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11 साल पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा वार: रोज़लिन खान और एडवोकेट रिजवान सिद्दीकी पर ₹5-₹5 लाख की कॉस्ट

करीब 11 साल से चले आ रहे अभिनेत्री रिहाना खान उर्फ रोज़लिन खान और एडवोकेट रिजवान सिद्दीकी के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बेहद सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष पूरी तरह साफ हाथों से अदालत नहीं आए और उनके विवाद ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का कीमती न्यायिक समय लिया। इसी पर सख्त टिप्पणी करते हुए अदालत ने दोनों पर ₹5-₹5 लाख की कॉस्ट लगाई।

Sonali22 अग. 2026, 12:20 PM IST
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11 साल पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा वार: रोज़लिन खान और एडवोकेट रिजवान सिद्दीकी पर ₹5-₹5 लाख की कॉस्ट

नई दिल्ली: 

सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेत्री रिहाना खान उर्फ रोज़लिन खान और अधिवक्ता रिजवान सिद्दीकी से जुड़े करीब 11 साल पुराने विवाद में दोनों पक्षों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि दोनों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को पूरी तरह सामने नहीं रखा और मुकदमे के दौरान suppression, embellishment और afterthought जैसे तत्व सामने आए। अदालत ने दोनों पर ₹5-₹5 लाख की लागत लगाते हुए रकम चार सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया किसी व्यक्ति के निजी विवाद को निपटाने, अपनी प्रतिष्ठा बचाने या दूसरे पक्ष से व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने का मंच नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस विवाद ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट—तीनों स्तरों पर करीब 11 साल का न्यायिक समय लिया, जबकि यह समय उन दूसरे मुकदमों में लगाया जा सकता था जहां लोगों को वास्तविक और तत्काल न्यायिक राहत की जरूरत थी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला अभिनेत्री रिहाना खान और अधिवक्ता रिजवान सिद्दीकी के बीच वर्ष 2013-14 के दौरान बने वकील-मुवक्किल संबंध से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, खान ने सिद्दीकी को अपना वकील नियुक्त किया था और उस दौरान उन्होंने अपनी निजी जिंदगी तथा अपने आरोपों से संबंधित संवेदनशील और गोपनीय जानकारी उनके साथ साझा की थी। बाद में दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। 15 जुलाई 2014 को जारी एक कानूनी नोटिस को लेकर भी विवाद सामने आया। इसके बाद 24 जुलाई 2014 को खान ने FIR दर्ज कराई, जिसमें अधिवक्ता का नाम भी आया। 5 अगस्त 2014 को सिद्दीकी का इंटरव्यू 'Aaj Tak' और 'Zee News' पर प्रसारित हुआ। इस दौरान खान और वकील के बीच हुई बातचीत तथा मैसेजिंग से संबंधित सामग्री भी टीवी पर दिखाई गई। खान का आरोप था कि वकील ने उनके साथ साझा की गई गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक किया और उनके हितों के खिलाफ काम किया। दूसरी ओर, सिद्दीकी ने इन आरोपों का विरोध किया और अपने कदमों को सार्वजनिक आरोपों का जवाब बताया।

Bar Council में पहुंचा मामला, वकील पर लगा Professional Misconduct

रिहाना खान ने अधिवक्ता के खिलाफ Advocates Act, 1961 की Section 35 के तहत पेशेवर कदाचार की शिकायत की। मामला बाद में Bar Council of India की Disciplinary Committee के सामने पहुंचा और B.C.I. Tr. Case No. 177 of 2018 के रूप में चला। 11 अगस्त 2025 को Bar Council of India की Disciplinary Committee ने रिजवान सिद्दीकी को Professional Misconduct का दोषी माना। समिति ने उनके नाम को Bar Council of Maharashtra and Goa के रोल से दो साल के लिए हटाने का निर्देश दिया। इस अवधि में उन्हें भारत में किसी कोर्ट, ट्रिब्यूनल या अथॉरिटी के सामने अधिवक्ता के रूप में पेश होने या खुद को अधिवक्ता के रूप में प्रस्तुत करने से रोका गया। इसके अलावा समिति ने ₹3 लाख की राशि शिकायतकर्ता को देने और ₹2 लाख Bar Council of India के Welfare Fund में जमा करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

BCI के आदेश के बाद दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। रिहाना खान ने वकील पर लगाई गई सजा को और बढ़ाने की मांग की, जबकि रिजवान सिद्दीकी ने BCI के आदेश को चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, रिजवान सिद्दीकी ने पहले Bombay High Court में Article 226 के तहत Writ Petition No. 11765 of 2025 दायर की थी। 27 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले का रिकॉर्ड अपने पास मंगाकर संबंधित मामलों के साथ सुनवाई की। इसी दौरान रिजवान सिद्दीकी की एक अन्य अपील भी सुप्रीम कोर्ट में आई।

सुप्रीम कोर्ट ने वकील की सजा क्यों बरकरार रखी?

सुप्रीम कोर्ट ने वकील की ओर से पूर्व मुवक्किल की गोपनीय जानकारी मीडिया में सामने रखने को गंभीर माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकील और मुवक्किल के बीच confidentiality का दायित्व केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि बाद में दोनों एक-दूसरे के विरोधी बन गए हैं। अदालत के अनुसार, यदि कोई वकील यह मानता है कि उसके खिलाफ गलत आरोप लगाए गए हैं तो उसके पास कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। लेकिन वह अपनी शिकायत का जवाब देने के लिए टीवी चैनल पर जाकर पूर्व मुवक्किल की privileged communications सार्वजनिक नहीं कर सकता, रिकॉर्ड की गई बातचीत प्रसारित नहीं कर सकता या मुवक्किल की शिकायत को सार्वजनिक रूप से झूठा बताने का रास्ता नहीं अपना सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर पेशेवर कदाचार की finding को बरकरार रखा और BCI द्वारा लगाई गई दो साल की सजा में हस्तक्षेप नहीं किया।

लेकिन अभिनेत्री को भी कोर्ट से राहत क्यों नहीं मिली?

यह मामले का अहम हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार की कार्रवाई बरकरार रखी, लेकिन रिहाना खान की सजा बढ़ाने की मांग भी स्वीकार नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति अपने पक्ष में राहत बढ़ाने की मांग कर रहा है, उसे अदालत के सामने clean hands के साथ आना चाहिए। कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद कुछ ऐसे दस्तावेजों और बातचीत का उल्लेख किया जिन्हें उसने खान के अपने पक्ष में इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड का हिस्सा माना। अदालत ने यह भी नोट किया कि खान ने 28 जुलाई 2014 को स्वयं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने आकर अपने मामले के बारे में बात की थी, जबकि बाद में उन्होंने शिकायत की कि उनके मामले को सार्वजनिक किया गया। इसके अलावा जिस पुलिस अधिकारी के खिलाफ आरोपों से संबंधित विवाद था, उसे ट्रायल कोर्ट ने 4 दिसंबर 2015 को discharge कर दिया था और उस आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खान की ओर से सजा बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

11 साल तक अदालतों में चलता रहा विवाद

सुप्रीम कोर्ट की सबसे कड़ी टिप्पणी मुकदमे में लगे समय को लेकर थी। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों ने मिलकर Bar Council of India, एक High Court और सुप्रीम कोर्ट के समय का इस्तेमाल करीब 11 वर्षों तक किया। अदालत ने judicial time को एक सीमित सार्वजनिक संसाधन बताया। कोर्ट के मुताबिक, इस विवाद में लगा समय उन दूसरे litigants के लिए इस्तेमाल हो सकता था जो वास्तविक न्यायिक राहत का इंतजार कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष शिकायत लेकर अदालत पहुंचे, लेकिन विवाद के एक बड़े हिस्से के लिए दोनों स्वयं जिम्मेदार थे।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी—‘अदालत निजी हिसाब चुकता करने की जगह नहीं’

जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि न्याय की मशीनरी ऐसी सुविधा नहीं है जिसका इस्तेमाल पक्षकार आपसी हिसाब चुकता करने, अपनी खराब हुई प्रतिष्ठा बचाने या अपने ही बनाए विवाद से फायदा उठाने के लिए करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को पूरी तरह सामने नहीं रखा और रिकॉर्ड से कई बातें बाद में सामने आईं। इसलिए दोनों में से कोई भी पक्ष पूरी तरह श्रेय लेकर अदालत से बाहर नहीं जा सकता।

दोनों पर ₹5-₹5 लाख की लागत

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः दोनों पक्षों की अपीलें और संबंधित कार्यवाही खारिज करते हुए 11 अगस्त 2025 के BCI आदेश को बरकरार रखा। इसके साथ ही कोर्ट ने रिहाना खान और रिजवान सिद्दीकी—दोनों पर ₹5 लाख की लागत लगाई। दोनों को यह राशि चार सप्ताह के भीतर Supreme Court Legal Services Committee में जमा करनी होगी। भुगतान न करने की स्थिति में रकम कानून के अनुसार वसूल की जाएगी। यानी दोनों पर कुल ₹10 लाख की लागत लगाई गई है।

कौन-कौन से जजों की बेंच ने फैसला सुनाया?

21 अगस्त 2026 को फैसला Justice Vikram Nath की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने सुनाया। बेंच में Justice Sandeep Mehta और Justice Vijay Bishnoi भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के उपलब्ध फैसले में तीनों जजों के नाम दर्ज हैं। मामले का शीर्षक Rehana Khan v. Rizwan Siddhiquee है। मुख्य मामला Civil Appeal No. 12256 of 2025 था, जिसके साथ Transferred Case (Civil) No. 30 of 2026 और Civil Appeal No. 7959 of 2026 भी जुड़े थे। फैसले की तारीख 21 अगस्त 2026 है और रिपोर्टेड citation 2026 INSC 907 है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल ₹5 लाख की लागत तक सीमित नहीं है। अदालत ने एक साथ दो महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं—पहला, वकील और मुवक्किल के बीच गोपनीयता का दायित्व गंभीर पेशेवर जिम्मेदारी है; दूसरा, अदालतों का समय निजी विवाद, प्रतिष्ठा की लड़ाई या व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

करीब 11 साल तक चले इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के आचरण पर असहमति जताते हुए BCI का आदेश बरकरार रखा और दोनों को ₹5-₹5 लाख Supreme Court Legal Services Committee में जमा करने का निर्देश दिया।