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33% महिला आरक्षण पर सियासत तेज, PM मोदी बोले- सभी दल साथ आएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए सभी राजनीतिक दलों से साथ आने की अपील की है। स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, ताकि वे देश की नीति और निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, लेकिन इसका क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। PM मोदी की अपील के बाद महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज होने की संभावना है।

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ा संदेश दिया। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द से जल्द लागू करने के लिए साथ आएं। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं को देश की नीतियां तय करने और शासन व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
लाल किले से सभी दलों को PM मोदी का संदेश
15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने महिला आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने राजनीतिक दलों से कहा कि वे महिला सशक्तिकरण को राजनीतिक खींचतान का विषय न बनाएं और 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की माताओं और बहनों को विधानसभाओं और लोकसभा में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, ताकि वे भारत की नीतियों को आकार देने में सक्रिय योगदान दे सकें। उन्होंने विपक्षी दलों से भी इस मुद्दे पर सहयोग करने की अपील की।
33% आरक्षण का मतलब क्या है?
महिला आरक्षण का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए करीब एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है। 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया था। हालांकि, इसके वास्तविक क्रियान्वयन को जनगणना और उसके बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इसी वजह से महिला आरक्षण को लागू करने का समय राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
2029 के चुनाव से जुड़ा है मामला
मौजूदा राजनीतिक बहस में 2029 का लोकसभा चुनाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार की ओर से जिस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, उसका उद्देश्य महिलाओं के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व को 2029 के आम चुनाव से प्रभावी बनाने की दिशा में रास्ता तैयार करना है। रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। यही पहल विपक्ष के एक वर्ग के विरोध का प्रमुख कारण बनी हुई है।
सरकार और विपक्ष के बीच क्यों है मतभेद?
महिला आरक्षण के लक्ष्य को लेकर व्यापक राजनीतिक समर्थन होने के बावजूद इसे लागू करने के तरीके को लेकर राजनीतिक मतभेद सामने आए हैं। विपक्षी दलों का एक प्रमुख सवाल परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने को लेकर है। उनका तर्क है कि परिसीमन से अलग-अलग राज्यों के लोकसभा प्रतिनिधित्व में बदलाव हो सकता है और इससे राज्यों के बीच सीटों के वितरण पर असर पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार जहां महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की बात कर रही है, वहीं विपक्ष का एक हिस्सा परिसीमन की प्रक्रिया और उसके संभावित राजनीतिक प्रभावों पर सवाल उठा रहा है।
PM मोदी ने कहा- राजनीतिक श्रेय की चिंता न करें
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में विपक्षी दलों को एक तरह से राजनीतिक श्रेय की चिंता छोड़कर महिला आरक्षण को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल चाहें तो इस फैसले का श्रेय ले सकते हैं, लेकिन महिलाओं को उनका अधिकार मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि इससे देश की नीति निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की आवाज भी मजबूत होगी।
पंचायतों से संसद तक बढ़ाने की कोशिश
भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का प्रयोग स्थानीय निकायों से काफी पहले शुरू हो चुका है। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने बड़ी संख्या में महिलाओं को स्थानीय शासन में आने का अवसर दिया है। अब इसी तरह के प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तार देने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री ने भी अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में स्थानीय निकायों में महिला प्रतिनिधियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।
महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है 33% आरक्षण?
महिला आरक्षण के समर्थकों का मानना है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ने से शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार, पोषण और महिला कल्याण जैसे मुद्दों को नीति निर्माण में अधिक प्राथमिकता मिल सकती है। इसके अलावा राजनीतिक दलों पर भी ज्यादा संख्या में महिलाओं को टिकट देने और नेतृत्व के अवसर उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, केवल सीट आरक्षित कर देना ही पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व में वास्तविक स्वतंत्रता, संसाधन, संगठनात्मक समर्थन और निर्णय लेने की भूमिका मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
राजनीतिक तौर पर क्यों अहम है PM मोदी की अपील?
प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय में आई है जब महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही राष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। सरकार इस मुद्दे को महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही है, जबकि विपक्षी दलों का एक वर्ग परिसीमन के संभावित प्रभावों पर सवाल उठा रहा है। इसलिए आने वाले समय में संसद में महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव पर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनाने की कोशिश महत्वपूर्ण होगी।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ी चुनौती सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना और संवैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। प्रस्तावित व्यवस्था को लागू करने के लिए संसद में जरूरी संवैधानिक समर्थन हासिल करना महत्वपूर्ण होगा। प्रधानमंत्री मोदी की अपील से यह स्पष्ट है कि सरकार महिला आरक्षण को जल्द लागू करने को राजनीतिक एजेंडे में प्राथमिकता दे रही है। अब निगाहें विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और संसद में इस मुद्दे पर होने वाली अगली राजनीतिक कवायद पर रहेंगी। कुल मिलाकर, 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ महिलाओं के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। यह आने वाले वर्षों में भारत की चुनावी राजनीति, संसद और विधानसभाओं की संरचना तथा राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की ताजा अपील ने इस बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
