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22 Death Sentences के बाद बड़ा प्रशासनिक फैसला! मुजफ्फरनगर के जज से 97 हत्या और गंभीर अपराधों के केस वापस

एक तरफ महज चार महीनों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर चर्चा में हैं, तो दूसरी तरफ उनकी अदालत से हत्या और अन्य जघन्य अपराधों के 97 लंबित मामलों की फाइलें वापस लिए जाने से नया सवाल खड़ा हो गया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह के प्रशासनिक आदेश के तहत ये मामले अब उनकी अदालत में सुने जाएंगे। हालांकि सबसे अहम बात यह है कि आदेश में 97 केस वापस लेने की वजह स्पष्ट नहीं की गई है। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि 22 Death Sentences ही इस प्रशासनिक फैसले की वजह हैं।

Sonali22 अग. 2026, 01:35 PM IST
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22 Death Sentences के बाद बड़ा प्रशासनिक फैसला! मुजफ्फरनगर के जज से 97 हत्या और गंभीर अपराधों के केस वापस

मुजफ्फरनगर:

 उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा और चर्चा में आने वाला घटनाक्रम सामने आया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े 97 लंबित मामलों की फाइलें वापस ले ली गई हैं। यह प्रशासनिक फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब जज दिवाकर की अदालत ने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 10 अलग-अलग मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। हालांकि, उपलब्ध प्रशासनिक आदेश में इन 97 मामलों को वापस लेने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। इसलिए यह कहना कि 22 मौत की सजाओं के कारण ही केस वापस लिए गए, फिलहाल पुष्ट तथ्य नहीं है।

97 केस आखिर क्यों वापस लिए गए?

मुजफ्फरनगर के District & Sessions Judge वीरेंद्र कुमार सिंह की ओर से जारी प्रशासनिक आदेश के तहत Additional District & Sessions Judge/FTC, Court No. 3 में लंबित 97 केस फाइलों को वापस जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में बुलाया गया है। इन मामलों में हत्या और अन्य ऐसे गंभीर अपराध शामिल हैं, जिनमें कानून के तहत मौत या उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। अब इन मामलों को जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में निस्तारित किया जाएगा। सबसे अहम बात यह है कि प्रशासनिक आदेश में recall का कोई विस्तृत कारण नहीं बताया गया है। इसलिए 97 मामलों के transfer को सीधे जज दिवाकर द्वारा सुनाई गई 22 death sentences से जोड़ना अभी उचित नहीं होगा।

22 मौत की सजाओं के बाद क्यों चर्चा में आया यह फैसला?

इस प्रशासनिक कदम की टाइमिंग ने पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बना दिया है। अप्रैल से 13 अगस्त 2026 के बीच जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने 10 अलग-अलग मामलों में कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया। 6 अप्रैल को अधिवक्ता समीर सैफी की हत्या के मामले में तीन दोषियों को मौत की सजा से इस सिलसिले की शुरुआत हुई। इसके बाद 28 अप्रैल को एक अन्य हत्या मामले में चार, 30 मई को महिला और उसके छह वर्षीय बेटे की हत्या के मामले में एक, 20 जून को राजेंद्र सैनी हत्याकांड में दो और 2 जुलाई को ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड की हत्या के मामले में एक दोषी को मृत्युदंड दिया गया। 6 जुलाई को पंचायत चुनाव की रंजिश से जुड़े 2010 के हत्या मामले में दो दोषियों, 17 जुलाई को शामली के किसान हत्याकांड में चार, 12 अगस्त को फिरौती के लिए लकड़ी व्यापारी के अपहरण और हत्या के मामले में एक तथा 13 अगस्त को 12 साल पुराने हत्या मामले में चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।

22 Death Sentences का आंकड़ा कितना असाधारण है?

यह आंकड़ा इसलिए भी ध्यान खींचता है क्योंकि एक ही अदालत द्वारा इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में death sentences सुनाए जाने की घटनाएं बेहद कम देखने को मिलती हैं। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, 6 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच करीब 100 दिनों में ही जज दिवाकर की अदालत ने सात मामलों में 17 death sentences सुनाई थीं। तुलना के लिए, पूरे उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025 में trial courts ने 20 मामलों में कुल 28 लोगों को death sentence सुनाई थी। इस तुलना ने death penalty के ‘rarest of rare’ सिद्धांत, sentencing के दौरान mitigating circumstances की जांच और मृत्युदंड देने की न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कानूनी बहस को भी चर्चा में ला दिया है। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जज दिवाकर ने किसी मामले में कानून का उल्लंघन किया है।

स्थानीय वकीलों और पक्षकारों में भी चर्चा

रिपोर्टों के मुताबिक, मुजफ्फरनगर District Bar Association के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने बताया कि कुछ वकीलों और litigants के बीच लंबित गंभीर मामलों में death penalty दिए जाने को लेकर apprehension की बात सामने आई थी। लेकिन यह distinction बेहद जरूरी है कि यह स्थानीय lawyers या litigants की चिंता है, प्रशासनिक आदेश में 97 केस वापस लेने की आधिकारिक वजह नहीं। इसलिए इसे “वकीलों की आशंका” के तौर पर रिपोर्ट करना उचित है, न कि recall का सिद्ध कारण बताना।

जज दिवाकर के करियर में 35 Death Sentences

रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फरनगर में 22 death sentences से पहले जज रवि कुमार दिवाकर ने बरेली में अपने कार्यकाल के दौरान 13 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था। इस तरह उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर उनके न्यायिक करियर में death sentence पाने वाले दोषियों की संख्या 35 बताई गई है। हालांकि, यहां एक जरूरी कानूनी अंतर समझना होगा—35 death sentences का मतलब यह नहीं है कि 35 लोगों को फांसी दी जा चुकी है।

Death Sentence मिलना यानी फांसी होना नहीं

यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। Sessions Court द्वारा सुनाई गई death sentence अंतिम नहीं होती। BNSS की Section 407 के तहत Sessions Court द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा High Court को confirmation के लिए भेजी जाती है। High Court की पुष्टि के बिना death sentence को execute नहीं किया जा सकता। इसलिए जज दिवाकर की अदालत द्वारा सुनाई गई 22 मौत की सजाएं अभी अंतिम रूप से लागू सजा नहीं हैं। दोषियों के पास High Court और कानून के तहत उपलब्ध अन्य judicial remedies का रास्ता मौजूद है।

Supreme Court का ‘Rarest of Rare’ सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण?

भारत में death penalty केवल ‘rarest of rare’ मामलों में दी जानी चाहिए। Supreme Court ने अपने विभिन्न फैसलों में sentencing stage पर aggravating और mitigating circumstances के संतुलन पर जोर दिया है। अदालतों को अपराध की गंभीरता के साथ-साथ आरोपी की पृष्ठभूमि, परिस्थितियों, सुधार की संभावना और अन्य relevant mitigating factors पर भी विचार करना होता है। इसलिए किसी भी death sentence को केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर स्वतः उचित नहीं माना जाता। प्रत्येक मामले के facts और sentencing record की स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा होती है।

97 मामलों का क्या होगा?

अब ये 97 मामले जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में जाएंगे। इनमें murder और अन्य heinous offences के मामले शामिल हैं। इन मामलों की सुनवाई नए सिरे से merits पर होगी और केवल इसलिए कि वे पहले जज दिवाकर की अदालत में लंबित थे, यह नहीं माना जा सकता कि उनमें कोई विशेष परिणाम तय हो चुका है।

Judge Ravi Kumar Diwakar कौन हैं?

रवि कुमार दिवाकर 2022 में राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आए थे जब वाराणसी में Civil Judge के रूप में उन्होंने Gyanvapi परिसर के videographic survey से जुड़ा आदेश पारित किया था। बाद में बरेली और फिर मुजफ्फरनगर में उनके न्यायिक आदेशों को लेकर वे चर्चा में रहे। मुजफ्फरनगर में चार महीने के भीतर 22 death sentences सुनाए जाने के बाद उनका नाम एक बार फिर national legal news में प्रमुखता से सामने आया।

Judge की Security को लेकर भी उठे थे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच जज दिवाकर की सुरक्षा को लेकर भी एक अलग घटनाक्रम सामने आया था। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने 30 जुलाई को उत्तर प्रदेश के DGP को पत्र लिखकर अपने assigned gunner को बदले जाने को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि 14 जुलाई को उनके gunner को उनकी सहमति और किसी स्पष्ट कारण के बिना बदल दिया गया। पुलिस की ओर से बताया गया कि मूल constable छुट्टी पर था और उसकी जगह alternative gunner लगाया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस security issue को 97 cases के recall से जोड़ने का कोई पुष्ट आधार उपलब्ध नहीं है।

97 केस और 22 Death Sentences: क्या दोनों घटनाओं में कोई सीधा संबंध है?

फिलहाल इसका जवाब है—पुष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। एक तरफ 22 death sentences का सिलसिला अप्रैल से अगस्त तक चला और दूसरी तरफ 97 मामलों का administrative recall हुआ। दोनों घटनाओं की टाइमिंग निश्चित रूप से ध्यान खींचती है। लेकिन प्रशासनिक आदेश में यह नहीं कहा गया कि केस इसलिए वापस लिए गए क्योंकि जज दिवाकर ने बड़ी संख्या में मौत की सजाएं सुनाईं। इसलिए पत्रकारिता की दृष्टि से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है: “22 death sentences के बाद 97 गंभीर केस recall किए गए, लेकिन दोनों घटनाओं के बीच कारण-संबंध प्रशासनिक आदेश से स्थापित नहीं होता।”

22 Death Sentences की पूरी Timeline

तारीखमामलाDeath Sentence
6 अप्रैलवकील समीर सैफी हत्याकांड3
28 अप्रैल2019 का हत्या मामला4
30 मईमहिला और 6 वर्षीय बेटे की हत्या1
20 जूनराजेंद्र सैनी हत्याकांड2
2 जुलाईड्यूटी पर होमगार्ड की हत्या1
6 जुलाईपंचायत चुनाव रंजिश का 2010 हत्याकांड2
17 जुलाईशामली किसान हत्याकांड4
12 अगस्तलकड़ी व्यापारी का अपहरण-हत्या1
13 अगस्त12 साल पुराना हत्या मामला4
कुल10 मामले22

इस खबर का बड़ा कानूनी सवाल

यह घटनाक्रम सिर्फ 97 केस वापस लिए जाने की खबर नहीं है। इसके साथ भारत में death penalty की न्यायिक प्रक्रिया, ‘rarest of rare’ doctrine, mitigating circumstances और trial courts द्वारा capital punishment दिए जाने की भूमिका पर भी बहस जुड़ गई है। 22 death sentences का आंकड़ा निश्चित रूप से असाधारण है, लेकिन हर मामले का अंतिम परिणाम अभी High Court और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।


मुजफ्फरनगर में 4 महीने में 22 death sentences सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के 97 लंबित मामले वापस लिए जाने से न्यायिक हलकों में सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर इसलिए क्योंकि यह प्रशासनिक फैसला 22 मृत्युदंड के फैसलों की श्रृंखला के तुरंत बाद सामने आया है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों और रिपोर्टिंग के आधार पर फिलहाल सबसे अहम तथ्य यही है कि 97 केस recall किए जाने की आधिकारिक वजह सामने नहीं आई है। इसलिए इसे सीधे जज के खिलाफ कार्रवाई या 22 death sentences का परिणाम बताना जल्दबाजी होगी। साथ ही, 22 death sentences को अंतिम फांसी नहीं समझना चाहिए। प्रत्येक मृत्युदंड के मामले में High Court confirmation और उसके बाद कानून में उपलब्ध अन्य न्यायिक उपायों की प्रक्रिया लागू होती है।