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चीनी के दाम बढ़ने की पूरी कहानी: यूपी में घटा गन्ने का रकबा, उत्पादन 14% नीचे; बीमारी, मौसम और कम स्टॉक ने बढ़ाई कीमत
देश में चीनी की कीमतों में पिछले एक महीने में तेज बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई को चीनी की औसत खुदरा कीमत ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त 2026 को बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। यानी करीब 15.6% की बढ़ोतरी हुई। इस तेजी के पीछे सिर्फ गन्ने से किसानों का रुझान बदलना या ethanol production नहीं है, बल्कि कम चीनी उत्पादन, गन्ने की फसल में बीमारी और मौसम का असर, घटते स्टॉक, त्योहारी मांग, वैश्विक सप्लाई में कमी और कुछ कारोबारियों द्वारा जमाखोरी/सट्टेबाजी जैसे कई कारण हैं। उत्तर प्रदेश इस पूरे मामले का अहम केंद्र है। राज्य में गन्ने का रकबा 2023-24 के 29.66 लाख हेक्टेयर से घटकर 2025-26 में 28.61 लाख हेक्टेयर रह गया। इसी अवधि में चीनी उत्पादन 104.13 लाख टन से घटकर 89.52 लाख टन हो गया। यानी तीन साल में उत्पादन में करीब 14% की गिरावट आई।

यूपी में घटा गन्ने का रकबा
उत्तर प्रदेश में पिछले तीन वर्षों में गन्ने की खेती के क्षेत्र में लगातार कमी दर्ज की गई है। 2023-24 में राज्य में करीब 29.66 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती हुई थी। 2024-25 में यह रकबा 29.51 लाख हेक्टेयर और 2025-26 में घटकर 28.61 लाख हेक्टेयर रह गया।इस तरह तीन साल में गन्ने का रकबा करीब 1.05 लाख हेक्टेयर घटा है। यह करीब 3.5% की कमी है। हालांकि, सिर्फ रकबे में कमी से चीनी उत्पादन में आई पूरी गिरावट को समझना संभव नहीं है। उत्पादन में गिरावट रकबा घटने के मुकाबले कहीं ज्यादा रही है।
चीनी उत्पादन 104 लाख टन से घटकर 89.52 लाख टन
यूपी में 2023-24 में चीनी उत्पादन करीब 104.13 लाख टन था। 2024-25 में यह घटकर 92.45 लाख टन और 2025-26 में 89.52 लाख टन रह गया। 2025-26 के crushing season में राज्य की 121 चीनी मिलों ने करीब 878.12 लाख टन गन्ने की पेराई की और 89.52 लाख टन चीनी का उत्पादन किया। यानी तीन साल में यूपी का चीनी उत्पादन करीब 14% कम हुआ। यही गिरावट घरेलू supply पर दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल है।
बीमारी और मौसम ने भी गन्ने को नुकसान पहुंचाया
गन्ने का रकबा घटना इस कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। गन्ने की उत्पादकता पर भी बीमारी और मौसम का असर पड़ा है। Red Rot और Top Borer जैसी बीमारियों के अलावा अत्यधिक बारिश और खेतों में waterlogging ने कई क्षेत्रों में फसल को नुकसान पहुंचाया। केंद्र सरकार ने भी मौजूदा चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान में बड़ी कटौती के पीछे crop diseases और excessive rainfall को प्रमुख वजहों में शामिल किया है। यही वजह है कि कम रकबे के साथ-साथ प्रति हेक्टेयर उत्पादन और कुल गन्ना पेराई में भी गिरावट आई, जिसका सीधा असर चीनी उत्पादन पर पड़ा।
मक्का और धान की ओर बढ़ा रुझान
इसी अवधि में यूपी में मक्का और धान का उत्पादन बढ़ा है। मक्का का उत्पादन 2023-24 के करीब 18.20 लाख टन से बढ़कर 2025-26 में 22.80 लाख टन पहुंच गया। वहीं धान का उत्पादन करीब 159.90 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 170.50 लाख मीट्रिक टन हुआ। इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य की कृषि व्यवस्था में फसल पैटर्न में बदलाव हो रहा है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह साबित नहीं करते कि सभी किसानों ने सिर्फ चीनी की कीमतों या गन्ने से मोहभंग के कारण गन्ना छोड़कर मक्का और धान अपनाया है। इसलिए इसे किसानों के बदलते फसल रुझान के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
देश में चीनी उत्पादन का अनुमान भी घटा
समस्या सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार ने 2025-26 sugar season के लिए देश के चीनी उत्पादन का अनुमान शुरुआती करीब 343 लाख मीट्रिक टन से घटाकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन कर दिया है। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में करीब 11% की कमी है। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में मौसम और फसल संबंधी समस्याओं का असर राष्ट्रीय उत्पादन पर भी पड़ा है। इससे बाजार में उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ा है।
क्या ethanol production चीनी महंगी होने की वजह है?
चीनी की कीमत बढ़ने के बीच ethanol को लेकर भी चर्चा तेज हुई है, लेकिन केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है कि मौजूदा price rise मुख्य रूप से ethanol production के लिए चीनी divert किए जाने की वजह से है। सरकार के मुताबिक ethanol के लिए sugar diversion का हिस्सा 2022-23 के करीब 12% से घटकर 2025-26 में करीब 9% रह गया है। साथ ही देश में बनने वाले ethanol का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब grains, खासकर maize, से आता है। इसलिए चीनी की मौजूदा महंगाई को सिर्फ ethanol policy से जोड़ना सही नहीं होगा।
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई मांग
अगस्त से नवंबर के बीच देश में त्योहारों का सीजन शुरू हो जाता है। Ganesh Chaturthi से लेकर Dussehra और Diwali तक मिठाइयों और खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ती है।ऐसे समय में अगर उत्पादन और बाजार में उपलब्ध स्टॉक पहले से कम हो, तो मांग बढ़ने का असर कीमतों पर ज्यादा तेजी से पड़ सकता है। सरकार और बाजार विश्लेषणों ने festive demand को भी मौजूदा price pressure का एक कारण बताया है।
एक महीने में करीब 16% महंगी हुई चीनी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत ₹48.18 प्रति किलो थी। 20 अगस्त को यह बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई।
यानी एक महीने में करीब ₹7.52 प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई, जो लगभग 15.6% है। इसका असर मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वालों पर भी पड़ रहा है। त्योहारी सीजन में उत्पादन लागत बढ़ने से मिठाइयों और दूसरे sugar-based products की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है।
वैश्विक बाजार में भी सप्लाई का दबाव
घरेलू उत्पादन में कमी के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की उपलब्धता को लेकर दबाव है। केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए वैश्विक स्तर पर करीब 33 लाख टन का sugar deficit अनुमानित किया है।वैश्विक कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है। इससे घरेलू बाजार में आयात और supply management की जरूरत बढ़ी है।
जमाखोरी पर सरकार की नजर
सरकार ने यह भी कहा है कि कुछ हिस्सों में speculation और hoarding यानी जमाखोरी ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। इससे पहले 1 अगस्त से चीनी dealers के लिए stock holding limit लागू की गई थी।केंद्र ने 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक dealers के लिए 400 टन की stock limit लागू की है। इसका उद्देश्य excessive stockpiling और speculative trading को रोकना है।इसके अलावा bulk consumers के लिए भी सितंबर से stock रखने की सीमा तय की गई है। 1 सितंबर से 30 नवंबर तक 10 टन से ज्यादा मासिक खपत वाले bulk consumers को अधिकतम 15 दिनों की जरूरत के बराबर stock रखने की अनुमति होगी।
सरकार ने 10 लाख टन duty-free raw sugar import की अनुमति दी
कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू supply बढ़ाने के लिए केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन raw sugar के duty-free import की अनुमति दी है।
यह कदम करीब एक दशक बाद भारत की sugar import policy में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में अतिरिक्त supply लाना और festive season से पहले कीमतों पर दबाव कम करना है।
चीनी मिलों में stock verification
सरकार ने चीनी मिलों के stock की physical verification भी शुरू की है। Central और State Government की संयुक्त टीमें उपलब्ध stock की जांच कर रही हैं, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने या जमाखोरी की संभावना को रोका जा सके।इसके साथ ही राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर 2026 से नया crushing season शुरू करने की दिशा में तैयारी करने को कहा गया है, जिससे नई फसल की चीनी जल्द बाजार में आ सके।
किसानों को भुगतान की स्थिति
चीनी के उत्पादन में गिरावट के बावजूद किसानों के गन्ना भुगतान की स्थिति भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। केंद्र के अनुसार 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 season के करीब 97% sugarcane dues का भुगतान किया जा चुका था। इसलिए मौजूदा स्थिति को सीधे तौर पर किसानों के भुगतान संकट से जोड़ना सही नहीं होगा।
आखिर चीनी महंगी क्यों हो रही है?
पूरी तस्वीर देखें तो चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी किसी एक वजह का परिणाम नहीं है।
यूपी में गन्ने का रकबा कम हुआ है और चीनी उत्पादन 104.13 लाख टन से घटकर 89.52 लाख टन हुआ है। इसके साथ Red Rot, Top Borer, अत्यधिक बारिश और waterlogging जैसी समस्याओं ने फसल को नुकसान पहुंचाया। राष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी उत्पादन का अनुमान 343 LMT से घटकर करीब 306 LMT रह गया है। दूसरी तरफ त्योहारी सीजन में मांग बढ़ रही है, घरेलू stocks पर दबाव है और वैश्विक बाजार में भी supply tightness है। कुछ हिस्सों में hoarding और speculation ने कीमतों को और बढ़ाया है। इसलिए “किसानों का गन्ने से मोहभंग” इस कहानी का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन चीनी महंगी होने का अकेला या मुख्य कारण बताना सही नहीं होगा। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर कम उत्पादन, फसल नुकसान, कम stocks और बढ़ती मांग को मौजूदा price rise की बड़ी वजहों के रूप में देखना ज्यादा सटीक है।
आगे क्या होगा?
सरकार की duty-free imports, stock limits, physical verification और नए crushing season की शुरुआत जैसे कदमों का उद्देश्य supply बढ़ाकर कीमतों पर दबाव कम करना है। अगर imported sugar और नई पेराई से बाजार में पर्याप्त supply आती है, तो आने वाले महीनों में कीमतों पर कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, festive demand और घरेलू उत्पादन की वास्तविक स्थिति यह तय करेगी कि कीमतें कितनी जल्दी स्थिर होती हैं।
