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गृहिणियों के अधिकार से लेकर लिव-इन रिश्तों की सुरक्षा तक: जस्टिस संजय करोल के वो फैसले, जिन्होंने कानून से आगे समाज को भी छुआ
सुप्रीम कोर्ट से विदा हुए जस्टिस संजय करोल की पहचान सिर्फ एक जज के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे न्यायाधीश के रूप में भी बनी, जिन्होंने अदालत में आए छोटे से विवाद में छिपे बड़े सामाजिक सवाल को पहचानने की कोशिश की। गृहिणियों के वर्षों के unpaid घरेलू काम को आर्थिक मूल्य देने से लेकर शादी जैसे स्वरूप वाले लिव-इन रिश्तों में महिलाओं की सुरक्षा, चुनावों में काले धन पर शिकंजा, आवारा पशुओं से होने वाली मौतों और रेलवे की बेतहाशा भीड़ तक—उनके कई फैसलों में न्याय के साथ सामाजिक बदलाव की स्पष्ट झलक दिखाई दी। 22 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट से उनकी विदाई के बाद उनके ये फैसले उनकी ऐसी न्यायिक विरासत के रूप में सामने हैं, जिनका असर कोर्टरूम से निकलकर आम जिंदगी तक पहुंचता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल 22 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त हो गए। सुप्रीम कोर्ट में साढ़े तीन साल से अधिक और संवैधानिक अदालतों में 19 साल से ज्यादा के न्यायिक करियर के बाद विदा हुए जस्टिस करोल अपने पीछे 270 से अधिक फैसलों की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिनमें कई बार अदालत ने सिर्फ सामने मौजूद विवाद का निपटारा नहीं किया, बल्कि उससे जुड़े बड़े सामाजिक और संस्थागत सवालों पर भी हस्तक्षेप किया। उनके फैसलों में महिलाओं के unpaid domestic work को आर्थिक पहचान देने से लेकर शादी जैसे स्वरूप वाले live-in relationships में महिलाओं को आपराधिक कानून की सुरक्षा, चुनावों में काले धन पर रोक, आवारा पशुओं से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और रेलवे में यात्रियों की सुरक्षा तक कई ऐसे मुद्दे शामिल हैं, जिनका असर litigants से कहीं आगे तक जाता है।
1. Homemakers का घरेलू काम भी आर्थिक योगदान: ₹30,000 प्रति माह का मूल्यांकन
जस्टिस करोल के सबसे चर्चित फैसलों में से एक Shishu Pal @ Shish Ram & Ors. v. Surjeet & Ors. है। 11 जून 2026 के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने homemaker की मृत्यु के बाद परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को compensation में अलग और स्वतंत्र head के रूप में मान्यता दी। कोर्ट ने homemaker के घरेलू योगदान का न्यूनतम मूल्यांकन ₹30,000 प्रति माह तय किया और कहा कि इस राशि में हर तीन वर्ष में 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी। यह राशि उन मामलों में notional monthly income के रूप में भी काम कर सकती है जहां homemaker की वास्तविक आय साबित नहीं है। जस्टिस करोल ने इस सोच को रेखांकित किया कि घर संभालने वाली महिला को केवल इसलिए dependent कहना उचित नहीं है क्योंकि उसे प्रत्यक्ष वेतन नहीं मिलता। घरेलू काम परिवार की आर्थिक और सामाजिक संरचना में वास्तविक योगदान देता है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने unpaid domestic labour को compensation law के भीतर अधिक स्पष्ट आर्थिक पहचान दी।
2. Live-in relationship में भी महिलाओं को Section 498A की सुरक्षा
Dr. Lokesh B.H. & Ors. v. State of Karnataka & Anr. में सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या Section 498A IPC की सुरक्षा उस महिला को भी मिल सकती है जो औपचारिक विवाह के बजाय ऐसे live-in relationship में रह रही है जो “relationship in the nature of marriage” की श्रेणी में आता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस Nongmeikapam Kotiswar Singh की पीठ ने 3 अगस्त 2026 को कहा कि ऐसी परिस्थितियों में Section 498A का संरक्षण लागू हो सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर live-in relationship अपने आप Section 498A के दायरे में नहीं आ जाएगा; relationship का स्वरूप और उसमें marriage का intent महत्वपूर्ण होगा। कोर्ट ने इस व्याख्या को Article 14 और Article 21 के तहत equality, dignity, autonomy और partner चुनने की स्वतंत्रता से भी जोड़ा। यानी सिर्फ इसलिए कि किसी महिला का रिश्ता औपचारिक विवाह के रूप में solemnise नहीं हुआ, उसे घरेलू cruelty से कानूनी सुरक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता।
3. चुनाव में Black Money: लोकतंत्र की जड़ पर हमला
State of Karnataka & Anr. v. Prathik Parasrampuria में जस्टिस करोल ने चुनावों में unaccounted cash के इस्तेमाल को केवल चुनावी उल्लंघन नहीं माना, बल्कि free and fair elections और लोकतंत्र की बुनियाद से जोड़कर देखा। 17 अगस्त 2026 को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस Nongmeikapam Kotiswar Singh की पीठ ने चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर कई व्यापक निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए unaccounted cash का इस्तेमाल free and fair elections की जड़ पर चोट करता है। फैसले में चुनाव से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच और सुनवाई को समयबद्ध करने तथा चुनावी cycle के दौरान candidates के खिलाफ prosecution वापस लेने से पहले High Court की मंजूरी जैसी safeguards पर भी जोर दिया गया। इस फैसले की खासियत यह रही कि अदालत ने एक individual dispute के बजाय electoral process में money power की व्यापक समस्या को address किया।
4. आवारा पशु: Compensation से आगे Public Safety का सवाल
Nisha v. Municipal Council, Sangrur में मामला सड़क पर आवारा पशु से हुई घातक घटना और compensation से जुड़ा था। लेकिन जस्टिस करोल की पीठ ने इसे केवल एक परिवार के compensation claim तक सीमित नहीं रखा। सुप्रीम कोर्ट ने stray cattle से होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों को public safety का गंभीर मुद्दा माना और राज्यों को victims के लिए compensation mechanism तथा आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए व्यापक कदम उठाने की दिशा में कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ₹15 लाख compensation भी दिया। यहां जस्टिस करोल का दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है—अदालत के सामने आया एक accident claim भविष्य में होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने की व्यवस्था पर चर्चा का आधार बन गया।
5. Railway overcrowding: यात्री की सुरक्षा और ‘Second Class’ शब्द पर सवाल
Lata v. Union of India में रेलवे में overcrowding और moving trains से गिरकर यात्रियों की मौत से जुड़ा मामला सामने आया। पीठ ने रेलवे को overcrowding रोकने और passenger safety के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत बताई। लेकिन जस्टिस करोल की सोच यहां भी तत्काल विवाद से आगे गई। कोर्ट ने रेलवे में इस्तेमाल होने वाले “second class passenger” शब्द पर भी सवाल उठाया और सुझाव दिया कि class distinction coach से जुड़ा होना चाहिए, passenger की पहचान से नहीं। यानी मामला सिर्फ भीड़ कम करने का नहीं रहा, बल्कि अदालत ने भाषा और सामाजिक गरिमा के पहलू को भी judicial scrutiny का हिस्सा बनाया।
6. सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए Insurance व्यवस्था मजबूत करने की कोशिश
जस्टिस करोल के एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में uninsured vehicles की बड़ी संख्या को लेकर चिंता जताई गई। अदालत ने नए cars के लिए third-party motor insurance की अवधि चार साल और नए two-wheelers के लिए छह साल करने का निर्देश दिया। कोर्ट के सामने यह चिंता थी कि uninsured vehicle से दुर्घटना होने पर पीड़ितों को compensation हासिल करने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फैसले में IRDAI और Ministry of Road Transport & Highways को एक pilot project तैयार करने का निर्देश भी दिया गया, जिसके तहत petrol pumps पर vehicle की insurance status की जांच की व्यवस्था पर विचार किया जा सके।
7. Dowry Death Cases: सिर्फ अपराध नहीं, सामाजिक समस्या भी
दहेज मृत्यु से जुड़े मामलों में भी जस्टिस करोल ने न्यायिक प्रक्रिया को broader social reform के नजरिए से देखा। ऐसे मामलों में उन्होंने दहेज की सामाजिक जड़ों और marriage में equality की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने युवा पीढ़ी को विवाह में equality और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। लंबे समय से लंबित मामलों, विशेषकर पांच साल से ज्यादा पुराने मामलों, को प्राथमिकता देने की दिशा में भी निर्देश दिए गए।
8. Fake Sureties और Bail System: व्यक्तिगत केस से Systemic Reform तक
Union of India v. Chidiebere Kingsley Nawchara & Ors. में मामला foreign nationals, NDPS offences और bail proceedings में alleged fake sureties तथा impersonation से जुड़ा था। जस्टिस करोल की पीठ ने इसे केवल संबंधित accused की bail controversy तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने fake sureties और impersonation की संभावित systemic समस्या को देखते हुए institutional safeguards की जरूरत पर जोर दिया और commercial quantity वाले narcotics offences में foreign nationals की bail से जुड़े व्यापक safeguards पर दिशा-निर्देश दिए।
जस्टिस संजय करोल की न्यायिक शैली में क्या खास रहा?
जस्टिस करोल के इन फैसलों को एक साथ देखने पर उनकी judicial approach की एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। कई मामलों में उन्होंने पूछा कि अदालत के सामने आया विवाद केवल उस व्यक्ति का मामला है या उसके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था है, जो हजारों-लाखों लोगों को प्रभावित कर सकती है। कहीं homemaker के unpaid work को आर्थिक पहचान मिली, कहीं live-in relationship में महिला की dignity और protection का सवाल उठा, तो कहीं चुनावी black money, stray cattle, railway safety और fake sureties जैसे मुद्दों पर institutional directions दिए गए। यही वजह है कि उनके कई फैसले केवल case law नहीं, बल्कि व्यापक social and institutional interventions के रूप में भी देखे जा रहे हैं। Supreme Court Observer ने भी उनके कार्यकाल को nationwide directions और proportionality जैसे व्यापक न्यायिक मुद्दों से जोड़ते हुए उनकी notable judgments को रेखांकित किया है।
22 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस संजय करोल की विदाई के साथ उनका न्यायिक कार्यकाल समाप्त हो गया, लेकिन उनके कई फैसले आगे भी बहस और कानून की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। खास तौर पर homemakers के unpaid work की आर्थिक पहचान और marriage-like live-in relationships में महिलाओं की कानूनी सुरक्षा जैसे फैसले बदलते सामाजिक ढांचे के साथ कानून के तालमेल का उदाहरण पेश करते हैं।
उनकी न्यायिक विरासत का एक बड़ा संदेश यही दिखाई देता है—अदालत में आया विवाद केवल दो पक्षों के बीच का मामला नहीं होता; कई बार उसके पीछे पूरी व्यवस्था और समाज से जुड़ा बड़ा सवाल छिपा होता है।
