुब्बियां मिलने की संभावना है, वहीं दूसरी ओर भारत में advanced submarine technology और manufacturing capability विकसित करने का अवसर मिलेगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि CCS और सरकार की अंतिम मंजूरी कब मिलती है और इसके बाद contract signing तथा निर्माण की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है। यदि परियोजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय नौसेना के underwater warfare capabilities के लिए आने वाले वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक हो सकती है।