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44 साल तक चलता रहा हत्या का केस, 22 साल ट्रायल और 22 साल अपील में! झारखंड हाईकोर्ट की ‘शॉकिंग पेंडेंसी’ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
एक हत्या का मुकदमा… और इंसाफ की तलाश में बीत गए पूरे 44 साल! 1981 में शुरू हुआ दोहरे हत्याकांड का मामला पहले करीब 22 साल ट्रायल कोर्ट में चलता रहा और फिर उतने ही लंबे समय तक अपील हाईकोर्ट में लंबित रही। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो तस्वीर और भी गंभीर थी—70 वर्षीय Simon Soren इस केस में बचे अकेले जीवित आरोपी थे। झारखंड हाईकोर्ट में अपील के 22 साल तक लंबित रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘शॉकिंग पेंडेंसी’ पर कड़ी चिंता जताई और कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में इतनी लंबी देरी स्वीकार्य नहीं हो सकती। अदालत ने फिलहाल सजा पर रोक लगाते हुए Simon Soren को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

1981 में दो लोगों की हत्या हुई। 1991 में आरोप तय हुए। 2002 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया। इसके बाद सजा के खिलाफ अपील हाईकोर्ट पहुंची और वहां फैसला आया 2024 में। यानी एक आपराधिक मामले को ट्रायल से लेकर अपील तक पहुंचने में करीब 44 साल लग गए।सुप्रीम कोर्ट ने इस असाधारण देरी को महज प्रशासनिक समस्या नहीं माना, बल्कि इसे न्यायिक व्यवस्था की गंभीर विफलता के तौर पर देखा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई और इसे “shocking pendency” बताया।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
Simon Soren ने झारखंड हाईकोर्ट के 2024 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 28 अक्टूबर 2024 को Criminal Appeal (D.B.) No. 425 of 2002 में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक Simon Soren और अन्य आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 302 तथा अन्य धाराओं के तहत मामला चला था। अपील के दौरान कई आरोपियों की मृत्यु हो चुकी थी और अंततः सुनवाई Simon Soren के संबंध में जारी रही।
1981 की घटना में हुआ क्या था?
झारखंड हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के अनुसार, 18 अक्टूबर 1981 को एक समूह धान की कटाई के लिए भुरुंडिया गांव गया था। अभियोजन के अनुसार वहां स्थानीय लोगों के एक समूह ने उन पर हमला किया। मामले में Bibhuti Mandal और Banarsi Mandal की हत्या का आरोप था। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपियों ने तीर-कमान, कुल्हाड़ी और अन्य हथियारों से हमला किया था। पुलिस जांच के बाद आरोप-पत्र दाखिल किया गया और मामला ट्रायल में गया। हाईकोर्ट के फैसले में अभियोजन पक्ष के 12 गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम सहित कई दस्तावेजों का उल्लेख है।
1991 में आरोप तय, फिर भी 2002 में फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर इस टाइमलाइन पर सवाल उठाया।
घटना: 1981
आरोप तय: 1991
ट्रायल कोर्ट का फैसला: 2002
झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: 2024
सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही: 2026
सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य की ओर से ट्रायल में देरी के लिए आरोपियों के लगभग छह साल तक फरार रहने की बात बताई गई। लेकिन बेंच ने सवाल उठाया कि 1991 में आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल पूरा होने में लगभग 12 साल क्यों लगे। इस अवधि की देरी का पर्याप्त स्पष्टीकरण सामने नहीं आया।
केस पांच बार ट्रांसफर हुआ—SC ने पूछा, इतनी देरी क्यों?
जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। 1991 में आरोप तय होने के बाद अगले 11 वर्षों में यह केस पांच बार एक ट्रायल कोर्ट से दूसरे ट्रायल कोर्ट में ट्रांसफर हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से राज्य और हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी कि आखिर इस मुकदमे को पूरा होने में इतनी लंबी अवधि क्यों लगी।
हाईकोर्ट की आपराधिक अपीलों की पेंडेंसी ने SC को चौंकाया
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का फोकस सिर्फ Simon Soren के केस तक सीमित नहीं रहा। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल हलफनामे को देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों की संख्या को “shocking” बताया। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को व्यापक रूप से देखने की दिशा में कदम उठाया और Simon Soren को भारत सरकार को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे की प्रति अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया।
2 साल 4 महीने जेल में रहा, लेकिन केस 45 साल चला
इस मामले का सबसे असामान्य पहलू यह है कि Simon Soren ने कुल मिलाकर लगभग 2 साल, 4 महीने और 12 दिन हिरासत में बिताए, जबकि पूरा न्यायिक विवाद करीब 45 साल तक चलता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की उम्र और मेडिकल स्थिति को भी ध्यान में रखा। राज्य के हलफनामे में यह बताया गया था कि वह हिरासत के दौरान अस्पताल में भर्ती रहा था।
‘जघन्य अपराध’ के बावजूद आरोपी की 45 साल की परेशानी नजरअंदाज नहीं कर सकते: SC
सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे हत्याकांड की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही कहा कि पिछले करीब 45 वर्षों में आरोपी ने जिस लंबी न्यायिक प्रक्रिया का सामना किया, उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर बेंच ने उसकी सजा पर रोक लगाई और तत्काल रिहाई का आदेश दिया। रिहाई व्यक्तिगत श्योरिटी पर होगी और आरोपी को यह undertaking देनी होगी कि जमानत पर रहते हुए वह कोई अपराध नहीं करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा रिकॉर्ड—अब डिजिटल कॉपी भी तैयार होगी
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से मामले का मूल रिकॉर्ड मंगाने का निर्देश दिया है।
रिकॉर्ड:
फिजिकल रूप में
डिजिटल रूप में
दोनों स्वरूपों में चार सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने को कहा गया है। रिकॉर्ड मिलने के बाद उसकी डिजिटल कॉपी संबंधित पक्षों के वकीलों को उपलब्ध कराई जाएगी।
अगस्त में ही SC ने पहली बार उठाया था 44 साल की देरी का मुद्दा
यह मामला पहली बार अगस्त की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रमुखता से आया था। उस समय बेंच ने ट्रायल में 22 साल और अपील में करीब 22 साल लगने पर गंभीर नाराजगी जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तब झारखंड सरकार और झारखंड हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। साथ ही Simon Soren की मेडिकल स्थिति को लेकर भी रिपोर्ट मांगी गई थी, क्योंकि उनकी उम्र करीब 70 वर्ष थी और कई स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी कोर्ट के सामने रखी गई थी। इसके बाद रिपोर्ट आने पर सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ Simon Soren की व्यक्तिगत राहत पर फैसला किया, बल्कि हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों की व्यापक स्थिति पर भी चिंता दर्ज की।
2024 के हाईकोर्ट रिकॉर्ड से भी सामने आई लंबी कानूनी लड़ाई
झारखंड हाईकोर्ट के 28 अक्टूबर 2024 के फैसले से पुष्टि होती है कि Simon Soren की अपील Criminal Appeal (D.B.) No. 425 of 2002 थी और मामला IPC की धारा 302 सहित अन्य धाराओं से जुड़ा था। फैसले में यह भी दर्ज है कि कुछ अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी अपीलें abate हो गई थीं। इसके बाद Simon Soren के संबंध में अपील सुनी गई।
इस केस ने उठाया सबसे बड़ा सवाल—‘Justice Delayed’ का असर कितना गंभीर?
यह मामला सिर्फ एक आरोपी की रिहाई का नहीं है। यह सवाल भी सामने लाता है कि जब हत्या जैसे गंभीर अपराध की न्यायिक प्रक्रिया चार दशक से अधिक समय तक चलती है, तो न्याय व्यवस्था पर उसका क्या असर पड़ता है। एक तरफ पीड़ित पक्ष को दशकों तक अंतिम न्याय का इंतजार करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ आरोपी की उम्र मुकदमे के दौरान 70 वर्ष के आसपास पहुंच जाती है और सह-आरोपियों में से कई की मृत्यु हो जाती है। Simon Soren का मामला इसी विरोधाभास को बेहद स्पष्ट रूप से सामने रखता है—अपराध गंभीर था, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चली कि मुकदमे से जुड़े कई लोग फैसला आने से पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे।
अगली सुनवाई 18 सितंबर को
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 18 सितंबर 2026 को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इस दौरान मामले के मूल रिकॉर्ड और हाईकोर्ट की ओर से दाखिल अनुपालन दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्यवाही होगी।
