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गोरखपुर लोन फ्रॉड केस: 9 FIR और छह बैंकों तक पहुंची जांच, गरिमा सिंह पर बढ़ता आरोपों का दायरा
गोरखपुर/महराजगंज: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में सामने आया कथित लोन फ्रॉड मामला लगातार बड़ा होता जा रहा है। लोन माफ कराने और नया कर्ज दिलाने के नाम पर धोखाधड़ी के आरोपों में घिरी गरिमा सिंह और अन्य आरोपियों के खिलाफ अब तक नौ FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। ताजा मामलों में एक शिकायतकर्ता ने करीब ₹1.37 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड का आरोप लगाया है, जबकि दूसरे मामले में एक रेलवे स्टेशन अधीक्षक ने ₹45 लाख की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है।

Gorakhpur : मामले की जांच अब सिर्फ आरोपियों और कथित पीड़ितों तक सीमित नहीं है। महराजगंज के घुघली थाने में दर्ज एक FIR में छह बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम भी आरोपी के तौर पर शामिल किए गए हैं। हालांकि, उनकी भूमिका अभी जांच का विषय है और FIR में नाम शामिल होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है।
कैसे सामने आया मामला?
इस मामले की शुरुआत गोरखपुर में सामने आए एक कथित ₹1.67 करोड़ के लोन फ्रॉड से हुई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने रेलवे स्टेशन अधीक्षक ध्रुव नारायण सिंह और उनकी बेटी गरिमा सिंह को गिरफ्तार किया था। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, आरोप था कि लोगों को कर्ज से राहत दिलाने या नया पर्सनल लोन दिलाने के नाम पर उनके नाम से लोन कराया गया और रकम कथित तौर पर आरोपियों के पास चली गई। जांच के दौरान गरिमा सिंह से जुड़ी एक डायरी का भी उल्लेख कई रिपोर्टों में किया गया, जिसमें बड़ी रकम कमाने की महत्वाकांक्षा से जुड़े कथित उल्लेख बताए गए हैं। हालांकि, डायरी में लिखी बातों को स्वयं में अपराध का प्रमाण नहीं माना जा सकता; इसकी वास्तविक भूमिका जांच एजेंसियों के निष्कर्ष पर निर्भर करेगी।
डॉ. परमात्मा सिंह का मामला
मामले में सबसे गंभीर घटनाक्रम पशु चिकित्साधिकारी डॉ. परमात्मा सिंह से जुड़ा है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने गरिमा सिंह और अन्य लोगों पर करीब ₹1.40 करोड़ के लोन फ्रॉड का आरोप लगाया था। रिपोर्टों के मुताबिक, डॉक्टर ने पुलिस से शिकायत की थी कि उनके मौजूदा लोन को खत्म कराने के नाम पर उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल कर कई बैंकों से कर्ज कराया गया। मृत्यु के बाद पुलिस को एक नोट भी मिला, जिसमें कथित तौर पर गरिमा सिंह और अन्य लोगों का नाम था। इस घटना की रिपोर्टिंग NDTV, Times of India और आजतक समेत कई स्वतंत्र मीडिया संस्थानों ने की है।
डॉ. दिलीप सिंह की शिकायत में ₹1.37 करोड़ का आरोप
नए मामलों में महराजगंज के घुघली क्षेत्र के डॉ. दिलीप कुमार सिंह की शिकायत महत्वपूर्ण है। Live Hindustan के मुताबिक, उन्होंने 17 अगस्त को पुलिस को दी शिकायत में बताया कि गरिमा सिंह उनकी दूर की रिश्तेदार थीं और इसी परिचय के चलते उनके बीच विश्वास का संबंध था। शिकायत के अनुसार, गरिमा ने उनके मौजूदा कार लोन को खत्म कराने का भरोसा दिया। आरोप है कि इसी प्रक्रिया के दौरान उनके नाम पर अलग-अलग स्रोतों से करीब ₹1.37 करोड़ का लोन कराया गया। इस मामले में गरिमा सिंह समेत कई लोगों के साथ छह बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी FIR में नामजद किया गया है। FIR में जिन बैंक संस्थानों के अधिकारियों/कर्मचारियों के नाम होने की बात रिपोर्ट में कही गई है, उनमें बंधन बैंक, चोला मंडलम, यस बैंक, ICICI बैंक, Axis बैंक और HDFC बैंक शामिल हैं। यह आरोपों का हिस्सा है; संबंधित कर्मचारियों की वास्तविक भूमिका पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
रेलवे स्टेशन अधीक्षक ने लगाया ₹45 लाख की ठगी का आरोप
दूसरी नई FIR गोरखपुर के एम्स थाने में दर्ज हुई। Live Hindustan के अनुसार, स्टेशन अधीक्षक ब्रह्मानंद सिंह ने अपने नाम पर करीब ₹45 लाख की कथित धोखाधड़ी की शिकायत की।
इस मामले में गरिमा सिंह, ध्रुव नारायण सिंह और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। शिकायत में लोन से जुड़ी धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए हैं।
कितने लोगों ने शिकायत की?
अब तक सामने आई रिपोर्टों में कई सरकारी कर्मचारियों, रेलवे अधिकारियों, डॉक्टरों और शिक्षकों के नाम पीड़ितों के रूप में सामने आए हैं। अलग-अलग मामलों में कथित रकम लाखों से लेकर एक करोड़ रुपये से अधिक तक बताई गई है। अमर उजाला ने भी डॉ. दिलीप सिंह के ₹1.37 करोड़ के आरोप के साथ-साथ सरकारी शिक्षक साधना मल्ल, शिक्षक सुग्रीव सिंह, स्टेशन मास्टर ब्रह्मानंद सिंह और अन्य लोगों द्वारा लगाए गए अलग-अलग आरोपों की रिपोर्ट की है। इससे जांच एजेंसियों के सामने यह सवाल है कि क्या सभी मामलों में एक जैसा तरीका इस्तेमाल किया गया या अलग-अलग घटनाओं को एक ही नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है।
छह बैंकों की भूमिका भी जांच के दायरे में
इस केस का सबसे अहम नया पहलू बैंकिंग प्रक्रिया है। एक शिकायत में छह अलग-अलग बैंकों से कर्ज स्वीकृत होने का आरोप सामने आया है। इसी कारण FIR में संबंधित बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम भी शामिल किए गए हैं।
अब जांच में यह देखा जाएगा कि:
- लोन आवेदन किस आधार पर स्वीकार किए गए?
- दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ?
- अलग-अलग बैंकों से एक ही व्यक्ति के नाम पर कर्ज कैसे स्वीकृत हुए?
- लोन की रकम किन खातों में गई?
- क्या किसी बैंक कर्मचारी ने नियमों की अनदेखी की?
- क्या सभी आरोपों में एक जैसा तरीका अपनाया गया?
इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
क्या कुल रकम ₹12 करोड़ है?
मामले से जुड़ी कुछ हालिया रिपोर्टों में कथित धोखाधड़ी की कुल रकम करीब ₹12 करोड़ तक पहुंचने का दावा किया गया है।
लेकिन इस आंकड़े को फिलहाल अंतिम रकम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। अलग-अलग FIR और शिकायतों में अलग-अलग रकम बताई गई है और जांच अभी जारी है। इसलिए न्यूज रिपोर्ट में “करीब ₹12 करोड़ के आरोप” या “करोड़ों रुपये के कथित लोन फ्रॉड” जैसी भाषा अधिक तथ्यात्मक रहेगी।
पुलिस जांच का दायरा बढ़ा
पहले मामला कुछ शिकायतों और गिरफ्तारियों तक सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन लगातार नई FIR सामने आने के बाद जांच का दायरा बढ़ गया है। अब पुलिस को आरोपियों, कथित पीड़ितों, लोन दस्तावेजों, बैंकिंग लेन-देन और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका की जांच करनी होगी। कई स्वतंत्र रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि पुलिस को अलग-अलग लोगों से शिकायतें मिल रही हैं और आगे और पीड़ित सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
गिरफ्तारी और कानूनी स्थिति
मामले के शुरुआती चरण में गरिमा सिंह और उनके पिता ध्रुव नारायण सिंह की गिरफ्तारी की रिपोर्ट सामने आई थी। India Today ने 5 अगस्त को दोनों की गिरफ्तारी की पुष्टि की थी।
हालांकि, बाद में दर्ज हुई प्रत्येक FIR में नाम आने वाले सभी व्यक्तियों की गिरफ्तारी की पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि नौ मामलों में नामजद सभी आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। इसी तरह, आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR को अदालत द्वारा अपराध सिद्ध किए जाने के बराबर नहीं माना जा सकता। अंतिम जिम्मेदारी और दोष अदालत की प्रक्रिया के बाद ही तय होगा।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल
गोरखपुर का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायतों में केवल सीधे पैसों की ठगी का आरोप नहीं है, बल्कि लोन प्रक्रिया के इस्तेमाल का पैटर्न भी सामने आ रहा है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि एक ही नेटवर्क ने कई लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर अलग-अलग बैंकों से बड़े कर्ज हासिल किए, तो मामला केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। बैंकिंग प्रक्रिया में किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई या नहीं, यह भी जांच का अहम हिस्सा होगा।
निष्कर्ष
गोरखपुर-महराजगंज का गरिमा सिंह मामला अब नौ FIR, कई शिकायतकर्ताओं, करोड़ों रुपये के कथित लोन फ्रॉड और छह बैंकों के कर्मचारियों के नाम सामने आने के बाद गंभीर जांच के चरण में पहुंच चुका है।डॉ. परमात्मा सिंह से जुड़ा मामला इस प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू है, जबकि डॉ. दिलीप सिंह और स्टेशन अधीक्षक ब्रह्मानंद सिंह की नई शिकायतों ने कथित नेटवर्क के दायरे को और बढ़ा दिया है।
