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UP-MP Power Pact: गर्मी में UP, सर्दी में MP… बिजली का नया फॉर्मूला, 2,000 MW खरीद पर समझौता
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने बिजली की बढ़ती मांग और खरीद लागत को नियंत्रित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। दोनों राज्यों की बिजली कंपनियों UPPCL और MPPMCL के बीच 2,000 MW पीक पावर की संयुक्त खरीद और मध्यम अवधि की फर्म पावर बैंकिंग व्यवस्था को लेकर समझौता हुआ है। दोनों राज्यों की बिजली मांग अलग-अलग मौसम में बढ़ती है, जिसका फायदा उठाकर बिजली संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की योजना है। इस पहल से बिजली और renewable energy सेक्टर में करीब ₹10,000 करोड़ के निवेश के अवसर बनने की उम्मीद जताई गई है।

UP-MP ने बनाया बिजली का नया मॉडल
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने बिजली क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए Memorandum of Understanding यानी MoU पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) और मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (MPPMCL) के बीच हुआ। समझौते के तहत दोनों राज्य 2,000 MW पीक पावर क्षमता की संयुक्त खरीद के लिए competitive procurement process शुरू करेंगे। इसका उद्देश्य बिजली की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ खरीद और संसाधनों के इस्तेमाल को अधिक प्रभावी बनाना है।
गर्मी में UP को ज्यादा बिजली, सर्दियों में MP को
इस समझौते की सबसे खास बात दोनों राज्यों का अलग-अलग seasonal power demand pattern है। मध्य प्रदेश में आमतौर पर अक्टूबर से मार्च के बीच बिजली की मांग बढ़ती है। इसकी एक बड़ी वजह रबी सीजन में कृषि क्षेत्र की बिजली जरूरत है। वहीं उत्तर प्रदेश में अप्रैल से सितंबर के दौरान गर्मी और खरीफ सीजन के कारण बिजली की मांग अधिक रहती है। यानी जिस समय एक राज्य में मांग ज्यादा होगी, उस समय दूसरे राज्य की उपलब्ध क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने की संभावना बनेगी। यही इस power-sharing model का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
Power Banking क्या है?
समझौते में medium-term firm power banking व्यवस्था तलाशने पर भी सहमति बनी है। सरल भाषा में समझें तो जिस राज्य के पास किसी अवधि में अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होगी, वह उसे दूसरे राज्य के लिए उपलब्ध करा सकता है और जरूरत के समय बिजली वापस लेने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे दोनों राज्यों को अपनी बिजली उत्पादन और खरीद व्यवस्था का अधिक बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है। साथ ही महंगी short-term power खरीद पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य भी है।
2,000 MW की खरीद में Solar और Battery Storage भी
यह केवल पारंपरिक बिजली खरीद तक सीमित नहीं है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों राज्यों ने integrated solar और battery energy storage system capacity की competitive procurement की दिशा में भी सहमति जताई है। इससे renewable energy को grid में बेहतर तरीके से integrate करने और जरूरत के समय बिजली उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ सकती है।
₹10 हजार करोड़ निवेश का रास्ता
इस पहल से बिजली और renewable energy sector में करीब ₹10,000 करोड़ के निवेश के अवसर बनने की उम्मीद है। हालांकि अलग-अलग रिपोर्टों में संभावित निवेश का अनुमान अलग है और एक रिपोर्ट में करीब ₹14,000 करोड़ तक की संभावना बताई गई है। इसलिए इसे फिलहाल संभावित निवेश के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि पक्का निवेश। निवेश बढ़ने से power infrastructure, renewable energy projects और energy-storage infrastructure के विकास को गति मिलने की संभावना है। इससे संबंधित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
बिजली खरीद लागत घटाने की उम्मीद
दोनों राज्यों के बीच सहयोग का एक बड़ा उद्देश्य बिजली खरीद की लागत को कम करना है। अगर अलग-अलग मौसम में उपलब्ध उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है, तो महंगी दरों पर तत्काल बिजली खरीदने की जरूरत कम हो सकती है। अधिकारियों के मुताबिक इस मॉडल से generation capacity का बेहतर utilisation, resource planning और energy security मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
क्या बिजली के बिल तुरंत सस्ते होंगे?
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। इस MoU का मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ताओं के बिजली बिल तुरंत कम हो जाएंगे।
समझौता मुख्य रूप से बिजली की खरीद, उपलब्धता, power banking और long-term resource planning से जुड़ा है। भविष्य में अगर procurement cost और system costs में कमी आती है, तो उसका फायदा बिजली व्यवस्था को मिल सकता है, लेकिन उपभोक्ता टैरिफ पर तत्काल कटौती की घोषणा इस समझौते में नहीं हुई है।
निष्कर्ष
UP और MP का यह समझौता दोनों राज्यों की अलग-अलग मौसमी बिजली जरूरतों को एक-दूसरे की ताकत में बदलने की कोशिश है। 2,000 MW की संयुक्त procurement, power banking और renewable energy-storage को बढ़ावा देने से बिजली संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही करीब ₹10,000 करोड़ के संभावित निवेश से energy infrastructure को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि इसका वास्तविक असर बिजली की लागत और उपभोक्ता बिल पर कितना पड़ेगा, यह आगे होने वाली competitive procurement और power-banking व्यवस्था के लागू होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
