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श्रावण की नागपंचमी का पर्व; नाग पूजा के साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को देशभर में नागपंचमी का पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। नाग देवता की पूजा, भगवान शिव के साथ नागों का धार्मिक संबंध, श्रीकृष्ण और कालियानाग की कथा तथा महाराष्ट्र की विभिन्न लोकपरंपराओं के कारण इस पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। ग्रामीण क्षेत्रों में नागपंचमी का संबंध खेती और प्रकृति से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, आधुनिक समय में इस पर्व को मनाते हुए नागों को नुकसान न पहुंचाना, वन्यजीवों की रक्षा करना और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
Priyanka Gaikwad19 अग. 2026, 10:01 AM IST

नागपंचमी का धार्मिक महत्व क्या है?
नागपंचमी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक मानी जाती है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग देवता की पूजा की जाती है। इस दिन नाग देवता को फूल, हल्दी-कुमकुम, अक्षत और नैवेद्य अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। हिंदू धार्मिक परंपरा में नागों को विशेष स्थान प्राप्त है। भगवान शिव के गले में नाग विराजमान होने का धार्मिक चित्रण मिलता है। वहीं भगवान विष्णु का शेषनाग से भी विशेष संबंध माना जाता है। इसलिए नागों को शक्ति, सुरक्षा और प्रकृति से जुड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
श्रीकृष्ण और कालियानाग की कथा
नागपंचमी से जुड़ी श्रीकृष्ण और कालियानाग की कथा बेहद प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यमुना नदी में कालियानाग रहता था। उसके विष के कारण नदी का पानी दूषित हो गया था और आसपास के लोग भयभीत रहते थे। श्रीकृष्ण ने कालियानाग का सामना कर उसे पराजित किया। इसके बाद कालियानाग ने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और यमुना छोड़ने के लिए तैयार हो गया। इस कथा को बुराई पर अच्छाई की जीत, अहंकार के अंत और प्रकृति के संतुलन का संदेश देने वाली माना जाता है।
महाराष्ट्र में नागपंचमी की परंपरा
महाराष्ट्र के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नागपंचमी अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कई स्थानों पर नाग देवता की तस्वीर या प्रतीकात्मक रूप की पूजा की जाती है। ग्रामीण इलाकों में नाग देवता का निवास स्थान माने जाने वाले चींटी के टीले यानी वारुळ की पूजा करने की परंपरा भी है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पूजा-अर्चना करती हैं। कुछ क्षेत्रों में नागपंचमी के अवसर पर झूले, झिम्मा-फुगड़ी और पारंपरिक गीतों का आयोजन भी किया जाता है। इस वजह से नागपंचमी धार्मिक पर्व के साथ-साथ महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
खेती और नागपंचमी का संबंध
नागपंचमी का संबंध ग्रामीण जीवन और खेती से भी जोड़ा जाता है। बारिश के मौसम में सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हैं और खेतों के आसपास उनकी मौजूदगी बढ़ जाती है। सांप चूहों और कुछ अन्य जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इस वजह से खेती के पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी कारण पारंपरिक ग्रामीण समाज में नाग देवता को खेत, फसल और प्रकृति की सुरक्षा से जोड़कर देखा गया है।
नाग को दूध पिलाने की परंपरा और वास्तविकता
नागपंचमी के अवसर पर कुछ स्थानों पर नाग को दूध अर्पित करने की परंपरा देखने को मिलती है। हालांकि, सांप स्तनधारी जीव नहीं हैं और उन्हें दूध पिलाना उनके लिए प्राकृतिक आहार नहीं है। जीवित सांप को जबरदस्ती दूध पिलाने से उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए नाग देवता की प्रतीकात्मक पूजा करना और वास्तविक सांपों को किसी भी प्रकार का नुकसान या परेशानी न पहुंचाना अधिक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीका है।
सांप दिखाई दे तो क्या करें?
नागपंचमी के दौरान यदि कहीं सांप दिखाई दे तो उसे मारना या खुद पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सांप से सुरक्षित दूरी बनाए रखें और प्रशिक्षित सर्पमित्र या संबंधित वन विभाग की सहायता लें। सांप पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उनका संरक्षण करना जरूरी है।
नागपंचमी का आज के समय में संदेश
नागपंचमी केवल धार्मिक पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि इसे मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध को समझने के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। नागों सहित सभी वन्यजीवों का संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और जैव विविधता को बनाए रखना आज के समय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। आस्था को बनाए रखें, लेकिन प्रकृति की रक्षा को भी प्राथमिकता दें। नाग देवता की पूजा के साथ-साथ नागों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाना ही नागपंचमी के पर्व को सार्थक बनाने का सही संदेश है।
