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498A में ‘पहले FIR और मेडिकल सबूत’ की शर्त पर हाईकोर्ट की फटकार, पति की सजा फिर बहाल

शादी के बाद हुई कथित प्रताड़ना को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि पहले पुलिस शिकायत नहीं हुई या चोट का मेडिकल रिकॉर्ड नहीं है। झारखंड हाईकोर्ट ने इसे इस मामले में “Absolutely Absurd and Unwarranted” बताते हुए पति की धारा 498A की सजा बहाल कर दी।

Sonali21 अग. 2026, 08:13 PM IST
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498A में ‘पहले FIR और मेडिकल सबूत’ की शर्त पर हाईकोर्ट की फटकार, पति की सजा फिर बहाल

शादी के बाद अगर किसी महिला के साथ मारपीट या मानसिक प्रताड़ना का आरोप है, तो क्या उसे साबित करने के लिए पहले पुलिस में शिकायत और चोट का मेडिकल रिकॉर्ड होना ही जरूरी है? झारखंड हाईकोर्ट ने इस सवाल पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि हर मामले में ऐसी पूर्व शिकायत या चोट का दस्तावेजी प्रमाण मांगना “absolutely absurd and unwarranted” हो सकता है। Justice Pradeep Kumar Srivastava की Single Judge Bench ने Sanjay Kumar @ Rajesh Kumar v. State of Jharkhand & Anr. मामले में पति को धारा 498A IPC से बरी करने वाले अपीलीय अदालत के फैसले को उस सीमा तक रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट की conviction तथा sentence बहाल कर दी। फैसला 11 अगस्त 2026 को सुनाया गया।

क्या है पूरा मामला?

मामला Sushma Devi और Sanjay Kumar @ Rajesh Kumar की शादी से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार दोनों की शादी 12 मार्च 2007 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी।

Sushma Devi ने आरोप लगाया कि engagement के समय उसके पिता ने आरोपी पक्ष की मांग पर करीब 2.50 लाख रुपये दिए थे। इसके अलावा सोने-चांदी के आभूषण, घरेलू सामान और electronic items भी दिए गए थे। शादी के बाद कथित तौर पर पति और ससुराल पक्ष ने इन सामान और रकम से असंतोष जताया तथा 2 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की। महिला का आरोप था कि मांग पूरी नहीं होने पर उसे पर्याप्त भोजन और जरूरी सुविधाओं से वंचित किया गया तथा मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसने विशेष रूप से आरोप लगाया कि 15 अप्रैल 2007 की रात उसके पति, ननद और नंदोई ने उसके साथ मारपीट की और उसे matrimonial home से बाहर निकाल दिया। इसके बाद वह अपने रिश्तेदार और फिर मायके चली गई।

पहले ट्रायल कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?

मामले की सुनवाई Judicial Magistrate, 1st Class, Jamshedpur के सामने हुई। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने पांच गवाह पेश किए। महत्वपूर्ण बात यह है कि अभियोजन की ओर से कोई documentary evidence पेश नहीं किया गया था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने मौखिक साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए पति और अन्य आरोपियों को Section 498A IPC तथा Dowry Prohibition Act की Sections 3 और 4 के तहत दोषी ठहराया। 17 अगस्त 2011 के ट्रायल कोर्ट के फैसले में Section 498A IPC के तहत तीन साल का rigorous imprisonment और 10,000 रुपये जुर्माना लगाया गया था। Dowry Prohibition Act की Sections 3/4 के तहत दो साल का rigorous imprisonment और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी। दोनों सजाएं concurrent चलनी थीं।

फिर अपीलीय अदालत ने पति को 498A से क्यों बरी कर दिया?

इसके बाद आरोपी पक्ष ने अपील की। Additional Sessions Judge-II, Jamshedpur ने 31 अगस्त 2016 को फैसला सुनाते हुए पति को Section 498A IPC के आरोप से acquit कर दिया, हालांकि Dowry Prohibition Act की Sections 3/4 के तहत उसकी conviction बरकरार रखी गई। अन्य सह-आरोपियों को दोनों आरोपों से benefit of doubt देते हुए बरी कर दिया गया। यही वह फैसला था जिसे बाद में झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

मामला हाईकोर्ट कैसे पहुंचा?

पति Sanjay Kumar @ Rajesh Kumar ने अपने खिलाफ Dowry Prohibition Act के तहत बची conviction को चुनौती देते हुए Criminal Revision No. 1465 of 2016 दाखिल की। दूसरी ओर, शिकायतकर्ता Sushma Devi ने Criminal Revision No. 23 of 2017 दाखिल करके पति को Section 498A से बरी करने और अन्य आरोपियों को acquit करने वाले appellate judgment को चुनौती दी। दोनों revisions को हाईकोर्ट ने एक साथ सुना और common judgment से निपटाया।

हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या था?

हाईकोर्ट को यह देखना था कि क्या appellate court ने उपलब्ध evidence का सही मूल्यांकन किया था और क्या केवल इस आधार पर 498A का आरोप कमजोर माना जा सकता है कि कथित assault और torture के संबंध में पहले कोई अलग पुलिस केस नहीं कराया गया था अथवा चोट का documentary evidence मौजूद नहीं था।

Justice Pradeep Kumar Srivastava ने पूरे रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और दोनों निचली अदालतों के फैसलों की समीक्षा की।

‘पहले पुलिस शिकायत नहीं की’ वाली दलील पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने appellate court के approach से असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने घटनाओं का chronological account दिया था और तारीखों तथा परिस्थितियों के साथ बताया था कि उसके साथ किस तरह कथित तौर पर दुर्व्यवहार और torture हुआ। इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि assault और torture के संबंध में पहले कोई केस दर्ज कराने या injury का documentary evidence मांगने पर जोर देना इस मामले के facts and circumstances में “absolutely absurd and unwarranted” था। यही इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी है।

लेकिन क्या इसका मतलब है कि 498A में FIR या Medical Report की जरूरत कभी नहीं होगी?

नहीं। यह बात समझना बेहद जरूरी है। झारखंड हाईकोर्ट ने यह कोई blanket rule नहीं बनाया कि Section 498A के आरोप में documentary evidence की जरूरत ही नहीं होती या केवल आरोप के आधार पर conviction हो सकती है। इस मामले में कोर्ट ने पूरे evidence को देखा। शिकायतकर्ता ने घटनाओं का क्रमवार विवरण दिया था और उसके बयान के अलावा अन्य prosecution witnesses की evidence भी रिकॉर्ड पर थी। हाईकोर्ट ने appellate court के निष्कर्ष को evidence के weight के विपरीत पाया। यानी फैसला यह कहता है कि “पहले पुलिस शिकायत नहीं हुई” या “चोट का मेडिकल रिकॉर्ड नहीं है” — इन बातों को अकेले decisive factor नहीं बनाया जा सकता, जब पूरे रिकॉर्ड में विश्वसनीय oral और circumstantial evidence मौजूद हो।

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य: महिला पुलिस स्टेशन गई थी

फैसले के रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि 15 अप्रैल 2007 की कथित घटना के बाद शिकायतकर्ता अपने रिश्तेदार के पास गई और पुलिस स्टेशन भी गई थी। उसके बयान के अनुसार वहां उसे आरोपियों के साथ मामला सुलझाने/conciliation की सलाह दी गई और बाद में वह अपने रिश्तेदार के साथ मायके चली गई। इसलिए headline को यह कहकर पेश करना कि “महिला ने कोई पुलिस शिकायत ही नहीं की थी” पूरी तरह सटीक नहीं होगा। असल विवाद यह था कि appellate court ने पहले की formal police case और injury के documentary proof की अनुपस्थिति को बहुत अधिक महत्व दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने इस मामले के facts में अनुचित माना।

हाईकोर्ट ने पति की 498A सजा क्यों बहाल की?

हाईकोर्ट ने evidence का दोबारा मूल्यांकन करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता ने घटनाओं का chronological और specific account दिया था। कोर्ट ने माना कि appellate court ने उपलब्ध evidence को सही weight नहीं दिया और पति को Section 498A से acquit करने का निष्कर्ष टिकाऊ नहीं था। इसलिए High Court ने appellate judgment को उस सीमा तक set aside कर दिया, जहां Sanjay Kumar @ Rajesh Kumar को Section 498A IPC से acquit किया गया था, और trial court की conviction तथा sentence restore कर दी।

बाकी ससुराल वालों को क्यों राहत मिली?

यह हिस्सा भी बेहद महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को एक साथ दोषी नहीं ठहराया। रिकॉर्ड में अदालत ने sister-in-law Asha Devi और brother-in-law Binod Paswan के खिलाफ पर्याप्त specific involvement नहीं पाया और appellate court द्वारा उन्हें दिया गया acquittal बरकरार रखा। इससे स्पष्ट होता है कि हाईकोर्ट ने केवल इसलिए सभी relatives को दोषी नहीं माना क्योंकि वे matrimonial family से जुड़े थे। यानी फैसला दो बातें एक साथ स्पष्ट करता है: पहली, genuine और specific evidence होने पर केवल prior police complaint या medical document की कमी से matrimonial cruelty का आरोप खारिज नहीं किया जा सकता। दूसरी, केवल रिश्तेदार होने के आधार पर किसी व्यक्ति को 498A में दोषी नहीं ठहराया जा सकता; उसके खिलाफ specific evidence और role देखना जरूरी है।

498A के मामलों में Supreme Court का broader approach क्या है?

यहां हालिया न्यायिक रुझान भी समझना जरूरी है। Supreme Court लगातार यह कहता रहा है कि Section 498A के तहत हर marital disagreement या सामान्य घरेलू झगड़े को “cruelty” नहीं माना जा सकता। आरोपों में पर्याप्त specificity और offence के आवश्यक ingredients का होना जरूरी है। LiveLaw के 2025 Supreme Court digest में भी कई मामलों का उल्लेख है जहां vague और omnibus allegations के आधार पर criminal proceedings को quash किया गया। दूसरी तरफ, matrimonial cruelty अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर होती है, इसलिए हर मामले में independent eyewitness या documentary evidence उपलब्ध होना जरूरी नहीं माना जा सकता। लेकिन prosecution को फिर भी आरोपों को credible और legally sufficient evidence से साबित करना होता है। हालिया न्यायिक फैसलों में इसी संतुलन को देखा जा सकता है। यही कारण है कि झारखंड हाईकोर्ट का फैसला “हर 498A आरोप सही है” वाला फैसला नहीं है। बल्कि यह evidence की सही judicial assessment पर जोर देता है।

498A अब BNS में किस धारा के तहत है?

एक जरूरी कानूनी अपडेट यह भी है कि 1 जुलाई 2024 से नए criminal laws लागू होने के बाद IPC की जगह Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 लागू है। पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ cruelty से संबंधित प्रावधान अब Section 85 BNS में है। Section 85 में cruelty की मूल अवधारणा वही है कि ऐसा wilful conduct जो महिला को suicide के लिए प्रेरित कर सकता है या उसके life, limb या physical/mental health को grave injury या danger पहुंचा सकता है, अथवा unlawful demand for property/valuable security से जुड़ी harassment। लेकिन Sanjay Kumar वाला मामला 2007 की घटनाओं और पुराने IPC regime से संबंधित है, इसलिए judgment में Section 498A IPC का ही इस्तेमाल हुआ है।

हालिया फैसलों से क्या संदेश निकलता है?

इस फैसले को 498A की बहस के दोनों पहलुओं के बीच संतुलन के रूप में देखा जा सकता है। एक तरफ अदालतों को genuine matrimonial cruelty और dowry harassment के मामलों में केवल technical shortcomings के कारण पीड़िता की credible testimony को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दूसरी तरफ, Supreme Court के हालिया फैसले यह भी स्पष्ट करते हैं कि vague, omnibus या unsupported allegations के आधार पर पति और उसके पूरे परिवार को criminal prosecution में घसीटना भी उचित नहीं है। इसलिए वास्तविक कसौटी है — आरोप की specificity, evidence की credibility, accused की specific role और Section 498A/Section 85 के statutory ingredients।

झारखंड हाईकोर्ट का 11 अगस्त 2026 का फैसला matrimonial cruelty के मामलों में evidence की judicial assessment को लेकर महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने साफ किया कि शादीशुदा महिला के साथ कथित assault या torture को केवल इस आधार पर अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि उसने पहले कोई formal police case दर्ज नहीं कराया या injury का अलग documentary proof नहीं पेश किया। लेकिन इस फैसले का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—498A में conviction केवल आरोप लगाने से नहीं होती। आरोप specific होने चाहिए, evidence विश्वसनीय होना चाहिए और आरोपी की भूमिका तथा कानून के आवश्यक ingredients साबित होने चाहिए।


यानी कोर्ट का संदेश सीधा है: 

“न तो हर matrimonial dispute को 498A माना जा सकता है और न ही credible cruelty को केवल इसलिए खारिज किया जा सकता है कि उसके लिए पहले से FIR या medical document मौजूद नहीं है।”