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रेप पीड़िता का नाम याचिका में कैसे आया? J&K हाईकोर्ट ने Registry से मांगा जवाब, Justice Shahzad Azeem ने उठाया बड़ा सवाल
रेप पीड़िता की पहचान उजागर न हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट दिशानिर्देश जारी कर चुके हैं। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के सामने ऐसी याचिका पहुंची, जिसमें कथित रेप पीड़िता का नाम ही दर्ज था। मामले की सुनवाई के दौरान Justice Shahzad Azeem ने इस पर गंभीर सवाल उठाते हुए Registry से जवाब मांगा कि स्पष्ट निर्देश और सर्कुलर मौजूद होने के बावजूद ऐसी याचिका को Registry ने entertain कैसे किया? कोर्ट का यह सवाल सिर्फ एक दस्तावेज में नाम आने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ित की निजता और पहचान की सुरक्षा के लिए तय institutional safeguards के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

रेप पीड़िता की पहचान की गोपनीयता को लेकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है। एक याचिका में पीड़िता/शिकायतकर्ता का नाम उजागर होने के बाद Justice Shahzad Azeem ने हाईकोर्ट की Registry से स्पष्टीकरण मांग लिया कि जब इस संबंध में पहले से स्पष्ट judicial directions और circulars जारी हैं, तो ऐसी याचिका अदालत के सामने दाखिल होकर entertain कैसे हो गई। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने भी rape victims की पहचान उजागर किए जाने पर चिंता जताते हुए सभी High Courts के Registrars General को लंबित मामलों में पहचान न उजागर करने के कानूनी निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा था।
18 अगस्त को क्या हुआ?
मामला 18 अगस्त 2026 को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के समक्ष Justice Shahzad Azeem की पीठ के सामने आया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिका में respondent no. 2 यानी rape victim/complainant का नाम सामने आ गया था। Justice Shahzad Azeem ने इस स्थिति को देखते हुए Registry से explanation मांगना जरूरी समझा। कोर्ट का सवाल मूल रूप से यह था कि जब पीड़िता की पहचान उजागर न करने को लेकर पहले से repeated directions और circulars मौजूद हैं, तो फिर इस तरह की याचिका Registry के स्तर पर कैसे entertain हुई। कुछ समय तक दलीलें सुनने के बाद petitioner की ओर से पेश counsel ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। हाईकोर्ट ने petition withdraw करने की अनुमति दे दी।
कोर्ट का असली सवाल Registry पर क्यों उठा?
इस मामले में हाईकोर्ट ने फिलहाल किसी व्यक्ति पर जुर्माना या कोई अन्य दंड लगाने का आदेश नहीं दिया है। मुख्य सवाल Registry की scrutiny और filing process से जुड़ा है। यानी अदालत यह जानना चाहती है कि sensitive sexual-offence matter में victim की पहचान उजागर करने वाली याचिका court record का हिस्सा कैसे बनी, जबकि identity protection को लेकर पहले से स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं। यही वजह है कि इस मामले में Registry से explanation मांगा गया है।
मार्च 2026 में Supreme Court ने भी Registries को चेताया था
J&K हाईकोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी rape victim की identity के disclosure को लेकर गंभीर चिंता जताई थी।
Supreme Court ने सभी High Courts के Registrars General को निर्देश दिया था कि पुराने लंबित मामलों में भी victim की पहचान न उजागर करने से संबंधित कानूनी prohibition का सख्ती से पालन कराया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह कानून में लंबे समय से स्थापित स्थिति है, फिर भी इसका पालन लगातार नहीं हो रहा है।
इस निर्देश का सीधा संबंध J&K हाईकोर्ट के मौजूदा मामले से दिखाई देता है, क्योंकि यहां भी सवाल यही है कि identity-protection के लिए मौजूद safeguards के बावजूद victim का नाम petition में कैसे आ गया।
Nipun Saxena केस ने तय किया था बड़ा कानूनी सिद्धांत
Rape victim की पहचान की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला Nipun Saxena v. Union of India है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि rape victim का नाम या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित या disclose नहीं की जानी चाहिए जिससे उसकी पहचान सार्वजनिक रूप से स्थापित हो सके। Court ने print, electronic और social media समेत विभिन्न माध्यमों में identity disclosure पर रोक के व्यापक सिद्धांत को स्पष्ट किया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि victim की पहचान उजागर किए बिना भी public awareness या social campaign चलाया जा सकता है। यानी किसी sexual-offence survivor को सार्वजनिक प्रतीक बनाने के लिए उसकी पहचान सामने लाना जरूरी नहीं है।
Court records में भी victim की पहचान सुरक्षित रखना जरूरी
Nipun Saxena का महत्व केवल media reporting तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन authorities के पास investigation या court proceedings के दौरान victim की पहचान आती है, उनकी भी जिम्मेदारी है कि वे नाम और पहचान को secret रखें और उसे अनावश्यक रूप से disclose न करें।
यही सिद्धांत Registry के स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि petition में victim की पहचान मौजूद है, तो filing और listing की प्रक्रिया में identity protection के safeguards का पालन करना जरूरी है।
J&K High Court पहले भी दे चुका है ऐसे निर्देश
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट पहले भी rape survivors की identity protection को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। State of J&K v. Mohd. Imran Khan मामले में हाईकोर्ट ने rape survivors की पहचान को proceedings और judgments में disclose न करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। उस समय हाईकोर्ट ने Supreme Court के established principles को ध्यान में रखते हुए sexual-offence victims की privacy और dignity की सुरक्षा पर जोर दिया था।
2024 में भी High Court ने identity disclosure पर आपत्ति जताई थी
यह मुद्दा केवल J&K तक सीमित नहीं है। विभिन्न High Courts ने court filings और affidavits में भी prosecutrix का नाम सामने आने पर आपत्ति जताई है। उदाहरण के तौर पर Orissa High Court ने 2024 के एक मामले में affidavit में prosecutrix का नाम और अन्य details दिए जाने को Supreme Court के directions के विपरीत माना था। Court ने Nipun Saxena के सिद्धांतों का हवाला देते हुए victim की पहचान सुरक्षित रखने के निर्देश दिए थे। इससे स्पष्ट है कि identity protection का सिद्धांत केवल media reports के लिए नहीं, बल्कि न्यायिक रिकॉर्ड और court proceedings के लिए भी महत्वपूर्ण है।
Supreme Court का 2026 का सख्त संदेश
मार्च 2026 में Supreme Court ने एक rape case में victim की पहचान के disclosure को लेकर “strongest terms” में आपत्ति जताई और High Courts को यह सुनिश्चित करने को कहा कि survivors तथा उनके परिवार के सदस्यों की पहचान court orders में भी अनावश्यक रूप से सामने न आए। इस घटनाक्रम को कई प्रमुख कानूनी रिपोर्टिंग प्लेटफॉर्म्स ने प्रमुखता से रिपोर्ट किया। यानी अब न्यायपालिका का संदेश काफी स्पष्ट है—rape survivor की पहचान की सुरक्षा केवल एक सामान्य procedural सावधानी नहीं, बल्कि established legal obligation है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
अब मुख्य प्रश्न Registry की explanation का है। हाईकोर्ट यह जानना चाहता है कि मौजूदा directions और circulars के बावजूद petition में victim का नाम होने के बाद भी filing process में इसे कैसे entertain किया गया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, petitioner ने सुनवाई के दौरान petition वापस लेने की अनुमति मांगी थी और कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। इसलिए फिलहाल इस मामले का प्रमुख judicial development Registry से explanation मांगना है।
क्यों महत्वपूर्ण है J&K High Court का यह कदम?
इस आदेश का महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि अदालत ने केवल उस व्यक्ति के conduct पर ध्यान नहीं दिया जिसने petition में victim का नाम disclose किया, बल्कि Registry की institutional responsibility पर भी सवाल उठाया। यह एक महत्वपूर्ण judicial message है कि victim privacy की सुरक्षा filing से लेकर final judgment तक पूरी judicial process की जिम्मेदारी है। रेप पीड़िता को न्याय दिलाना केवल आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं है। उसकी पहचान, निजता और गरिमा को सुरक्षित रखना भी न्यायिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। J&K हाईकोर्ट का यह कदम इसी principle को दोहराता है—जब identity protection को लेकर पहले से स्पष्ट judicial safeguards मौजूद हैं, तो उनके उल्लंघन को court registry के स्तर पर भी गंभीरता से देखा जाएगा।
