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पत्नी कमाती है तो क्या पिता की जिम्मेदारी भी आधी? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दो बेटियों के ₹60 हजार भरण-पोषण पर हाईकोर्ट का आदेश पलटा

पत्नी कमाती है, इसलिए बच्चों का खर्च भी आधा कर दो—सुप्रीम कोर्ट ने इस सीधे-सादे गणित को खारिज कर दिया है। दो नाबालिग बेटियों के भरण-पोषण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए ₹30,000 प्रति बेटी यानी कुल ₹60,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण बहाल कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि मां की कमाई अपने-आप पिता की जिम्मेदारी को आधा करने का आधार नहीं बन सकती। खास बात यह रही कि अदालत ने बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल और परवरिश में मां के गैर-आर्थिक योगदान को भी अहम माना और कहा कि इसे सिर्फ रुपये-पैसों के हिसाब से नहीं तौला जा सकता।

Sonali21 अग. 2026, 08:12 PM IST
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पत्नी कमाती है तो क्या पिता की जिम्मेदारी भी आधी? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दो बेटियों के ₹60 हजार भरण-पोषण पर हाईकोर्ट का आदेश पलटा


नई दिल्ली, 21 अगस्त 2026। 

पत्नी के कमाने मात्र से बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता की आधी नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बेटियों के अंतरिम भरण-पोषण की राशि ₹60,000 से घटाकर ₹30,000 प्रति माह कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल करते हुए दोनों बेटियों के लिए ₹30,000-₹30,000 यानी कुल ₹60,000 प्रति माह की अंतरिम राशि फिर से लागू कर दी। यह फैसला 20 अगस्त 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन इसे केवल 50-50 के गणित से तय नहीं किया जा सकता। खास तौर पर उस स्थिति में जब मां नौकरी करने के साथ बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल और परवरिश भी कर रही हो।


क्या है पूरा मामला?

मामला Sujata Kumari & Ors. v. Rahul Kumar & Anr. का है। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं और उनकी शादी 18 जून 2006 को हुई थी। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी अपनी दो नाबालिग बेटियों के साथ अलग रहने लगीं। दोनों बेटियों की उम्र लगभग 9 और 8 वर्ष बताई गई है। रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि दंपती की एक संतान बेटा भी था, जिसकी जन्म के कुछ समय बाद मृत्यु हो गई थी। विवाद तब अदालत पहुंचा जब पत्नी ने बच्चों और अपने लिए भरण-पोषण की मांग की। 2022 में Section 125 CrPC के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी। वर्तमान कानूनी व्यवस्था में इसी तरह के प्रावधान Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita यानी BNSS की Section 144 में हैं। पत्नी की ओर से लगभग ₹2.50 लाख प्रति माह maintenance की मांग की गई थी।


पत्नी खुद भी डॉक्टर हैं

इस केस की खास बात यह है कि पत्नी बेरोजगार नहीं थीं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक पत्नी एक qualified gynaecologist हैं और उन्होंने लगभग ₹1.50 लाख प्रति माह आय बताई थी। पति भी qualified doctor हैं और उनके अपने disclosure के मुताबिक उनकी आय लगभग ₹2 लाख प्रति माह थी।


Family Court ने क्या फैसला दिया?

21 अक्टूबर 2024 को Family Court ने पत्नी को interim maintenance देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि पत्नी खुद कमाती हैं और तत्काल आर्थिक असमर्थता की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन दोनों बेटियों के मामले में Family Court ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। बेटियों की शिक्षा, पालन-पोषण और अन्य खर्चों को देखते हुए प्रत्येक बेटी के लिए ₹30,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण तय किया गया। इस तरह दोनों बेटियों के लिए कुल राशि ₹60,000 प्रति माह बनी।


पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

Family Court के आदेश से असंतुष्ट पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। उनका मुख्य तर्क था कि बच्चों की जिम्मेदारी केवल पिता की नहीं है और मां भी कमाती हैं, इसलिए पूरा आर्थिक बोझ पिता पर नहीं डाला जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 9 फरवरी 2026 को पति की revision petition पर Family Court के आदेश में बदलाव किया। हाईकोर्ट ने माना कि दोनों बेटियों के लिए कुल ₹60,000 प्रति माह पर्याप्त राशि है, लेकिन साथ ही कहा कि बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की है। इसी reasoning के आधार पर उसने पिता की देनदारी आधी कर दी। नतीजा यह हुआ कि ₹30,000 प्रति बेटी की राशि घटाकर ₹15,000 प्रति बेटी कर दी गई। यानी कुल अंतरिम maintenance ₹60,000 से घटकर ₹30,000 प्रति माह रह गई।


फिर सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा मामला?

हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ पत्नी और दोनों बेटियां सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। उनकी ओर से दलील दी गई कि दोनों बच्चियां कम उम्र की हैं और उनकी शिक्षा तथा पालन-पोषण का खर्च केवल मां की आय से पूरा करना उचित नहीं होगा। दूसरी तरफ पति की ओर से हाईकोर्ट के reasoning का समर्थन किया गया। उनका कहना था कि मां खुद एक qualified doctor हैं, कमाती हैं और बच्चों की आर्थिक जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की है।


सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

20 अगस्त 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश की समीक्षा की और उसकी reasoning को टिकाऊ नहीं माना।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर इस बात पर आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने Family Court के ₹60,000 के assessment को न तो गलत या मनमाना बताया और न ही यह कहा कि ₹60,000 दोनों बेटियों के लिए बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद केवल इस आधार पर राशि आधी कर दी गई कि मां भी कमाती हैं। अदालत ने साफ कहा कि पत्नी की कमाई अपने-आप पिता की liability को आधा करने का आधार नहीं बन सकती। बच्चों की जिम्मेदारी 50-50 के गणित से तय नहीं होगी सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन इसे केवल arithmetic यानी गणित के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता। यानी अदालत ने यह नहीं कहा कि बच्चों का खर्च केवल पिता को ही उठाना होगा। बल्कि अदालत ने यह कहा कि मां की कमाई को देखकर पिता की liability को सीधे आधा कर देना कानूनन उचित तरीका नहीं है।


मां की देखभाल को भी माना वास्तविक योगदान

सुप्रीम कोर्ट ने मां के non-monetary contribution को भी महत्वपूर्ण माना। दोनों बेटियां मां के साथ रहती हैं। मां नौकरी करने के साथ उनकी रोजमर्रा की जरूरतों, पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। अदालत ने माना कि ऐसी देखभाल को रुपये-पैसे में नहीं मापा जा सकता, लेकिन यह वास्तविक parental contribution है और कई मामलों में आर्थिक योगदान से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।


₹60 हजार को उचित क्यों माना गया?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि पति के अपने disclosure के मुताबिक उनकी आय लगभग ₹2 लाख प्रति माह है। दूसरी तरफ दोनों बेटियां school-going हैं और उनकी उम्र लगभग 9 और 8 वर्ष है। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में दोनों बेटियों की शिक्षा और पालन-पोषण के लिए ₹60,000 प्रति माह को अत्यधिक राशि नहीं कहा जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की reasoning को क्यों खारिज किया?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने Family Court की assessment को perverse नहीं माना था। उसने ₹60,000 को भी excessive नहीं कहा था। बल्कि हाईकोर्ट स्वयं मान रहा था कि दोनों बेटियों के लिए ₹60,000 पर्याप्त राशि है। इसके बावजूद उसने केवल मां की earning capacity को आधार बनाकर पिता की liability आधी कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी approach को unsustainable माना।


सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को set aside कर दिया। इसके साथ ही 21 अक्टूबर 2024 के Family Court के आदेश को restore कर दिया गया। इसका सीधा मतलब है कि दोनों बेटियों के लिए फिर से ₹30,000-₹30,000 प्रति माह, यानी कुल ₹60,000 प्रति माह की interim maintenance देनी होगी। बकाया रकम भी चुकानी होगी रिपोर्टों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने outstanding arrears के भुगतान के लिए भी निर्देश दिया है। पति को बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करने को कहा गया है।


क्या पत्नी को भी maintenance मिला?

नहीं।  Family Court ने पत्नी को interim maintenance देने से इनकार किया था, क्योंकि वह खुद कमाती थीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मुख्य रूप से दोनों नाबालिग बेटियों के interim maintenance से संबंधित है। इसलिए इसे “पत्नी को ₹60 हजार maintenance” के रूप में रिपोर्ट करना गलत होगा। ₹60,000 की राशि दोनों बेटियों के लिए है, पत्नी के लिए नहीं।  यह अंतरिम भरण-पोषण यानी interim maintenance है। मुख्य Section 125 CrPC की कार्यवाही Family Court के सामने लंबित है और उसे अपने merits पर तय किया जाना है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश केवल उस interim maintenance dispute से संबंधित है जिसमें हाईकोर्ट ने राशि ₹60,000 से घटाकर ₹30,000 कर दी थी।


फैसले का बड़ा कानूनी संदेश

इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि कमाने वाली मां की आय को अदालत कभी ध्यान में नहीं रख सकती। अदालत ने इससे कहीं ज्यादा nuanced बात कही है। दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी साझा है, लेकिन बच्चों की जरूरतों और दोनों माता-पिता के वास्तविक योगदान को देखकर liability तय की जानी चाहिए। खासकर जब मां बच्चों के साथ रह रही हो, उनकी रोजमर्रा की देखभाल कर रही हो और साथ ही नौकरी भी कर रही हो, तो उसकी income को पिता की liability घटाने के लिए एक सीधा mathematical formula नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने working mothers और child maintenance से जुड़े विवादों में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने रखा है। मां का कमाना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे पिता की बच्चों के प्रति आर्थिक जिम्मेदारी अपने-आप आधी नहीं हो जाती। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बच्चों की परवरिश केवल फीस, कपड़े और खाने के खर्च का हिसाब नहीं है। बच्चों के साथ रहकर उनकी रोजमर्रा की देखभाल, पढ़ाई और upbringing संभालना भी एक वास्तविक योगदान है। इसलिए maintenance तय करते समय अदालत को केवल आय का गणित नहीं, बल्कि बच्चों की जरूरत, माता-पिता की आर्थिक स्थिति और उनके वास्तविक योगदान को समग्र रूप से देखना होगा।