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कुशीनगर में बड़ा भूमि फैसला, 1,503 एकड़ जमीन पर अब राज्य सरकार का अधिकार

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पडरौना राजदरबार की 1,503.57 एकड़ अतिरिक्त जमीन से जुड़े करीब 44 साल पुराने विवाद का निस्तारण हो गया है। प्रशासन के आदेश के बाद यह जमीन राज्य सरकार में निहित कर दी गई है। यह भूमि कई तहसीलों के 90 से अधिक गांवों में फैली हुई है। प्रशासन के अनुसार, नियमों के तहत इसका उपयोग भूमिहीन परिवारों, कृषि पट्टे और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए किया जा सकता है।

Neha Sharma21 अग. 2026, 08:13 PM IST
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कुशीनगर में बड़ा भूमि फैसला, 1,503 एकड़ जमीन पर अब राज्य सरकार का अधिकार

कुशीनगर: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में पडरौना राजदरबार की 1,503.57 एकड़ अतिरिक्त भूमि से जुड़े करीब 44 साल पुराने विवाद का अंतिम निस्तारण हो गया है। अपर जिलाधिकारी (न्यायिक), कुशीनगर ने 14 अगस्त को आदेश जारी करते हुए नियमानुसार उत्तराधिकारियों के लिए 18.04 एकड़ सिंचित भूमि छोड़कर शेष 1,503.57 एकड़ भूमि को अधिकतम जोत सीमा के तहत अतिरिक्त घोषित कर राज्य सरकार में निहित कर दिया।


1978 में शुरू हुई थी कार्रवाई

इस मामले की शुरुआत वर्ष 1978 में हुई थी। रानी रेवती देवी के नाम दर्ज भूमि के संबंध में उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम के तहत जमीन की अधिकतम सीमा निर्धारित करने की कार्रवाई शुरू की गई थी। तथा संशोधित व्यवस्था के तहत सिंचित भूमि के आधार पर , यानी सामान्य अर्थों में

30 नवंबर 1978 के आदेश में पुरानी व्यवस्था के तहत 359.61 एकड़ तथा संशोधित व्यवस्था के तहत सिंचित भूमि के आधार पर 66.75 एकड़, यानी सामान्य अर्थों में 131.23 एकड़ भूमि को अतिरिक्त घोषित किया गया था। इसके खिलाफ खातेदार की ओर से न्यायालय में अपील की गई।


मामला अदालतों तक पहुंचा

जिला न्यायालय में अपील के बाद मामले को दोबारा निस्तारण के लिए भेजा गया। इसके बाद रानी रेवती देवी और अन्य की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। उच्च न्यायालय ने 21 जनवरी 1983 को सीलिंग कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। प्रशासन के अनुसार, बाद में 5 जुलाई 2002 को यह याचिका अनुपस्थिति के कारण खारिज हो गई और पहले दिया गया स्थगन आदेश भी समाप्त हो गया। इसके बाद प्रशासन ने लंबित मामले के निस्तारण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।


90 से अधिक गांवों में फैली है जमीन

सरकार में निहित की गई 1,503.57 एकड़ भूमि कुशीनगर जिले के पडरौना, खड्डा, कसया और कप्तानगंज तहसील क्षेत्रों में फैली हुई है। प्रशासन के अनुसार यह जमीन 90 से अधिक गांवों में स्थित है।

  • पडरौना तहसील के 68 गांवों में 339.54 एकड़

  • खड्डा तहसील के 23 गांवों में 1,127.43 एकड़

  • कसया तहसील के कुछ गांवों में 10 एकड़

  • कप्तानगंज तहसील के रामपुर बगहा में 26.60 एकड़

भूमि शामिल है। इन आंकड़ों को मिलाकर कुल 1,503.57 एकड़ भूमि राज्य सरकार में निहित की गई है।


अब राजस्व अभिलेखों में दर्ज होगी जमीन

फैसले के बाद इस भूमि को राजस्व अभिलेखों में राज्य सरकार की सीलिंग भूमि के रूप में दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसका मतलब है कि जमीन का प्रशासनिक नियंत्रण अब राज्य सरकार के पास रहेगा। प्रशासन का कहना है कि इस जमीन का उपयोग जनहित से जुड़े कार्यों में किया जा सकता है।


भूमिहीन परिवारों को मिल सकता है लाभ

प्रशासन की योजना के अनुसार, पात्र भूमिहीन किसानों और जरूरतमंद परिवारों को नियमों के तहत कृषि और आवासीय पट्टा देने के लिए जमीन का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा आवश्यकता के अनुसार इस भूमि का इस्तेमाल विद्यालय, अस्पताल, खेल मैदान, आंगनबाड़ी केंद्र, पंचायत भवन और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए भी किया जा सकता है।


अवैध कब्जे पर भी सख्ती

सरकारी रिकॉर्ड में जमीन दर्ज होने के साथ प्रशासन ने इस भूमि पर संभावित अवैध कब्जों को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति या भू-माफिया का अवैध कब्जा पाया जाता है तो उसे हटाकर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।


44 साल बाद क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

पडरौना राजदरबार की भूमि का मामला कई दशकों से न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लंबित था। अब अंतिम आदेश के बाद बड़ी मात्रा में भूमि राज्य सरकार के नियंत्रण में आ गई है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकारी भूमि उपलब्ध होने से भूमिहीन परिवारों के पुनर्वास और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए जमीन उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।


कुशीनगर में पडरौना राजदरबार की 1,503.57 एकड़ भूमि का राज्य सरकार में निहित होना चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे भूमि विवाद का महत्वपूर्ण पड़ाव है। प्रशासन अब जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने और नियमानुसार इसके जनहित में इस्तेमाल की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। हालांकि, जमीन के वास्तविक उपयोग और पट्टा वितरण की प्रक्रिया आगे होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर करेगी। फिलहाल सबसे बड़ा बदलाव यह है कि लंबे समय से चले आ रहे सीलिंग विवाद के बाद यह भूमि राज्य सरकार के नियंत्रण में आ गई है।