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आधी रात में सर्किट हाउस खाली कराने का आदेश, सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं महुआ मोइत्रा; CJI सूर्यकांत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार

आधी रात… सरकारी सर्किट हाउस… बाहर जुटी भीड़ और “जय श्री राम” के नारों के बीच एक महिला सांसद को परिसर खाली करने का आदेश। पश्चिम बंगाल के नदिया से शुरू हुआ यह विवाद अब सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि उन्हें रात में अचानक सर्किट हाउस खाली करने के लिए कहा गया, जबकि उनके मुताबिक उन्हें पहले से न्यायिक संरक्षण हासिल था। मामला जब 24 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुनवाई की जल्द तारीख मांगने पर CJI सूर्यकांत ने फिलहाल मामले को entertain करने से अनिच्छा जताई। अब सवाल सिर्फ सर्किट हाउस खाली कराने का नहीं, बल्कि एक निर्वाचित सांसद की सुरक्षा, प्रशासनिक कार्रवाई और संसदीय अधिकारों को लेकर भी उठ रहा है।

Sonali24 अग. 2026, 02:06 PM IST
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आधी रात में सर्किट हाउस खाली कराने का आदेश, सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं महुआ मोइत्रा; CJI सूर्यकांत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली/कोलकाता।

 तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा को लेकर पश्चिम बंगाल के नदिया स्थित कृष्णनगर सर्किट हाउस का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। महुआ मोइत्रा ने जिला प्रशासन की ओर से कथित तौर पर देर रात सर्किट हाउस खाली करने के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। हालांकि 24 अगस्त 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष तत्काल सुनवाई और जल्द लिस्टिंग की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले को entertain करने से इनकार कर दिया।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद 14 अगस्त 2026 की रात शुरू हुआ। कृष्णनगर से लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा के मुताबिक, वह अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे के दौरान जिस सर्किट हाउस में सामान्यतः ठहरती हैं, वहां शाम करीब 6:30 बजे पहुंचीं। उनका कहना है कि उन्हें कमरा दिया गया और रात करीब 9:20 बजे कमरे में खाना भी पहुंचाया गया। इसके बाद रात करीब 9:47 बजे उन्हें फोन कर कमरा खाली करने के लिए कहा गया। लगभग 10:50-10:52 बजे उन्हें प्रशासनिक आदेश की प्रति भेजी गई। प्रशासन की ओर से जारी आदेश में सर्किट हाउस को 14 अगस्त की शाम से अगले आदेश तक वार्षिक रखरखाव, साफ-सफाई और upkeep के लिए उपलब्ध नहीं रखने की बात कही गई थी। आदेश में यह भी उल्लेख था कि 13 अगस्त से पहले की गई पुष्टि वाली बुकिंग को इस निर्देश से छूट होगी।

महुआ मोइत्रा का बड़ा आरोप- बाहर जमा थी भीड़

महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जब उनसे सर्किट हाउस खाली करने को कहा गया, उस समय बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा थे और “जय श्री राम” के नारे लगाए जा रहे थे।

उन्होंने इसे महज एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा और एक निर्वाचित महिला सांसद की गरिमा से जुड़ा मामला बताया। हालांकि भीड़ के पीछे कौन था और उसका उद्देश्य क्या था, इस संबंध में अभी कोई स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इस हिस्से को महुआ मोइत्रा के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

महुआ मोइत्रा का बयान- “मैं डरने वाली नहीं हूं”

घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर अपने रुख को बेहद आक्रामक अंदाज में रखा। उन्होंने कहा कि वह डरने वाली नहीं हैं और सर्किट हाउस से बाहर निकलने से इनकार किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा था कि जब उन्हें लोगों के बीच जाने और राजनीति में सक्रिय रहने की बात कही गई है तो वह पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें “गोलियों का सामना करने” के लिए कहा था और वह यहां पीछे हटने वाली नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ?

24 अगस्त को महुआ मोइत्रा की ओर से उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की जल्द सुनवाई के लिए लिस्टिंग की मांग की। वकील ने दलील दी कि कथित प्रशासनिक कार्रवाई हाईकोर्ट के संरक्षण के बावजूद हुई और मामला महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाता है। उन्होंने स्वतंत्र जांच की आवश्यकता की बात भी कही। वकील ने कहा कि मामला संघीय ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है और वह फिलहाल केवल जल्द सुनवाई के लिए लिस्टिंग चाहते हैं। लेकिन CJI सूर्यकांत ने तत्काल मामले को entertain करने में अनिच्छा जताई। अदालत में CJI ने कहा कि फिलहाल कोर्ट इस मामले को entertain नहीं करने जा रहा है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार किया है। इसे महुआ मोइत्रा की याचिका पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी लिखा था पत्र

सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले महुआ मोइत्रा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। उन्होंने दावा किया था कि एक महिला सांसद को देर रात सरकारी सर्किट हाउस खाली करने के लिए कहना सुरक्षा, गरिमा और संसदीय कामकाज से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इस घटनाक्रम को लेकर प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ विशेषाधिकार कार्रवाई की मांग भी उठाई थी।

तीन अधिकारियों के खिलाफ Privilege Notice

विवाद के बाद महुआ मोइत्रा ने नदिया प्रशासन के तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष privilege notice भी दिया। उनका आरोप था कि देर रात सर्किट हाउस खाली करने का निर्देश देना संसदीय प्रोटोकॉल और उनके विशेषाधिकार के उल्लंघन के बराबर है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसदीय विशेषाधिकार के सवाल तक पहुंच गया है।

अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान

महुआ मोइत्रा के समर्थन में TMC के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी भी सामने आए। अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर घटना को लेकर चिंता जताई और सवाल उठाया कि एक महिला सांसद को आधी रात में सर्किट हाउस से बाहर जाने का आदेश किन परिस्थितियों में दिया गया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए महुआ मोइत्रा के समर्थन में आवाज उठाई।

पवन खेड़ा ने PM और Home Minister से की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी मामले पर प्रतिक्रिया दी। पवन खेड़ा ने कहा कि एक sitting woman MP को आधी रात में सर्किट हाउस खाली करने के लिए कहा जा रहा है और बाहर भीड़ मौजूद है। उन्होंने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और मुख्यमंत्री से महुआ मोइत्रा की सुरक्षा और wellbeing सुनिश्चित करने की अपील की।

अखिलेश यादव ने उठाया संसदीय विशेषाधिकार का सवाल

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से यह स्पष्ट करने की मांग की कि क्या इस तरह की कार्रवाई किसी सांसद के parliamentary privilege का उल्लंघन है। अखिलेश यादव का यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद का एक प्रमुख पहलू अब सांसद के संसदीय अधिकार और जिला प्रशासन के अधिकारों के बीच संतुलन का भी बन गया है।

जॉन ब्रिटास ने भी उठाए सवाल

CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने भी घटना की आलोचना की। उन्होंने महिला सांसद की सुरक्षा और गरिमा का सवाल उठाते हुए लोकसभा अध्यक्ष के हस्तक्षेप की मांग की।

प्रशासन का पक्ष क्या है?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि महुआ मोइत्रा द्वारा लगाए गए सभी आरोपों पर नदिया जिला प्रशासन की ओर से विस्तृत सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है। दूसरी ओर, प्रशासनिक आदेश में सर्किट हाउस को annual maintenance, upkeep और cleaning के लिए 14 अगस्त की शाम से बंद रखने का कारण बताया गया था। साथ ही पहले से confirmed reservations को छूट दिए जाने की बात भी आदेश में बताई गई। इसलिए यह कहना कि प्रशासन ने जानबूझकर महुआ मोइत्रा को निकालने के लिए ही सर्किट हाउस बंद किया, अभी एक आरोप होगा, स्थापित तथ्य नहीं।

क्या हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा को संरक्षण दिया था?

सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि प्रशासन की कार्रवाई उस समय हुई जब कलकत्ता हाईकोर्ट का protective order मौजूद था। हालांकि इस कथित हाईकोर्ट आदेश का पूरा टेक्स्ट और उसका सटीक दायरा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए यह कहना कि हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा को सर्किट हाउस में रहने का अधिकार दिया था, मूल आदेश देखे बिना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट में वकील ने जरूर यह दावा किया कि कार्रवाई हाईकोर्ट के protection के बावजूद हुई।

पहले भी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं महुआ

यह विवाद ऐसे समय आया है जब महुआ मोइत्रा पहले भी अपनी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुकी हैं। एक अलग मामले में उन्होंने पुलिस के समक्ष virtual appearance की अनुमति मांगी थी और आशंका जताई थी कि उनके खिलाफ भीड़ द्वारा हमला किया जा सकता है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की थी और राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक विरोध का सामना करने को लेकर टिप्पणी की थी। मौजूदा विवाद में महुआ मोइत्रा ने उसी टिप्पणी का संदर्भ देते हुए अपने साहस और राजनीतिक सक्रियता की बात कही।


अब मामला किस दिशा में जाएगा?

अब इस पूरे विवाद में तीन मोर्चे महत्वपूर्ण हो गए हैं—सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की याचिका, लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष privilege proceedings और नदिया प्रशासन की ओर से इस घटना पर संभावित आधिकारिक स्पष्टीकरण। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। तत्काल listing से इनकार का मतलब भी यह नहीं है कि मामले से जुड़े सभी कानूनी मुद्दों पर शीर्ष अदालत ने अंतिम निर्णय दे दिया है। महुआ मोइत्रा के लिए यह विवाद केवल सर्किट हाउस खाली कराने तक सीमित नहीं है। इसमें एक निर्वाचित सांसद की सुरक्षा, सरकारी परिसरों के प्रशासनिक इस्तेमाल, संसदीय विशेषाधिकार और राजनीतिक टकराव के बीच प्रशासनिक कार्रवाई की निष्पक्षता जैसे कई सवाल जुड़े हैं। यही वजह है कि 14 अगस्त की देर रात शुरू हुआ कृष्णनगर सर्किट हाउस विवाद अब पश्चिम बंगाल की राजनीति से निकलकर देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है।