health
कुष्ठ रोग की रोकथाम को लेकर केंद्र की बड़ी पहल: इंदौर में NLEP कार्यशाला, शुरुआती जांच और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर जोर
मध्य प्रदेश के इंदौर में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग ने 19-20 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) की समीक्षा-सह-क्षमता निर्माण कार्यशाला आयोजित की। इसमें 70 से अधिक स्वास्थ्य अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में कुष्ठ रोग की जल्द पहचान, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, समय पर इलाज, दिव्यांगता की रोकथाम और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। मध्य प्रदेश के सभी 51 जिलों के अधिकारियों ने अपने क्षेत्र के अनुभव और चुनौतियां साझा कीं।

मध्य प्रदेश के इंदौर में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम यानी NLEP को और प्रभावी बनाने के लिए 19 अगस्त 2026 को दो दिवसीय समीक्षा-सह-क्षमता निर्माण कार्यशाला शुरू हुई। इसका आयोजन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग ने किया। कार्यशाला का उद्देश्य कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम की जमीनी स्थिति की समीक्षा करने के साथ स्वास्थ्य अधिकारियों की तकनीकी क्षमता को मजबूत करना और संक्रमण को रोकने के लिए लक्षित प्रयासों को तेज करना था। इस कार्यशाला में 70 से अधिक स्वास्थ्य अधिकारियों और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसमें स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अतिरिक्त महानिदेशक, उप महानिदेशक-कुष्ठ रोग, केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग के अधिकारी, मध्य प्रदेश के राज्य कुष्ठ रोग अधिकारी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, सभी 51 जिलों के जिला कुष्ठ रोग अधिकारी, जिला सलाहकार, तकनीकी विकास साझेदार तथा RLTRI रायपुर, अस्का इंस्टीट्यूट और APAL के प्रतिनिधि शामिल रहे।
कार्यशाला में कुष्ठ रोग की मौजूदा स्थिति और राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रदर्शन की विस्तृत समीक्षा की गई। अधिकारियों ने कार्यक्रम के दौरान सामने आने वाली कमियों की पहचान करने और उन्हें दूर करने के उपायों पर चर्चा की। खास तौर पर उन क्षेत्रों और जिलों को चिन्हित करने पर जोर दिया गया जहां कुष्ठ रोग की निगरानी और नए मामलों की पहचान के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत है। कार्यशाला में कुष्ठ रोग की शुरुआती पहचान को सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में शामिल किया गया। स्वास्थ्य अधिकारियों को संभावित मामलों की जल्द पहचान और उन्हें समय पर जांच व उपचार से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, बीमारी की समय पर पहचान होने से मरीज को जल्द उपचार मिल सकता है और संक्रमण के आगे फैलने की संभावना को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। कार्यशाला में Retrospective और Reverse Contact Tracing पर तकनीकी सत्र आयोजित किया गया। इस दौरान ऐसे संभावित मामलों की पहचान के तरीकों पर चर्चा हुई जो पहले स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी से छूट गए हों। प्रभावित लोगों के संपर्कों की व्यवस्थित जांच और निगरानी के जरिए संभावित मामलों तक पहुंचने और संक्रमण के फैलाव को बेहतर तरीके से समझने पर जोर दिया गया। उप महानिदेशक-कुष्ठ रोग डॉ. सुनील वी. गिट्टे ने कार्यक्रम से जुड़े आंकड़ों के प्रभावी इस्तेमाल पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि डेटा का विश्लेषण करके उन जिलों और क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां अधिक निगरानी और लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। कार्यशाला में कुष्ठ रोग की प्रचलन दर को प्रति 10,000 आबादी पर 1 से कम रखने के लक्ष्य के लिए केंद्रित रणनीतियों पर भी चर्चा हुई।
WHO की राष्ट्रीय कार्यक्रम अधिकारी डॉ. रश्मि शुक्ला ने Leprosy Case Detection Campaign यानी LCDC की गुणवत्ता और परिणामों में सुधार को लेकर तकनीकी सत्र लिया। इसमें अभियान के दौरान संभावित मरीजों की पहचान को अधिक प्रभावी बनाने, अभियान की गुणवत्ता सुधारने और केस डिटेक्शन की प्रक्रिया को मजबूत करने से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की गई। RLTRI रायपुर के डॉ. संदीप जोगदंड ने Retrospective और Reverse Contact Tracing पर तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने संपर्कों की बेहतर निगरानी के जरिए संभावित रूप से छूटे हुए या अब तक पहचान में नहीं आए मामलों की तलाश और संक्रमण के पैटर्न को समझने के तरीकों पर चर्चा की।
कार्यशाला में मध्य प्रदेश के सभी 51 जिलों के जिला कुष्ठ रोग अधिकारियों ने भी अपने अनुभव साझा किए। अलीराजपुर, अनूपपुर, बड़वानी, बुरहानपुर और धार जैसे जिलों ने अपने क्षेत्रों में कार्यक्रम के प्रदर्शन, जमीनी चुनौतियों, प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और कुष्ठ रोग की शुरुआती पहचान एवं उपचार को मजबूत करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। इस अनुभव-साझा सत्र का उद्देश्य केवल जिलों की समस्याओं को सामने रखना नहीं था, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाई जा रही प्रभावी रणनीतियों से दूसरे जिलों को सीखने का अवसर देना भी था। इसे Peer Learning के रूप में देखा गया, जिसके जरिए सफल और दोहराए जा सकने वाले तरीकों को दूसरे क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
कार्यशाला में कुष्ठ रोग के मरीजों को समय पर उपचार शुरू कराने और उपचार पूरा कराने पर भी जोर दिया गया। अधिकारियों ने माना कि केवल नए मामलों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। मरीजों को लगातार स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़े रखना और उपचार पूरा कराना भी संक्रमण नियंत्रण की रणनीति का अहम हिस्सा है। इसके अलावा कुष्ठ रोग से जुड़ी दिव्यांगता की रोकथाम को भी महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताया गया। शुरुआती पहचान और समय पर उपचार के जरिए बीमारी से होने वाली जटिलताओं और दिव्यांगता के जोखिम को कम करने के प्रयासों पर चर्चा हुई। कार्यशाला में समुदाय की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया। APAL के उपाध्यक्ष ने शुरुआती पहचान और समुदाय स्तर पर कार्रवाई से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। चर्चा में कहा गया कि कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों के अनुभवों और सुझावों को कार्यक्रम के क्रियान्वयन में शामिल करने से जमीनी स्तर पर प्रयासों को और मजबूत किया जा सकता है।
दो दिवसीय कार्यशाला का दूसरा चरण 20 अगस्त 2026 को जारी रहा। इसमें जिला स्तर की रणनीतियों को और मजबूत करने, कार्यक्रम के क्रियान्वयन में मौजूद कमियों को दूर करने तथा संक्रमण रोकने के लिए लक्षित गतिविधियों को तेज करने पर आगे चर्चा की गई। कुल मिलाकर, इंदौर में आयोजित यह कार्यशाला कुष्ठ रोग नियंत्रण के अंतिम चरण की रणनीति को मजबूत करने की दिशा में केंद्र और राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों के बीच समन्वय बढ़ाने का प्रयास रही। जल्द पहचान, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, समय पर इलाज, दिव्यांगता की रोकथाम और मजबूत निगरानी को एक साथ आगे बढ़ाकर कुष्ठ रोग के संक्रमण को रोकने पर विशेष जोर दिया गया।
