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डेथ रो कैदी को असम जेल भेजने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केरल का Rule 587 बना सवाल; SC ने कहा- नियम नहीं बदला तो हो सकता है रद्द
क्या मौत की सजा पाए किसी कैदी को सिर्फ इसलिए अपने गृह राज्य की जेल में जाने से रोका जा सकता है, क्योंकि राज्य के जेल नियम इसकी इजाजत नहीं देते? सुप्रीम कोर्ट में पेरुम्बवूर लॉ स्टूडेंट रेप-मर्डर केस के दोषी मुहम्मद आमिर-उल-इस्लाम की याचिका पर सुनवाई के दौरान यही बड़ा कानूनी सवाल सामने आया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने केरल के जेल नियमों पर सवाल उठाते हुए यहां तक संकेत दिया कि अगर नियम केंद्रीय कानून के खिलाफ पाया गया तो उसे रद्द भी किया जा सकता है। कोर्ट ने केरल सरकार से जवाब मांगा है। खास बात यह है कि आमिर-उल-इस्लाम की मौत की सजा पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है और अब मामला उसके जेल ट्रांसफर से आगे बढ़कर कैदियों के अधिकार, परिवार से मुलाकात और राज्य बनाम केंद्रीय कानून के टकराव तक पहुंच गया है।

नई दिल्ली:
केरल के बहुचर्चित पेरुम्बवूर लॉ स्टूडेंट रेप और मर्डर केस में मौत की सजा पाए मुहम्मद आमिर-उल-इस्लाम को उसके गृह राज्य असम की जेल में ट्रांसफर करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार, 24 अगस्त 2026 को अहम सुनवाई हुई। मामला सिर्फ एक कैदी को एक राज्य से दूसरे राज्य की जेल में भेजने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुनवाई के दौरान केरल के जेल नियमों और केंद्रीय कानून के बीच संभावित टकराव का बड़ा कानूनी सवाल सामने आया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने केरल सरकार से जवाब मांगा और संकेत दिया कि अगर Kerala Prisons and Correctional Services (Management) Rules, 2010 का संबंधित प्रावधान केंद्रीय कानून से असंगत पाया गया तो उसे चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को नियम में संशोधन की संभावना पर भी विचार करने की सलाह दी।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने आमिर-उल-इस्लाम को असम भेजने का आदेश दे दिया?
नहीं। यह बात स्पष्ट करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 अगस्त की सुनवाई में आमिर-उल-इस्लाम को तत्काल असम ट्रांसफर करने का आदेश नहीं दिया। अदालत ने केरल सरकार से काउंटर-अफिडेविट मांगा है और यह देखने की दिशा में आगे बढ़ी है कि राज्य के जेल नियम केंद्रीय कानून के अनुरूप हैं या नहीं। अदालत की चिंता खास तौर पर Rule 587 और Rule 789 को लेकर सामने आई। याचिकाकर्ता की ओर से इन नियमों को चुनौती देने वाली प्रार्थना को बाद में याचिका में शामिल किए जाने की बात भी बताई गई।
कौन है मुहम्मद आमिर-उल-इस्लाम?
मुहम्मद आमिर-उल-इस्लाम असम का रहने वाला प्रवासी मजदूर है। वह 2016 में केरल के पेरुम्बवूर में एक 30 वर्षीय दलित लॉ स्टूडेंट के बलात्कार और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। पीड़िता Government Law College, Ernakulam में LLB की छात्रा थी और अपनी मां के साथ पेरुम्बवूर स्थित घर में रहती थी। 28 अप्रैल 2016 को उसकी हत्या कर दी गई थी। घटना के बाद केरल में व्यापक आक्रोश और विरोध प्रदर्शन हुए थे। आमिर-उल-इस्लाम को जुलाई 2016 में तमिलनाडु से गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2017 में उसे दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। अभियोजन मामले में DNA evidence और witness testimony भी महत्वपूर्ण रहे।
2017 में मौत की सजा, 2024 में हाईकोर्ट ने की पुष्टि
एर्नाकुलम की ट्रायल कोर्ट ने आमिर-उल-इस्लाम को IPC की धारा 449, 342, 302, 376 और 376A सहित संबंधित प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था और 2017 में मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामला Kerala High Court पहुंचा। 20 मई 2024 को जस्टिस पी.बी. सुरेश कुमार और जस्टिस एस. मनु की डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए मौत की सजा की पुष्टि कर दी। हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए death penalty को कायम रखा।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में फांसी पर लगा दी थी रोक
यह इस मामले का बेहद महत्वपूर्ण पहलू है। केरल हाईकोर्ट के 20 मई 2024 के फैसले के खिलाफ आमिर-उल-इस्लाम सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 16 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील पर leave granted किया और साफ निर्देश दिया कि death sentence का execution appeal के अंतिम निपटारे तक stayed रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय जेल में उसके conduct और probation officers की reports सहित अन्य mitigating circumstances से जुड़ी जानकारी भी मांगी थी। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराने का निर्देश भी रिपोर्टिंग में सामने आया था। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि आमिर-उल-इस्लाम की फांसी होने वाली है। उसकी death sentence पर सुप्रीम कोर्ट की रोक पहले से लागू है और मुख्य अपील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है।
अब जेल ट्रांसफर की मांग क्यों?
आमिर-उल-इस्लाम इस समय केरल के Viyyur Central Prison में बंद है। उसकी पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता असम में रहते हैं। याचिका में कहा गया है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और वे केरल तक यात्रा करके उससे मिलने में सक्षम नहीं हैं। इसी आधार पर उसे उसके गृह राज्य असम की जेल में ट्रांसफर करने की मांग की गई है, ताकि परिवार उससे मिल सके। यानी याचिका का एक प्रमुख आधार यह है कि जेल में बंद होने के बावजूद कैदी के पारिवारिक संपर्क और मानवीय गरिमा से जुड़े अधिकारों को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
Article 21 और कैदी के अधिकारों का सवाल
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से संविधान के Article 20 और Article 21 का भी हवाला दिया गया है। दलील यह है कि किसी व्यक्ति को जेल भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसके सभी मौलिक और मानवीय अधिकार खत्म हो जाते हैं। खासकर परिवार से संपर्क और मानवीय गरिमा से जुड़े अधिकारों को परिस्थितियों के अनुसार देखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Sunil Batra v. Delhi Administration का भी हवाला दिया है। इस फैसले ने जेल में बंद व्यक्तियों के साथ मानवीय व्यवहार और उनके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े सिद्धांतों को मजबूत किया था।
Rule 587 पर क्यों फंसा पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल Kerala Prisons and Correctional Services (Management) Rules, 2010 के Rule 587 को लेकर है। सुनवाई में बताया गया कि Rule 587 मौत की सजा पाए कैदी या कुछ अन्य श्रेणी के कैदियों को दूसरे राज्य की जेल में ट्रांसफर करने पर प्रतिबंध लगाता है, जब तक विशेष परिस्थितियों में सरकार की अनुमति न हो या अदालत में कैदी की उपस्थिति की आवश्यकता न हो। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पूरी हो चुकी है और Kerala High Court भी death sentence confirm कर चुका है। ऐसे में Rule 587 के आधार पर ट्रांसफर को पूरी तरह रोकना केंद्रीय कानून के साथ किस हद तक संगत है, यह सवाल उठता है।
Rule 789 भी बना विवाद का हिस्सा
सुनवाई में Rule 789 का भी उल्लेख हुआ। केरल सरकार की ओर से इस नियम पर reliance किए जाने की बात सामने आई। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि pending appeal के आधार पर transfer रोकने की स्थिति को केंद्रीय कानून और मौजूदा न्यायिक स्थिति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट अब केवल आमिर-उल-इस्लाम की व्यक्तिगत मांग नहीं, बल्कि जेल ट्रांसफर से जुड़े नियमों की वैधानिकता और उनके केंद्रीय कानून से तालमेल के सवाल को भी देख रहा है।
Transfer of Prisoners Act, 1950 ने बढ़ाई कानूनी पेचीदगी
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने Transfer of Prisoners Act, 1950 की Section 3 का हवाला दिया। उनकी दलील का मूल आधार यह था कि death sentence पाए कैदी के transfer पर कानून में विशेष परिस्थितियां और permissions निर्धारित हैं। उन्होंने अदालत के सामने यह भी रखा कि ट्रायल और हाईकोर्ट की कार्यवाही से जुड़ा चरण पूरा हो चुका है। यहीं से एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न निकलता है—क्या किसी राज्य के prison rules केंद्रीय कानून में मौजूद व्यवस्था को अतिरिक्त रूप से सीमित कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने इसी संभावित conflict को गंभीरता से लिया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता का अहम सवाल- 'असम की सहमति कहां है?'
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने पूछा कि असम सरकार की सहमति कहां है। इस पर रेबेका जॉन ने बताया कि असम की सहमति अभी सामने नहीं आई है, लेकिन असम सरकार का रुख यह है कि अगर केरल transfer की अनुमति देता है तो वह अनुरोध पर विचार करेगी। असम की ओर से पेश वकील ने भी अदालत को बताया कि केरल की अनुमति मिलने पर राज्य इस अनुरोध पर विचार करेगा। इससे मामला तीन पक्षों के बीच फंसता दिखाई देता है—केरल, असम और कैदी की ओर से उठाया गया मौलिक अधिकारों का सवाल।
सुप्रीम कोर्ट की केरल को सख्त सलाह
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केरल सरकार के वकील से Rule 587 की वैधता और केंद्रीय कानून के साथ उसके संबंध पर निर्देश लेने को कहा। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि राज्य का नियम केंद्रीय कानून के अनुरूप नहीं है तो उसे संशोधित किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मूल रूप से केरल को यह संदेश दिया कि यदि वह अपने नियम को चुनौती से बचाना चाहता है तो केंद्रीय legislation के अनुरूप संशोधन पर विचार करे। कोर्ट ने चेताया कि नियम के असंगत पाए जाने की स्थिति में उसे struck down किए जाने का जोखिम है।
यह मामला 2022 से सुप्रीम कोर्ट में है
यह विवाद नया नहीं है। आमिर-उल-इस्लाम ने जेल ट्रांसफर के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा 2022 में खटखटाया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने केरल, असम और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या उसे केरल से उसके गृह राज्य असम की जेल में भेजा जा सकता है। बाद की कार्यवाही में केरल और असम सरकारों के रुख तथा जेल नियमों से जुड़े मुद्दे सामने आते रहे। इसलिए 24 अगस्त 2026 की सुनवाई को इस लंबे समय से लंबित विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है।
2022 में भी उठा था परिवार से मिलने का अधिकार
पुरानी कार्यवाही की रिपोर्टिंग में भी यह सामने आया था कि आमिर-उल-इस्लाम की पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता असम में रहते हैं और आर्थिक कठिनाइयों के कारण केरल की जेल तक नहीं पहुंच पाते। इसी आधार पर यह दलील दी गई थी कि कैदी को अपने परिवार के करीब रखने की मांग केवल सुविधा की मांग नहीं है, बल्कि परिवार से मिलने के उसके अधिकार और मानवीय गरिमा से भी जुड़ी है।
क्या यह फैसला दूसरे death-row prisoners के लिए भी अहम हो सकता है?
अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में यह तय करता है कि राज्य के prison rules केंद्रीय कानून के विपरीत जाकर death-row prisoners के inter-state transfer पर पूर्ण रोक नहीं लगा सकते, तो इसका प्रभाव सिर्फ आमिर-उल-इस्लाम तक सीमित नहीं रह सकता। देश की अलग-अलग जेलों में बंद ऐसे कैदियों के मामलों में भी यह सवाल उठ सकता है कि क्या परिवार से मिलने में वास्तविक और गंभीर कठिनाई होने पर उन्हें गृह राज्य के करीब ट्रांसफर करने की मांग की जा सकती है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट कोई व्यापक transfer right घोषित करने जा रहा है। फिलहाल अदालत Rule 587, संबंधित केंद्रीय कानून और इस खास मामले के तथ्यों पर विचार कर रही है।
अब आगे क्या?
अब केरल सरकार को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना counter-affidavit दाखिल करना होगा। खास तौर पर Rule 587 और याचिका में किए गए amendment challenge पर राज्य का रुख महत्वपूर्ण होगा। अदालत इसके बाद यह देख सकती है कि Kerala Prison Rules और Transfer of Prisoners Act, 1950 के बीच कोई कानूनी टकराव है या नहीं। दूसरी ओर, असम की सहमति भी महत्वपूर्ण रहेगी। सुनवाई में असम की ओर से संकेत दिया गया है कि यदि केरल transfer की अनुमति देता है तो वह अनुरोध पर विचार करेगा। फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने आमिर-उल-इस्लाम के ट्रांसफर पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। लेकिन अदालत की टिप्पणियों ने केरल के उस नियम की वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जो death-row convict के दूसरे राज्य में transfer को रोकता है।
