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जज को फोन कर कथित दबाव बनाने का आरोप, IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ Criminal Contempt पर हाईकोर्ट सख्त

एक फोन कॉल… और करीब 30 साल पुराने जमीन विवाद का मामला पहुंच गया न्यायपालिका की स्वतंत्रता और Criminal Contempt के सवाल तक। इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक न्यायिक अधिकारी ने आरोप लगाया कि वरिष्ठ IAS अधिकारी और देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने लंबित मुकदमे के सिलसिले में फोन कर उन्हें कथित तौर पर प्रभावित और दबाव में लेने की कोशिश की। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि Justice Syed Qamar Hasan Rizvi की पीठ ने कथित बातचीत के लहजे और भाषा को प्रथमदृष्टया न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश का संकेत माना और मामले को आपराधिक अवमानना के पहलू पर विचार के लिए उचित अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया। हालांकि, अभी IAS अधिकारी को अवमानना का दोषी नहीं ठहराया गया है और उनका पक्ष भी है कि फोन केवल न्यायिक अधिकारी के अवकाश और मामले की अगली तारीख की जानकारी के लिए किया गया था।

Sonali24 अग. 2026, 02:06 PM IST
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जज को फोन कर कथित दबाव बनाने का आरोप, IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ Criminal Contempt पर हाईकोर्ट सख्त

लखनऊ:

 करीब तीन दशक पुराने जमीन विवाद की सुनवाई के बीच एक फोन कॉल ने उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और न्यायपालिका के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने देवीपाटन मंडल की आयुक्त और वरिष्ठ IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल से जुड़े कथित फोन कॉल विवाद को आपराधिक अवमानना के पहलू से विचार किए जाने के लिए संबंधित अदालत के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है। मामला उस समय सामने आया जब गोंडा में लंबित एक सिविल मुकदमे की सुनवाई कर रहीं Civil Judge (Senior Division) शबीना खान ने आरोप लगाया कि मंडलायुक्त ने उन्हें फोन कर कथित तौर पर प्रभावित और डराने का प्रयास किया। न्यायिक अधिकारी ने इस बातचीत की शिकायत District Judge, Gonda से की और मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था। Justice Syed Qamar Hasan Rizvi की पीठ ने कहा कि कथित टेलीफोन बातचीत का tone और language प्रथमदृष्टया ऐसा सीधा impression देती है कि अदालत की Presiding Officer को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी लंबित मामले के संदर्भ में litigating party या State की ओर से इस तरह न्यायिक अधिकारी से संपर्क करना “shocking” है।

सबसे पहले समझिए पूरा मामला क्या है

यह विवाद Jyoti Vidya Mandir School और Nagar Palika Parishad, Gonda से जुड़े वर्ष 1997 के एक civil suit से संबंधित है। मुकदमे में सरकारी/Nazul land से जुड़े अधिकारों और कब्जे का विवाद बताया गया है। मामला करीब तीन दशक से लंबित है। रिपोर्ट के अनुसार मुकदमे में issues वर्ष 2018 में frame किए गए थे और proceedings evidence stage में थीं। बाद में इसी मुकदमे की सुनवाई कर रहीं Civil Judge (Senior Division) Shabina Khan द्वारा कथित फोन बातचीत की शिकायत सामने आई।

15 जुलाई को क्या हुआ था?

न्यायिक अधिकारी शबीना खान ने 4 अगस्त 2026 को District Judge, Gonda को लिखे पत्र में कथित बातचीत का विवरण दिया। उनके अनुसार 15 जुलाई 2026 को, जब वह leave पर थीं, Commissioner Durga Shakti Nagpal ने उन्हें फोन किया। शिकायत के मुताबिक पहले उनके अवकाश और वापस लौटने के बारे में पूछा गया। इसके बाद न्यायिक अधिकारी ने आरोप लगाया कि Commissioner ने अपने senior IAS officer होने का उल्लेख करते हुए फोन नहीं उठाने पर नाराजगी जताई। शिकायत में कथित तौर पर यह भी कहा गया कि Commissioner ने High Court में शिकायत करने और मामले को दूसरी अदालत में transfer कराने की बात कही। न्यायिक अधिकारी ने इस बातचीत को अपने ऊपर “डराने” और “अनुचित दबाव” डालने के प्रयास के रूप में District Judge के सामने रखा।

जज ने अपनी शिकायत में क्या कहा?

शिकायत के मुताबिक Commissioner ने कथित तौर पर कहा: “मैं सीनियर आईएएस ऑफिसर हूँ और आपने मेरा फोन न उठाकर बदतमीजी की है।” शिकायत के अनुसार बातचीत में High Court में शिकायत करने और मामले को दूसरी अदालत में transfer कराने का भी उल्लेख किया गया। एक अन्य कथित टिप्पणी में न्यायिक अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई। ध्यान रहे कि ये कथन न्यायिक अधिकारी द्वारा District Judge को दी गई शिकायत में लगाए गए आरोप हैं। हाईकोर्ट ने अभी इन आरोपों को अंतिम रूप से सत्यापित करके IAS अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया है।

IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल का क्या पक्ष है?

मामले का यह पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। Commissioner Durga Shakti Nagpal की ओर से फोन कॉल होने से इनकार नहीं किया गया, लेकिन बातचीत के उद्देश्य और संदर्भ को लेकर अलग पक्ष रखा गया। उनके अनुसार उन्होंने अप्रैल 2026 में Devi Patan Mandal का charge संभाला था। इसके बाद उन्हें जानकारी मिली कि सरकारी जमीन से जुड़ा विवाद लगभग 30 वर्षों से Gonda की civil court में लंबित है। Commissioner के अनुसार संबंधित जमीन Nazul land थी, जिसे Commissioner’s Office के निर्माण और अन्य सरकारी उद्देश्यों के लिए reserved बताया गया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों और सरकारी वकीलों को मामले को प्रभावी ढंग से pursue करने और अगली hearing date पता करने के निर्देश दिए थे। उनके version के मुताबिक जब उन्हें पता चला कि Presiding Officer extended leave पर हैं, तो उन्होंने 15 जुलाई को केवल यह जानने के लिए फोन किया कि Judge कब वापस लौटेंगी और क्या वह leave आगे बढ़ाने वाली हैं। Commissioner का कहना था कि फोन पर pending case की merits पर चर्चा नहीं हुई। उन्होंने बाद में District Judge से मामले को expeditiously dispose करने का अनुरोध करने की बात भी कही।

फिर हाईकोर्ट ने मामले को इतना गंभीर क्यों माना?

यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम कानूनी पहलू है। High Court के सामने एक तरफ न्यायिक अधिकारी की शिकायत थी और दूसरी तरफ Commissioner की ओर से फोन के उद्देश्य का अलग स्पष्टीकरण। Justice Syed Qamar Hasan Rizvi की पीठ ने कहा कि कथित बातचीत के tone और language से प्रथमदृष्टया यह सीधा impression मिलता है कि Presiding Officer को influence करने की कोशिश की गई। कोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि लंबित मुकदमे के संदर्भ में कोई litigating party न्यायिक अधिकारी से सीधे फोन पर संपर्क करे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि subordinate courts के पीठासीन अधिकारियों को insult या pressure से सुरक्षित रखना High Court की जिम्मेदारी है और judicial officers को स्वतंत्र, भयमुक्त और निष्पक्ष होकर काम करने का वातावरण मिलना चाहिए।

Transfer application का क्या हुआ?

मूल रूप से हाईकोर्ट के सामने एक transfer application थी। मांग थी कि 1997 से लंबित मुकदमे को संबंधित Civil Judge की अदालत से किसी अन्य competent court में transfer किया जाए। लेकिन हाईकोर्ट इस transfer application पर फैसला करता, उससे पहले District Judge, Gonda ने मुकदमा दूसरी समान jurisdiction वाली अदालत में transfer कर दिया। मामला Civil Judge (Senior Division)/F.T.C. Naveen/ACJM, Gonda की अदालत में transfer किया गया।

इस कारण High Court ने माना कि जिस राहत की मांग transfer application में की गई थी, वह पहले ही मिल चुकी है। इसलिए transfer application ने अपनी efficacy खो दी और उसे record में consign कर दिया गया।

फिर भी High Court ने फोन कॉल पर सुनवाई क्यों की?

यह आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सिर्फ इसलिए कि मुकदमा दूसरी अदालत में transfer हो गया था, High Court ने Judicial Officer की शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया। पीठ ने कहा कि वह Judicial Officer के पत्र में लगाए गए आरोपों पर “अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती।” अदालत ने कथित conduct को अलग से examined किया और माना कि मामला न्यायिक स्वतंत्रता तथा administration of justice से जुड़ा गंभीर प्रश्न उठाता है।

Supreme Court के पुराने फैसले का भी हवाला

High Court ने अपने निष्कर्ष तक पहुंचते समय Supreme Court के 1996 के In Re: Ajay Kumar Pandey मामले का भी उल्लेख किया। इस precedent के संदर्भ में अदालत ने माना कि judicial proceedings से संबंधित Judge को शिकायत या अन्य दबाव की धमकी देना administration of justice में interference का प्रश्न पैदा कर सकता है। यही कानूनी आधार वर्तमान मामले को महज “फोन पर हुई बातचीत” से आगे ले जाता है। अदालत ने माना कि यदि किसी judicial officer को लंबित judicial proceeding के संबंध में pressure या influence करने का प्रयास किया जाता है, तो यह न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि मामले को Chief Justice या Senior Judge से आवश्यक directions प्राप्त करने के बाद criminal contempt matters की सुनवाई करने वाली appropriate court के समक्ष रखा जाए। यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने अभी Durga Shakti Nagpal को criminal contempt का दोषी घोषित नहीं किया है। अदालत ने केवल यह कहा है कि कथित conduct prima facie ऐसा है जिस पर criminal contempt jurisdiction के तहत विचार किया जाना चाहिए। आगे की कार्यवाही संबंधित अदालत में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होगी।

विभिन्न रिपोर्टों में भी सामने आए ये तथ्य

मामले की अलग-अलग रिपोर्टों में भी मुख्य घटनाक्रम की पुष्टि होती है। रिपोर्टों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गोंडा में लंबे समय से लंबित जमीन विवाद से जुड़े मामले में न्यायिक अधिकारी को कथित रूप से प्रभावित करने के प्रयास को गंभीरता से लिया। अदालत ने मामले को न्यायिक स्वतंत्रता और न्याय प्रशासन में संभावित हस्तक्षेप के पहलू से देखते हुए आपराधिक अवमानना के लिए उपयुक्त अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया। रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि हाईकोर्ट ने कथित फोन बातचीत के लहजे और भाषा को प्रथमदृष्टया गंभीर माना और इस बात पर चिंता जताई कि लंबित मुकदमे के संदर्भ में किसी न्यायिक अधिकारी से सीधे संपर्क कर उस पर प्रभाव डालने का प्रयास किया गया हो सकता है। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोप अभी अंतिम रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं और संबंधित IAS अधिकारी का पक्ष भी न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रहेगा।

आधिकारिक रिकॉर्ड से क्या पुष्टि होती है?

उत्तर प्रदेश सरकार की आधिकारिक Gonda district website पर Durga Shakti Nagpal को Commissioner, Devipatan Mandal के रूप में listed किया गया है। Devipatan Mandal की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उनकी designation Commissioner (Devipatan Mandal) दर्ज है। यानी उनकी वर्तमान administrative position की स्वतंत्र पुष्टि सरकारी स्रोत से होती है।

केस का नाम और Citation

मामले का नाम: Jyoti Vidya Mandir Anandpuri Chhawni Sarkar Thru Manager Dayanand Mishra vs Nagar Palika Parishad Gonda through its President And Others Case Citation: 2026 (AB) 613 इस मामले में आदेश Justice Syed Qamar Hasan Rizvi की पीठ ने पारित किया।

तीन दशक पुराने मुकदमे से न्यायपालिका की स्वतंत्रता तक पहुंचा मामला

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत एक पुराने जमीन विवाद से हुई थी, लेकिन अब इसका कानूनी महत्व कहीं व्यापक हो गया है। एक तरफ करीब 29-30 वर्षों से लंबित civil dispute है। दूसरी तरफ एक sitting judicial officer की शिकायत है कि लंबित मुकदमे के संदर्भ में उन्हें एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के फोन से कथित दबाव महसूस हुआ। और तीसरी तरफ IAS अधिकारी का अपना पक्ष है कि फोन का उद्देश्य केवल Judge की leave और मामले की अगली तारीख से संबंधित जानकारी लेना था तथा pending case की merits पर कोई चर्चा नहीं हुई। इसी विरोधाभास के बीच High Court ने बातचीत के alleged tone और language को prima facie गंभीर मानते हुए criminal contempt के पहलू को आगे भेजने का फैसला किया है।