law-order

‘लिव-इन पर परिवार की मनमानी नहीं चलेगी!’ दिल्ली HC का बड़ा फैसला, बालिगों की पसंद और साथ रहने के अधिकार पर लगाई मुहर

शादी की मुहर भले न लगी हो, लेकिन दो बालिग अगर अपनी मर्जी और सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो केवल परिवार की नाराजगी उनके फैसले को नहीं बदल सकती। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे बालिग जोड़े की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए साफ किया कि उनकी पसंद में धमकी, हिंसा या जबरन हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट रखा कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी विवाह का दर्जा नहीं दिया गया है।

Sonali21 अग. 2026, 08:12 PM IST
खबर शेयर करें:
‘लिव-इन पर परिवार की मनमानी नहीं चलेगी!’ दिल्ली HC का बड़ा फैसला, बालिगों की पसंद और साथ रहने के अधिकार पर लगाई मुहर

नई दिल्ली:

 भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानूनी स्थिति एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2026 के एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि दो बालिग और consenting adults अपनी पसंद के पार्टनर के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए स्वतंत्र हैं। यदि परिवार, रिश्तेदार या कोई अन्य व्यक्ति उनकी पसंद में जबरन हस्तक्षेप करता है या उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरा पैदा करता है, तो राज्य और पुलिस का दायित्व उनकी सुरक्षा करना है। लेकिन इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण फैक्ट यह है कि हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी विवाह नहीं माना। अदालत ने इसे “akin to marriage” यानी विवाह के समान प्रकृति का संबंध बताया, लेकिन साथ ही साफ रखा कि दोनों कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं।

क्या है पूरा मामला? Uma Bharti & Anr. v. Government of NCT of Delhi & Ors.

यह मामला Uma Bharti & Anr. v. The Government of NCT of Delhi & Ors. के नाम से दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था। केस नंबर W.P.(CRL) 2429/2026 है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने की और आदेश 13 अगस्त 2026 को पारित किया। मामला एक बालिग जोड़े की सुरक्षा से जुड़ा था। दोनों ने अदालत को बताया कि वे वर्ष 2014 से एक-दूसरे को जानते हैं और कुछ समय से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। दोनों भविष्य में शादी करना चाहते थे, लेकिन महिला के पिता और भाई कथित तौर पर इस रिश्ते से नाराज थे और उन्हें हिंसा की धमकियां मिल रही थीं। जोड़े के अनुसार, 6 अगस्त 2026 को उन्होंने संबंधित पुलिस थाने में शिकायत भी की, लेकिन कथित तौर पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया और अपने जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।

दोनों बालिग हैं तो पार्टनर चुनने का अधिकार भी उनका

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं। आदेश के मुताबिक उनका जन्म क्रमशः 1993 और 1990 में हुआ था। कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी इच्छा और सहमति से किसी रिश्ते में रहते हैं, तो उन्हें अपनी पसंद के पार्टनर के साथ रहने का अधिकार है। केवल माता-पिता, रिश्तेदार या समाज की असहमति इस व्यक्तिगत फैसले को खत्म नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की पसंद को सामाजिक नैतिकता या पूर्वाग्रह के आधार पर सीमित करना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता और पहचान को प्रभावित कर सकता है।

‘Akin to Marriage’ का मतलब क्या है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी शादी का दर्जा नहीं दिया गया है। हालांकि, दो बालिगों का सहमति से साथ रहना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पार्टनर चुनने के संवैधानिक अधिकार का हिस्सा है। यानी अदालत ने विवाह को मान्यता नहीं दी, बल्कि बालिग जोड़े के अपनी पसंद से साथ रहने के अधिकार को कानूनी संरक्षण दिया है।

Article 19 और Article 21 को बनाया आधार

दिल्ली हाईकोर्ट ने संविधान के Article 19 और Article 21 को अपने फैसले का महत्वपूर्ण आधार बनाया। Article 19 व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है, जबकि Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी देता है। अदालत ने माना कि अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण व्यक्तिगत फैसले लेने की स्वतंत्रता व्यक्ति की autonomy का हिस्सा है। इसलिए परिवार की सामाजिक या व्यक्तिगत असहमति अपने आप में बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म करने का आधार नहीं बन सकती।

Shafin Jahan केस का भी सहारा

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Shafin Jahan v. Asokan K.M. का हवाला दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की पसंद और पार्टनर चुनने की स्वतंत्रता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के व्यापक संवैधानिक ढांचे का हिस्सा माना था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रह के आधार पर किसी बालिग की पसंद को कुचलना उसकी व्यक्तिगत पहचान और स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।

Nandakumar केस ने भी दिखाई राह

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का Nandakumar & Anr. v. State of Kerala & Ors. फैसला भी बेहद महत्वपूर्ण है। Nandakumar मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच विवाह न होने की स्थिति भी उनके साथ रहने के अधिकार को खत्म नहीं करती। यानी बालिग व्यक्ति केवल इसलिए साथ रहने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाते क्योंकि उन्होंने औपचारिक विवाह नहीं किया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को वर्तमान मामले में लागू किया।

माता-पिता की असहमति अपनी जगह, लेकिन धमकी की इजाजत नहीं

फैसले का सबसे मजबूत संदेश परिवार के हस्तक्षेप को लेकर है। कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी इच्छा से और जिम्मेदारी के साथ किसी रिश्ते में रहने का फैसला करते हैं, तो माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनके फैसले में बाधा डालने या उनकी जिंदगी और स्वतंत्रता को खतरे में डालने का अधिकार नहीं रखते। इसका अर्थ यह नहीं है कि परिवार अपनी राय नहीं रख सकता। लेकिन राय रखने और धमकी, हिंसा या जबरन हस्तक्षेप करने के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर है।

पुलिस को दिया सुरक्षा का निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने जोड़े को जरूरत पड़ने पर पुलिस से सुरक्षा लेने की अनुमति दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों जरूरत के समय विजय विहार पुलिस स्टेशन के SHO या संबंधित बीट कांस्टेबल से संपर्क कर सकते हैं और पुलिस उन्हें कानून के अनुसार आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएगी। अगर जोड़ा किसी दूसरे पुलिस थाना क्षेत्र में रहने लगता है, तो उसे तीन दिनों के भीतर नए क्षेत्र के SHO को अपने पते की जानकारी देनी होगी। इसके बाद संबंधित पुलिस अधिकारी भी आवश्यकता के अनुसार सुरक्षा उपलब्ध कराएंगे।

यह पहली बार नहीं—दिल्ली HC ने फरवरी में भी दिया था ऐसा ही फैसला

इस फैसले को समझने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के पहले के फैसले Kartik & Anr. v. State of NCT of Delhi & Ors. को देखना जरूरी है। इस मामले में भी न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 24 फरवरी 2026 को consenting adults के लिव-इन संबंध और पारिवारिक धमकियों के संदर्भ में पुलिस सुरक्षा का आदेश दिया था। केस नंबर W.P.(CRL) 665/2026 था।  रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में दोनों बालिगों ने 17 फरवरी 2026 को Live-in Relationship Agreement भी बनाया था। महिला के पिता की कथित धमकियों के बाद जोड़े ने सुरक्षा की मांग की थी। हाईकोर्ट ने Nandakumar और Shafin Jahan के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए कहा कि परिवार बालिगों के स्वैच्छिक रिश्ते में धमकी या अनुचित हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यानी अगस्त का Uma Bharti फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की बिल्कुल नई या अलग सोच नहीं है। यह फरवरी के Kartik फैसले में दिखाई गई संवैधानिक सोच की निरंतरता के रूप में भी देखा जा सकता है।

Supreme Court का Nandakumar फैसला क्या कहता है?

Nandakumar & Anr. v. State of Kerala & Ors. में सुप्रीम कोर्ट ने बालिगों की व्यक्तिगत पसंद और साथ रहने की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना था। यही कारण है कि वर्तमान दिल्ली हाईकोर्ट फैसले में Nandakumar का उल्लेख सिर्फ एक सामान्य उदाहरण के तौर पर नहीं बल्कि सीधे कानूनी आधार के रूप में किया गया।

Shafin Jahan केस: शादी और पार्टनर चुनने की आजादी

Shafin Jahan v. Asokan K.M. यानी Hadiya case ने भारतीय संवैधानिक कानून में “right to choose” की बहस को महत्वपूर्ण दिशा दी। इस फैसले की मूल भावना यह थी कि किसी बालिग व्यक्ति की जिंदगी और पार्टनर चुनने का निर्णय उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। केवल सामाजिक पसंद-नापसंद या नैतिक पूर्वाग्रह के आधार पर उस स्वतंत्रता को समाप्त नहीं किया जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी संवैधानिक सिद्धांत को लिव-इन संबंध के संदर्भ में लागू किया।

Supreme Court का Indra Sarma केस: हर लिव-इन शादी जैसा नहीं

यहां एक बहुत जरूरी कानूनी अंतर समझना होगा। Supreme Court का Indra Sarma v. V.K.V. Sarma, (2013) 15 SCC 755 फैसला बताता है कि हर लिव-इन रिलेशनशिप “relationship in the nature of marriage” नहीं होता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि कानूनी विवाह और लिव-इन संबंध में अंतर है। किसी संबंध को “relationship in the nature of marriage” मानने के लिए उसके वास्तविक स्वरूप और परिस्थितियों को देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे संबंध को परखने के लिए कई पहलुओं पर विचार की बात कही थी, जैसे:

  • दोनों कितने समय से साथ रह रहे हैं

  • क्या वे साझा घर चला रहे हैं

  • आर्थिक जिम्मेदारियां कैसे निभाते हैं

  • क्या घरेलू जिम्मेदारियां साझा हैं

  • क्या दोनों सामाजिक रूप से पति-पत्नी की तरह रहते हैं

  • क्या बच्चों की जिम्मेदारी साझा है

  • रिश्ते में दोनों की वास्तविक मंशा क्या है

इसलिए “लिव-इन” और “relationship in the nature of marriage” दोनों को हर मामले में एक ही नहीं माना जा सकता।

DV Act में लिव-इन संबंधों को सीमित कानूनी पहचान

Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 में “relationship in the nature of marriage” को घरेलू संबंध के दायरे में मान्यता दी गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sarma में यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक लिव-इन संबंध इस श्रेणी में नहीं आएगा। इसलिए किसी महिला को घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत मिलेगी या नहीं, यह संबंध की वास्तविक प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

2026 का Lokesh केस: लिव-इन और 498A पर Supreme Court की बड़ी कड़ी

इसी कानूनी बहस में Supreme Court का 3 अगस्त 2026 का Lokesh B.H. मामला भी महत्वपूर्ण है। Dr. Lokesh B.H. v. State of Karnataka में सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पुरुष के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत मुकदमा चल सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह प्रश्न सीधे विचाराधीन था और कोर्ट ने “relationship in the nature of marriage” तथा शादी करने की मंशा जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना। इसका मतलब यह है कि मौजूदा न्यायिक स्थिति दो अलग सवालों को अलग-अलग देख रही है:

पहला — क्या दो consenting adults को साथ रहने का संवैधानिक अधिकार है?

दूसरा — क्या किसी विशेष लिव-इन संबंध को कानून के किसी खास प्रावधान के लिए “relationship in the nature of marriage” माना जा सकता है?

दोनों सवालों का जवाब हमेशा एक जैसा नहीं होगा।

Noori केस: 12 interfaith live-in couples को भी मिली सुरक्षा

फरवरी 2026 में Allahabad High Court का Noori and Another v. State of U.P. मामला भी इसी व्यापक संवैधानिक सिद्धांत का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। इस मामले में 12 interfaith live-in couples ने सुरक्षा की मांग की थी। उपलब्ध कानूनी रिपोर्टों के अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा कि consenting adults का interfaith live-in संबंध अपने आप में अपराध नहीं है और Article 21 के तहत अपनी पसंद के पार्टनर के साथ रहने के अधिकार को संरक्षण प्राप्त है। इस मामले को Noori v. State of U.P., 2026 SCC OnLine All 456 के रूप में भी संदर्भित किया गया है। यह फैसला दिखाता है कि व्यक्तिगत पसंद, interfaith relationship और साथ रहने की स्वतंत्रता के सवाल पर भी Article 21 की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।

शादीशुदा व्यक्ति के साथ लिव-इन: यहां कानून और जटिल हो जाता है

यही वह जगह है जहां “हर लिव-इन कानूनी रूप से शादी जैसा है” कहना खतरनाक हो सकता है। Supreme Court के Indra Sarma फैसले में एक विवाहित पुरुष और अविवाहित महिला के बीच संबंध को “relationship in the nature of marriage” नहीं माना गया था, क्योंकि संबंध में वैध विवाह की आवश्यक विशेषताएं और exclusivity मौजूद नहीं थीं। इसलिए वर्तमान दिल्ली हाईकोर्ट का Uma Bharti फैसला भी इस पुराने सिद्धांत को खत्म नहीं करता।

फैसले का सबसे बड़ा कानूनी संदेश

पूरे मामले को आसान भाषा में समझें तो दिल्ली हाईकोर्ट का संदेश यह है: दो बालिग अपनी पसंद का पार्टनर चुन सकते हैं। दो consenting adults विवाह के बिना भी साथ रह सकते हैं। परिवार इस फैसले से असहमत हो सकता है, लेकिन धमकी या हिंसा नहीं कर सकता। खतरे की स्थिति में पुलिस सुरक्षा दी जा सकती है।  Article 19 और Article 21 व्यक्ति की autonomy और liberty की रक्षा करते हैं। लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप को स्वतः कानूनी विवाह नहीं माना जाता। हर लिव-इन “relationship in the nature of marriage” भी नहीं होता। किसी विशेष कानूनी अधिकार के लिए संबंध की प्रकृति और परिस्थितियों की अलग से जांच की जा सकती है। 


दिल्ली हाईकोर्ट का Uma Bharti & Anr. v. Government of NCT of Delhi & Ors. फैसला मूल रूप से “लिव-इन को शादी का दर्जा” देने का फैसला नहीं है। इसकी असली ताकत consenting adults की personal autonomy, partner चुनने की स्वतंत्रता और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा में है। फरवरी 2026 के Kartik मामले से लेकर अगस्त 2026 के Uma Bharti मामले तक दिल्ली हाईकोर्ट ने एक समान संवैधानिक दृष्टिकोण दोहराया है कि बालिगों की स्वैच्छिक पसंद को केवल पारिवारिक असहमति के कारण कुचला नहीं जा सकता। दूसरी ओर, Supreme Court के Nandakumar, Shafin Jahan और Indra Sarma जैसे फैसले यह समझने में मदद करते हैं कि “साथ रहने का अधिकार” और “हर कानूनी उद्देश्य के लिए विवाह के बराबर अधिकार” दो अलग-अलग बातें हैं। यानी इस फैसले की सबसे सटीक लाइन यही है—लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी विवाह नहीं है, लेकिन दो consenting adults की अपनी पसंद से साथ रहने की स्वतंत्रता को कानून और संविधान का संरक्षण मिल सकता है; और परिवार की नाराजगी किसी बालिग की जान, आजादी या पसंद पर जबरन कब्जा करने का लाइसेंस नहीं है।