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POSH शिकायत को ‘Sexual Element नहीं’ कहकर दबाया तो होगी अपील! बॉम्बे हाईकोर्ट ने ICC के फैसले पर साफ किया कानून

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत को सिर्फ यह कहकर खारिज कर देना कि उसमें ‘Sexual Element’ नहीं है, अब ICC के लिए अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने POSH Act को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ICC अगर बिना पूरी जांच किए किसी शिकायत को शुरुआती स्तर पर ही खारिज करती है, तो उसका यह निर्णय भी कानूनी चुनौती के दायरे में आ सकता है। कोर्ट ने माना कि ऐसा निर्णय Section 13(2) के तहत ‘Recommendation’ माना जा सकता है और पीड़ित पक्ष Section 18 के तहत अपील कर सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि अपील स्वीकार होने का मतलब हर शिकायत में स्वतः पूरी जांच शुरू होना नहीं है—पहले यह देखना होगा कि शिकायत में वास्तव में sexual harassment का कोई तत्व मौजूद है या नहीं।

Sonali21 अग. 2026, 08:13 PM IST
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POSH शिकायत को ‘Sexual Element नहीं’ कहकर दबाया तो होगी अपील! बॉम्बे हाईकोर्ट ने ICC के फैसले पर साफ किया कानून

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत को Internal Complaints Committee यानी ICC सिर्फ यह कहते हुए दरवाजे पर ही बंद नहीं कर सकती कि शिकायत में कोई ‘sexual element’ नहीं है और फिर उसके फैसले को अपील से बाहर नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि ICC किसी शिकायत पर विचार करने के बाद यह निष्कर्ष निकालती है कि उसमें यौन उत्पीड़न का कोई तत्व नहीं है और इसलिए जांच की जरूरत नहीं है, तो ऐसा निर्णय POSH Act की Section 13(2) के तहत ‘recommendation’ माना जा सकता है और उसके खिलाफ Section 18 के तहत अपील की जा सकती है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अपील स्वीकार होने का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में ICC को तुरंत पूरी जांच का आदेश दे दिया जाएगा। अपीलीय प्राधिकरण को पहले यह देखना होगा कि शिकायत में प्रथम दृष्टया यौन उत्पीड़न का कोई ऐसा तत्व मौजूद है या नहीं, जिसके आधार पर POSH Act के तहत जांच जरूरी हो।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तीन जुड़ी हुई रिट याचिकाओं से सामने आया, जिनमें Anup Vikal, Chandrani Sen और Rohit Anand ने महाराष्ट्र सरकार और अन्य पक्षों के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। विवाद की शुरुआत तब हुई जब Maple Infra InvIT Investment Manager Private Limited की एक महिला कर्मचारी ने 28 अक्टूबर 2023 को कंपनी की Internal Complaints Committee के सामने POSH Act के तहत शिकायत भेजी। शिकायत पर ICC ने विचार किया। बाहरी सदस्य को भी शिकायत से संबंधित प्रक्रिया में शामिल किया गया था। इसके बाद 30 अक्टूबर 2023 को ICC की ओर से बताया गया कि आरोपों में कोई ‘sexual element’ नहीं है और इसलिए ICC के समक्ष POSH Act के तहत जांच का मामला नहीं बनता। महिला ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए POSH Act की Section 18 के तहत Industrial Court, Mumbai में अपील दायर की।

विवाद आखिर किस बात पर था?

याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य दलील यह थी कि Section 18 के तहत अपील तभी की जा सकती है जब ICC ने POSH Act की Section 11 के तहत जांच पूरी करने के बाद Section 13 के तहत कोई recommendation दी हो।nचूंकि इस मामले में ICC ने कोई पूर्ण जांच ही नहीं की थी, इसलिए उनका तर्क था कि 30 अक्टूबर 2023 का communication Section 13(2) की recommendation नहीं माना जा सकता और उसके खिलाफ Section 18 की अपील maintainable नहीं है। दूसरी ओर, महिला की ओर से तर्क दिया गया कि ICC ने शिकायत को केवल एक अनौपचारिक पत्र के जरिए नहीं छोड़ा था, बल्कि शिकायत पर विचार करने के बाद अंतिम रूप से यह तय किया कि उसमें sexual harassment का कोई element नहीं है। इसलिए इस फैसले को केवल इसलिए अपील से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि ICC ने जांच शुरू नहीं की।

Industrial Court ने क्या किया?

Industrial Court ने 4 मई 2026 को याचिकाकर्ताओं की maintainability से जुड़ी आपत्तियां खारिज कर दीं। इसके बाद उसने ICC के communication को रद्द करते हुए शिकायत को POSH Act के तहत नए सिरे से जांच के लिए ICC के पास भेज दिया। याचिकाकर्ताओं ने इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने Section 9, Section 11, Section 13 और Section 18 के पूरे statutory framework को देखते हुए कहा कि Section 18 में अपील का अधिकार सीमित जरूर है, लेकिन ICC द्वारा शिकायत पर विचार करके यह निष्कर्ष निकालना कि उसमें sexual element नहीं है और इसलिए inquiry नहीं होगी, अपने आप में एक substantive determination है। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में ICC अपने निर्णय को केवल ‘preliminary communication’ बताकर statutory appeal से बाहर नहीं कर सकती। अदालत के अनुसार, जब कोई महिला sexual harassment की शिकायत करती है, शिकायत ICC के सामने आती है, ICC उस पर विचार करती है और फिर यह निष्कर्ष देती है कि शिकायत में sexual harassment का कोई element नहीं है, तो इस निर्णय को Section 13(2) के तहत recommendation के रूप में चुनौती दी जा सकती है।

Section 18 में क्या है खास?

POSH Act की Section 18 aggrieved person को ICC की कुछ recommendations और उनके non-implementation के खिलाफ appeal का अधिकार देती है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने Section 18 को इस तरह नहीं पढ़ा कि ICC को शिकायत पर विचार करने के बाद केवल इसलिए appellate scrutiny से बचने का रास्ता मिल जाए क्योंकि उसने पूर्ण inquiry शुरू नहीं की। यानी शिकायत को threshold पर खारिज करने का तरीका अपने आप में appeal के अधिकार को खत्म नहीं करता।

लेकिन हर शिकायत में जांच जरूरी नहीं- कोर्ट की अहम clarification

फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी उतना ही अहम है। हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि ICC के पास आने वाली हर शिकायत पर अनिवार्य रूप से पूरी POSH inquiry करनी ही होगी। अदालत ने माना कि ICC की jurisdiction के लिए यह देखना जरूरी है कि शिकायत में sexual harassment का आरोप या element मौजूद है या नहीं। इसलिए Section 18 के तहत अपील maintainable होने के बाद Industrial Court को पहले यह तय करना होगा कि शिकायत में ऐसा कोई sexual element है या नहीं, जो POSH Act के तहत inquiry को trigger करता है। अगर शिकायत में ऐसा element नहीं मिलता है तो अपील खारिज की जा सकती है। लेकिन अगर शिकायत में sexual harassment का आरोप प्रथम दृष्टया मौजूद है और ICC ने गलत तरीके से inquiry से इनकार किया है, तो आगे ICC inquiry का रास्ता खुल सकता है।

Industrial Court को हाईकोर्ट की फटकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने Industrial Court की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर आपत्ति जताई। हाईकोर्ट के अनुसार, Industrial Court के सामने शुरुआत में केवल maintainability का मुद्दा था, लेकिन उसने मामले के merits पर भी आगे बढ़कर निष्कर्ष दे दिए और ICC के फैसले को रद्द कर दिया। इसलिए हाईकोर्ट ने Industrial Court के merits से जुड़े निर्णय को पूरी तरह बरकरार नहीं रखा और मामले को fresh consideration के लिए वापस भेज दिया।

हाईकोर्ट ने आखिर क्या आदेश दिया?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने Section 18 के तहत महिला की appeal को maintainable माना, लेकिन Industrial Court के merits पर दिए गए निर्णय को आंशिक रूप से set aside कर दिया। मामला फिर Industrial Court को भेजा गया ताकि वह कानून के अनुसार merits पर fresh decision ले। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Industrial Court को यह देखना होगा कि शिकायत में वास्तव में sexual harassment का कोई element मौजूद है या नहीं। इसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि ICC को POSH inquiry करने का निर्देश दिया जाए या appeal खारिज की जाए।

किस जज ने फैसला सुनाया?

यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट में Justice Sandeep V. Marne ने सुनाया। मामला तीन connected writ petitions—Writ Petition Nos. 7430 of 2026, 7434 of 2026 और 8418 of 2026—से जुड़ा था। फैसला 19 अगस्त 2026 को सुनाया गया और सुनवाई 4 अगस्त 2026 को reserve हुई थी।

कोर्ट का सबसे बड़ा कानूनी संदेश

इस फैसले का मूल संदेश यह है कि POSH Act के तहत ICC की प्रक्रिया केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि ICC ने formal inquiry की या नहीं। अगर ICC ने शिकायत पर विचार करके यह तय कर दिया कि मामला POSH Act के दायरे में नहीं आता, तो उस निर्णय की वास्तविक प्रकृति देखी जाएगी। केवल उसे ‘communication’ या preliminary decision कह देने से उसे statutory appeal से बाहर नहीं किया जा सकता। साथ ही, कोर्ट ने यह संतुलन भी बनाए रखा कि Section 18 की appeal maintainable होने का अर्थ यह नहीं कि हर complaint में sexual harassment की पूरी जांच अनिवार्य रूप से होगी। यही इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बात है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला POSH Act के तहत शिकायतों की शुरुआती scrutiny और appellate remedy के बीच महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है। ICC किसी शिकायत को यह कहते हुए threshold पर बंद कर सकती है कि उसमें sexual harassment का element नहीं है, लेकिन उसका ऐसा निर्णय कानूनी चुनौती से पूरी तरह मुक्त नहीं होगा। दूसरी तरफ, Section 18 की appeal को maintainable मानने का मतलब यह भी नहीं है कि हर complaint स्वतः full-fledged inquiry में चली जाएगी। पहले यह तय होगा कि शिकायत में POSH Act लागू होने लायक sexual harassment का element मौजूद है या नहीं। यही वह बिंदु है जो इस फैसले को workplace sexual harassment law के संदर्भ में महत्वपूर्ण बनाता है।