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GST Section 74 पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ‘Fraud’ लिखना काफी नहीं, SCN में बताना होगा पूरा आधार
GST विभाग के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी कानूनी सीमा तय कर दी है, जिसका सीधा असर Section 74 के तहत जारी होने वाले Show Cause Notice पर पड़ सकता है। अदालत ने साफ कर दिया कि सिर्फ ‘Fraud’, ‘Wilful Misstatement’ या ‘Suppression of Facts’ जैसे शब्द लिख देने से विभाग को extended limitation का अधिकार नहीं मिल जाएगा। आखिर GST नोटिस में क्या-क्या स्पष्ट करना जरूरी है और G.R. Infra Projects के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया करीब 1.52 करोड़ रुपये की टैक्स देनदारी से जुड़ा SCN? जानिए इस बड़े फैसले की पूरी कहानी।

नई दिल्ली:
GST मामलों में टैक्स विभाग की ओर से जारी Show Cause Notice यानी SCN को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि Central Goods and Services Tax Act, 2017 की Section 74 के तहत extended limitation का सहारा लेने के लिए केवल “fraud”, “wilful misstatement” या “suppression of facts” जैसे शब्द लिख देना पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SCN में ही उन विशेष आरोपों और परिस्थितियों को स्पष्ट करना होगा, जिनके आधार पर अधिकारी यह मान रहा है कि टैक्स की कमी या गलत Input Tax Credit fraud, जानबूझकर गलत बयान या तथ्यों को छिपाने के कारण हुई है। केवल बाद में कोर्ट के सामने Counter Affidavit दाखिल करके SCN की कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता। यह फैसला M/s G.R. Infra Projects Limited, Ratlam बनाम State of Madhya Pradesh & Ors. मामले में आया है। सुप्रीम कोर्ट की Justice J.B. Pardiwala और Justice K. Vinod Chandran की पीठ ने 19 अगस्त 2026 को फैसला सुनाया। मामले में Civil Appeal No. 11277 of 2026, जो SLP (C) No. 33594 of 2025 से संबंधित था, में अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश और संबंधित GST Show Cause Notice दोनों को रद्द कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
G.R. Infra Projects Limited के खिलाफ वित्त वर्ष 2018-19 से संबंधित GST विवाद में विभाग ने 13 जून 2025 को CGST Act की Section 74 के तहत Show Cause Notice जारी किया था। इस नोटिस में लगभग 1.52 करोड़ रुपये की टैक्स देनदारी प्रस्तावित की गई थी। मामले में अलग-अलग GST विवरणों और लेन-देन से जुड़े अंतर, Input Tax Credit तथा अन्य टैक्स संबंधी विसंगतियों को आधार बनाया गया था। कंपनी का कहना था कि Section 74 लागू करने के लिए केवल टैक्स में अंतर या आंकड़ों की विसंगति पर्याप्त नहीं है। विभाग को यह बताना होगा कि इन कथित विसंगतियों में fraud, wilful misstatement या suppression of facts किस तरह शामिल है।
पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा था मामला
G.R. Infra Projects ने Section 74 के तहत जारी SCN को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 29 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से यह माना था कि कंपनी के पास विभागीय कार्यवाही के दौरान अपना पक्ष रखने और उसके बाद वैधानिक अपील का विकल्प उपलब्ध है। इसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने 21 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेश में SCN की सामग्री को लेकर प्रथम दृष्टया गंभीर सवाल उठाए थे और आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। उस समय अदालत ने नोट किया था कि SCN में आंकड़ों के अलावा fraud, wilful misstatement या suppression के आधार को पर्याप्त रूप से नहीं बताया गया था। अब 19 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए SCN और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने Section 74 के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया।
अदालत के मुताबिक, यदि विभाग extended limitation का इस्तेमाल करना चाहता है तो Show Cause Notice में यह स्पष्ट होना चाहिए कि:
कथित fraud क्या है?
wilful misstatement किस तथ्य या बयान से संबंधित है?
कौन-से तथ्य जानबूझकर छिपाए गए?
इन कृत्यों और टैक्स की कथित कमी के बीच क्या संबंध है?
Section 74 लागू करने की परिस्थितियां किस आधार पर बनती हैं?
सिर्फ कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को दोहरा देना पर्याप्त नहीं होगा।
‘Fraud or Concealment of Facts’ पर भी उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने SCN में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी गौर किया। रिपोर्ट के मुताबिक, नोटिस में “fraud or concealment of facts” जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि “or” का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि अधिकारी स्वयं यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि मामला fraud का है या concealment of facts का। अदालत के लिए यह महत्वपूर्ण था कि Section 74 के तहत कार्रवाई का आधार स्पष्ट और ठोस तरीके से सामने आए, न कि केवल वैधानिक शब्दावली को दोहराकर।
बाद में Counter Affidavit से नहीं सुधारी जा सकती SCN की कमी
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने Counter Affidavit के जरिए अपने आरोपों को विस्तार से समझाने की कोशिश की।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि बाद की न्यायिक कार्यवाही में दी गई अतिरिक्त जानकारी से मूल SCN की कमी पूरी हो सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी statutory notice की वैधता चुनौती के घेरे में हो, तो उस notice को वैध बनाने के लिए आवश्यक बातें उसी notice में मौजूद होनी चाहिए। बाद में दाखिल affidavit से ऐसी मूल कमी को पूरा नहीं किया जा सकता।
Section 73 और Section 74 में क्या फर्क है?
GST कानून के तहत Section 73 और Section 74 के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। Section 73 सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में लागू होता है जहां टैक्स का भुगतान नहीं हुआ, कम हुआ या गलत तरीके से Input Tax Credit लिया गया, लेकिन इसके पीछे fraud या जानबूझकर गलत जानकारी अथवा suppression का आरोप नहीं है। वहीं Section 74 उन मामलों के लिए है जहां tax short payment या गलत ITC को fraud, wilful misstatement या suppression of facts से जोड़कर देखा जाता है। Section 74 में extended limitation का प्रावधान होने के कारण इसके इस्तेमाल के लिए कानूनी शर्तें भी अधिक गंभीर हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Section 74 की बुनियादी शर्तों को SCN में ही स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।
Limitation के सवाल पर भी आया महत्वपूर्ण निष्कर्ष
मामले में Section 73 के तहत सामान्य limitation और Section 74 के तहत extended limitation का सवाल भी महत्वपूर्ण था। सुप्रीम कोर्ट ने वित्त वर्ष 2018-19 के संदर्भ में COVID-19 के दौरान limitation period को लेकर अपने suo motu orders से मिली अवधि का भी हिसाब किया और Section 73 के लिए 28 फरवरी 2025 को महत्वपूर्ण अंतिम तारीख माना। संबंधित SCN 13 जून 2025 को जारी किया गया था। हालांकि, इस पहलू को व्यापक रूप से यह नहीं समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने GST limitation से जुड़े हर notification या हर परिस्थिति पर अंतिम फैसला दे दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने इस मामले में जिस limitation calculation को अपनाया, वह इसी विवाद के तथ्यों और रिकॉर्ड के संदर्भ में था। इसलिए भविष्य के सभी मामलों में इसे स्वतः लागू मानना उचित नहीं होगा।
करीब 1.52 करोड़ रुपये की मांग से जुड़ा था विवाद
मामले में विभाग की ओर से लगभग 1.52 करोड़ रुपये की GST liability प्रस्तावित की गई थी। विवाद में विभिन्न GST returns और e-way bills के बीच अंतर, Input Tax Credit से जुड़े मुद्दे तथा कुछ अन्य लेन-देन संबंधी विसंगतियां शामिल थीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फोकस केवल इन आंकड़ों पर नहीं था। मुख्य सवाल यह था कि क्या इन आंकड़ों और कथित विसंगतियों के आधार पर Section 74 में आवश्यक fraud, wilful misstatement या suppression का आधार SCN में पर्याप्त रूप से बताया गया था।
अदालत का जवाब स्पष्ट था—सिर्फ आंकड़े या सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने G.R. Infra Projects Limited की अपील स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 29 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही 13 जून 2025 को जारी Section 74 का संबंधित Show Cause Notice भी रद्द कर दिया गया और राज्य को उस SCN के आधार पर आगे कार्यवाही न करने का निर्देश दिया गया।
GST अधिकारियों के लिए बड़ा संदेश
यह फैसला GST प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि Section 74 को केवल extended limitation हासिल करने के लिए यांत्रिक तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यदि विभाग के पास fraud, wilful misstatement या suppression से संबंधित सामग्री है, तो उसे SCN में ही पर्याप्त रूप से सामने रखना होगा। दूसरे शब्दों में, विभाग के पास सामग्री होना ही पर्याप्त नहीं है; उस सामग्री के आधार पर लगाए गए आरोपों को वैधानिक नोटिस में उचित तरीके से दर्ज करना भी जरूरी है।
Taxpayers के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
इस फैसले के बाद Section 74 के तहत जारी GST notices की वैधता परखते समय taxpayers के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि क्या SCN में fraud या suppression का केवल उल्लेख किया गया है या उसके पीछे के तथ्य और परिस्थितियां भी बताई गई हैं। यदि SCN केवल tax figures, discrepancies और statutory expressions तक सीमित है तथा यह स्पष्ट नहीं करता कि कथित fraud या suppression किस तरह हुआ, तो इस फैसले का सहारा लेकर उस notice की वैधता को चुनौती देने का आधार मजबूत हो सकता है। हालांकि, हर Section 74 notice अपने आप अवैध नहीं हो जाएगा। नोटिस की वास्तविक भाषा, आरोप, उपलब्ध तथ्य और मामले की परिस्थितियों का अलग-अलग परीक्षण करना होगा।
