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‘Industry’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 9 जजों में 4-4-1 की राय, 1978 के ‘Bangalore Water Supply’ टेस्ट पर गहराया मतभेद
करीब 48 साल पुराने ‘Bangalore Water Supply’ फैसले ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी, लेकिन 9 जजों की संविधान पीठ भी ‘Industry’ की परिभाषा पर पूरी तरह एकमत नहीं हो सकी। CJI Surya Kant समेत 4 जजों ने नई कानूनी कसौटी का समर्थन किया, जबकि 4 जजों ने 1978 के Triple Test को सही माना। वहीं Justice P.S. Narasimha ने पुराने फैसले को अलग कानूनी आधार पर बरकरार रखने की राय दी। ऐसे में यह फैसला Labour Law के इतिहास में एक बेहद अहम और दिलचस्प मोड़ बन गया है।

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने ‘Industry’ की कानूनी परिभाषा को लेकर दशकों पुराने विवाद पर फैसला तो सुना दिया, लेकिन इस फैसले में एक असामान्य स्थिति सामने आई है। 1978 के ऐतिहासिक Bangalore Water Supply & Sewerage Board v. A. Rajappa फैसले में तय किए गए ‘Triple Test’ को बदलने की जरूरत है या नहीं, इस सवाल पर 9 जजों की राय 4-4-1 के रूप में बंटी दिखाई देती है। यानी Chief Justice of India Surya Kant की नई कसौटी को उनके साथ तीन अन्य जजों का समर्थन मिला, जबकि चार जजों ने 1978 की व्याख्या को सही ठहराया। Justice P.S. Narasimha ने पुराने फैसले को न छेड़ने की राय अलग कानूनी आधार पर दी। यहां एक जरूरी बात यह है कि फैसले को केवल ‘नया टेस्ट बहुमत से लागू हो गया’ कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। विभिन्न रिपोर्टों में 5:4 और 6:3 जैसे बहुमत का उल्लेख भी आया है, क्योंकि संविधान पीठ के सामने केवल एक सवाल नहीं था—reference की maintainability, 1978 के फैसले की correctness और पुराने Industrial Disputes Act तथा नए Industrial Relations Code के बीच संबंध जैसे अलग-अलग मुद्दों पर जजों की राय अलग रही।
क्या था पूरा विवाद?
मामला Industrial Disputes Act, 1947 की Section 2(j) में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘Industry’ की व्याख्या से जुड़ा था। 1978 में Bangalore Water Supply & Sewerage Board v. A. Rajappa मामले में 7 जजों की संविधान पीठ ने ‘Industry’ का बेहद व्यापक अर्थ तय किया था। Justice V.R. Krishna Iyer के फैसले में तीन प्रमुख कसौटियां तय की गईं—संगठित एवं व्यवस्थित गतिविधि, employer और employee के बीच सहयोग तथा goods या services का उत्पादन/वितरण, जिसका उद्देश्य मानवीय जरूरतों और इच्छाओं की पूर्ति हो। इस Triple Test में किसी संस्था का profit कमाना जरूरी नहीं माना गया था। इसी व्यापक व्याख्या के कारण अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, क्लब, सहकारी संस्थाएं, शोध संस्थान, charitable undertakings और कई सरकारी गतिविधियां भी परिस्थितियों के अनुसार ‘industry’ के दायरे में आ सकती थीं।
CJI Surya Kant की अगुवाई में नया टेस्ट क्या है?
CJI Surya Kant और उनके साथ Justice Satish Chandra Sharma, Justice Alok Aradhe तथा Justice Vipul M. Pancholi ने माना कि 1978 का Triple Test अपनी मूल संरचना में अत्यधिक व्यापक हो गया था और इसे statutory boundaries के भीतर लाने की जरूरत है।
नए formulation में तीन बुनियादी तत्व रखे गए हैं—
गतिविधि systematic और organised हो।
उसमें employer और employee के बीच cooperation हो।
goods या services का production, distribution या provision ऐसी discernible commercial character वाली गतिविधि हो, जो trade या business के समान हो और material human wants तथा wishes को पूरा करने के लिए हो।
हालांकि नए टेस्ट में भी केवल profit motive की मौजूदगी को निर्णायक नहीं बनाया गया है। असली जोर activity की प्रकृति और employer-employee relationship पर रहेगा।
चार जजों ने क्यों नहीं माना कि 1978 का फैसला बदला जाए?
Justice B.V. Nagarathna, Justice Dipankar Datta, Justice Ujjal Bhuyan और Justice Joymalya Bagchi ने 1978 के Bangalore Water Supply फैसले की मूल व्याख्या को बरकरार रखा। Justice Nagarathna ने कहा कि पुराने फैसले में हस्तक्षेप या modification की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार Triple Test और dominant-nature test आज भी Industrial Disputes Act की Section 2(j) की सही व्याख्या करते हैं। Justice Dipankar Datta ने भी दशकों से चले आ रहे settled legal position को दोबारा खोलने पर सवाल उठाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि करीब 48 वर्षों तक Bangalore Water Supply judgment ने कानून के क्षेत्र में अपनी जगह बनाए रखी। Justice Joymalya Bagchi ने भी merits पर 1978 के फैसले को सही माना, हालांकि reference की validity और पुराने कानून के समाप्त हो जाने के बाद उसके प्रभाव को लेकर उनका reasoning अलग था।
Justice P.S. Narasimha की राय क्यों अलग है?
Justice P.S. Narasimha ने Bangalore Water Supply को disturb नहीं करने का निष्कर्ष निकाला, लेकिन उनका आधार बाकी चार जजों से अलग था। उन्होंने ध्यान दिलाया कि Industrial Disputes Act अब repeal हो चुका है और 21 नवंबर 2025 से Industrial Relations Code, 2020 लागू हो चुका है। ऐसे में पुराने कानून की व्याख्या को फिर से खोलने की व्यावहारिक जरूरत सीमित हो गई है।
नए Industrial Relations Code पर क्या असर होगा?
यह इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 1978 के Bangalore Water Supply judgment की व्याख्या को Industrial Relations Code, 2020 की ‘Industry’ definition को interpret करने के लिए सीधे इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। नए Code की अपनी statutory language और context के आधार पर व्याख्या की जाएगी। इसका अर्थ यह है कि पुराने Industrial Disputes Act के तहत आने वाले मामलों और वर्तमान Industrial Relations Code के तहत आने वाले विवादों को एक ही कसौटी पर नहीं देखा जाएगा।
पुराने लंबित मामलों का क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नए formulation का प्रभाव पुराने मामलों पर पीछे की तारीख से नहीं पड़ेगा। Industrial Disputes Act, 1947 से जुड़े pending proceedings और concluded matters को नए test के कारण दोबारा नहीं खोला जाएगा। यानी जिस समय कोई विवाद पुराने Industrial Disputes Act के तहत विचाराधीन था, उस पर लागू कानूनी स्थिति को अचानक नए test से बदलने का रास्ता नहीं खोला गया है।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
यह विवाद State of Uttar Pradesh v. Jai Bir Singh मामले से जुड़ा था। मामला मूल रूप से 2002 की appeal से सामने आया था। 2005 में 5 जजों की पीठ ने Bangalore Water Supply फैसले को बड़ी पीठ के सामने रखने की जरूरत महसूस की। इसके बाद 2017 में 7 जजों की पीठ ने इसे 9 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा, क्योंकि 1978 का मूल फैसला भी 7 जजों की पीठ ने दिया था। मार्च 2026 में CJI Surya Kant की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने इस reference पर सुनवाई की। पीठ ने 19 मार्च 2026 को फैसला सुरक्षित रखा और 20 अगस्त 2026 को verdict सुनाया।
1978 के फैसले का महत्व क्या था?
Bangalore Water Supply judgment को भारतीय Labour Law के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में गिना जाता है। इसने ‘industry’ की परिभाषा को केवल पारंपरिक commercial factories या profit-making businesses तक सीमित नहीं रखा। Employer-employee relationship और organised activity को महत्व देते हुए कई गैर-पारंपरिक संस्थानों तक labour protections का दायरा पहुंचाया गया। यही वजह है कि करीब पांच दशक बाद इस interpretation की दोबारा समीक्षा को labour law के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया।
सरकार और सरकारी संस्थानों के लिए क्या बदलेगा?
CJI Surya Kant की formulation के अनुसार केवल यह तथ्य कि कोई activity सरकार द्वारा संचालित है और पारंपरिक अर्थ में ‘sovereign function’ नहीं है, अपने-आप उसे ‘industry’ नहीं बना देगा। सरकारी गतिविधि की प्रकृति, उसका commercial या economic character और statutory/constitutional framework भी देखा जाएगा।
इससे welfare-oriented governmental activities और genuinely commercial government enterprises के बीच अंतर करने पर भविष्य में अधिक जोर आने की संभावना है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला भारतीय Labour Law में एक महत्वपूर्ण transition को दिखाता है। एक तरफ 1978 का worker-protective और expansive approach है, वहीं दूसरी तरफ बदलते economic और statutory framework में ‘industry’ की सीमा को अधिक स्पष्ट और सीमित करने की कोशिश दिखाई देती है। सबसे अहम बात यह है कि 1978 के फैसले की correctness पर 9 जजों की पीठ में पूर्ण सहमति नहीं बनी। CJI की नई formulation को चार जजों का समर्थन मिला, चार जजों ने पुराने interpretation को सही माना और Justice Narasimha ने अलग reasoning के आधार पर पुराने फैसले को disturb न करने की बात कही। इसलिए इस फैसले को केवल ‘सुप्रीम कोर्ट ने 1978 का Triple Test खत्म कर दिया’ कहना सही नहीं होगा। असल तस्वीर कहीं अधिक nuanced है—पुराने Industrial Disputes Act के लिए 1978 की व्याख्या का प्रभाव बना हुआ है, जबकि नए Industrial Relations Code के लिए अदालत ने अलग statutory framework अपनाने का रास्ता साफ किया है।
